लेखक परिचय

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

मीणा-आदिवासी परिवार में जन्म। तीसरी कक्षा के बाद पढाई छूटी! बाद में नियमित पढाई केवल 04 वर्ष! जीवन के 07 वर्ष बाल-मजदूर एवं बाल-कृषक। निर्दोष होकर भी 04 वर्ष 02 माह 26 दिन 04 जेलों में गुजारे। जेल के दौरान-कई सौ पुस्तकों का अध्ययन, कविता लेखन किया एवं जेल में ही ग्रेज्युएशन डिग्री पूर्ण की! 20 वर्ष 09 माह 05 दिन रेलवे में मजदूरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति! हिन्दू धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण, समाज, कानून, अर्थ व्यवस्था, आतंकवाद, नक्सलवाद, राजनीति, कानून, संविधान, स्वास्थ्य, मानव व्यवहार, मानव मनोविज्ञान, दाम्पत्य, आध्यात्म, दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक उत्पीड़न सहित अनेकानेक विषयों पर सतत लेखन और चिन्तन! विश्लेषक, टिप्पणीकार, कवि, शायर और शोधार्थी! छोटे बच्चों, वंचित वर्गों और औरतों के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावमय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययनरत! मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान’ (BAAS), राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स एसोसिएशन (JMWA), पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा/जजा संगठनों का अ.भा. परिसंघ, पूर्व अध्यक्ष-अ.भा. भील-मीणा संघर्ष मोर्चा एवं पूर्व प्रकाशक तथा सम्पादक-प्रेसपालिका (हिन्दी पाक्षिक)।

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश

(ऐसे 21 सुधार जो भारत को फिर से सोने की चिडि़या बना सकते हैं।)

मेरी छोटी सी पृष्ठभूमि : मैं मीणा जाति और आदिवासी वर्ग का राजस्थान निवासी हूँ। मेरे माता-पिता भारत के मूल निवासी हैं। मेरे पिताजी स्कूल नहीं गये, लेकिन अच्छी तरह से हिन्दी पढना-लिखना जानते हैं। मैं हिन्दुस्तान में जन्मा हूँ। मेरा नामकरण हिन्दू ब्राह्मण द्वारा किया गया। मेरा विवाह हिन्दूरीति से (सप्तपदि) से हिन्दू ब्राह्मण ने करवाया। मैं हिन्दुस्तान में रहता हूँ।

मेरे पिताजी चाय, बीडी, सिगरेट, तम्बाखू, मांस-मदिरा आदि किसी भी नशीले द्रव्य का सेवन नहीं करते और ये सभी बातें मुझे मेरे पिताजी से विरासत में मिली हैं। मेरे पिताजी पर स्वामी दयानन्द सरस्वती का गहरा प्रभाव है। वे जिला स्तर पर आर्यसमाज के कार्यकर्ता/पदाधिकारी रहे हैं, लेकिन सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित पाखण्ड को उजागर करने वाली बातों को सैद्धान्तिक रूप से सही मानते हुए भी, वे व्यावहारिक जीवन में उनका अनुसरण नहीं कर सके हैं और वे आज भी परम्परागत हिन्दू हैं। उन्हें हिन्दू होने पर गर्व है, मुझे भी है। हालाँकि मुझे आज तक नहीं पता कि हिन्दू किसे कहते हैं, लेकिन मेरे पूर्वज स्वयं को हिन्दू मानते है, सो मैं भी हिन्दू हूँ।

मेरे पिजाती शुरू से जनसंघ एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थक रहे हैं। जनसंघ के पक्ष में मतदान करने के लिये लोगों को उत्साहित करने में उन्हें अच्छा लगा करता था, लेकिन पिछले दो-तीन दशक से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी के उतने ही सख्त विरोधी है, जितने सख्त जनसंघ के समर्थक हुआ करते थे। उन्हें इस बात का अत्यन्त दु:ख है कि एक मात्र राजनैतिक दल जनसंघ हिन्दू हित की बात करता था, उसका वर्तमान स्वरूप भाजपा हिन्दू हित के पथ से विचलित हो गया है और इसी प्रकार से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अपनी मूल विचारधारा को कागजों से आगे नहीं उतार पाया है। इस कारण अनेक बार मेरे पिताजी किसी अन्य दल को वोट तक नहीं देते हैं।

मैंने हिन्दी माध्यम से शिक्षा ग्रहण की है। मैं अंग्रेजी का कतई भी समर्थक नहीं ही हूँ, लेकिन काले अंग्रेजों द्वारा भारत में थोपी गयी अंग्रेजी व्यवस्था में संघर्ष करके अपने आपके अस्तित्व को बचाये रखने के लिये मैं अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढा रहा हँ, लेकिन ईसाई मिशनरीज द्वारा संचालित अंग्रेजी स्कूलों से मुझे नफरत है। इसलिये मेरे बच्चे राष्ट्रीय स्वयंसेवक के कार्यकर्ता द्वारा संचालित एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में, पढ रहे हैं। यद्यपि इस कारण से वे न तो अंग्रेजी ही ठीक से सीख पाये हैं और न हीं हिन्दी ही सीख सके हैं। यह अलग बात है कि मैं स्वयं उन्हें हिन्दी भाषा का व्यवहारिक महत्व समझाता रहता हूँ। यदि वे मिशनरीज के स्कूल में पढे होते तो कम से कम उनकी अंग्रेजी तो अच्छी होती, लेकिन उनके सच्चे भारतीय बने रहने की सम्भावना कम ही रह पाती। यह मेरी छोटी सी पृष्ठभूमि है।

आगे बढने से पूर्व मैं यह भी साफ कर दूँ कि सैद्धान्तिक रूप से मुझे आज तक नहीं पता कि हिन्दू किसे कहते हैं, लेकिन मेरे पूर्वज स्वयं को हिन्दू मानते है, सो मैं भी हिन्दू हूँ। जिन रीति-रिवाजों को जन्म से माना है, जिन संस्कारों को जिया है, उनसे लगाव है। अपनत्व है। भारत हिन्दू बहुल राष्ट्र है, सो हिन्दू होने में अच्छाई ही अच्छाई दिखती है।

भारत में मेरे जैसे करोडों लोग हैं, जिन्हें हिन्दू होने पर गर्व है और वे हिन्दू ही बने रहना चाहते हैं, लेकिन फिर भी वे हिन्दूवादी संगठनों या राजनैतिक दलों का समर्थन नहीं करते हैं। ऐसे लोग प्रतिदिन लाखों लोगों को अपने जैसे बनाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं। काफी सीमा तक सफल भी हो रहे हैं। हम जैसे लोग भारत में हिन्दूवादी भारतीय जनता पार्टी को जिताकर सत्ता में लाने के लिये निरुत्साहित रहते हैं। जिसकी वजह से भाजपा भारत की सत्ता से दूर ही नहीं बहुत दूर होती जा रही है। इसी कारण से बाबा रामदेव भी भारत की सत्ता पर काबिज होने में सफल होते नहीं दिख रहे हैं।

मैं यह भी मानता हूँ कि हम जैसे लोगों की वजह से हिन्दुत्व की बात करने वाले अपने मकसद में सफल नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे ही लोगों की वजह से भाजपा सत्ता में नहीं आ पा रही है और इसका दूसरा पहलू यह है कि भारत में हिन्दुओं का बहुमत होने के उपरान्त भी तकरीबन 15 प्रतिशत मुस्लिम वोटों के बल पर काँग्रेस सत्ता का सुख भोग रही है और भोगती रहेगी।

हमारी विचारधारा के पोषक लोगों को भारत के अनन्त काल तक हिन्दू बहुल राष्ट्र बने रहने और दिन-प्रतिदिन ताकवर राष्ट्र के रूप में उभरते रहने में तनिक भी सन्देह नहीं है। हम भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, शिव सेना, बजरंग दल आदि के वर्तमान उजागर विचारों का अनुसरण करके कभी भी भारत को में हिन्दू राष्ट्र बनते देखने की कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसा क्यों है? इस देश के पचास करोड से अधिक लोगों की ऐसी ही सोच है! लेकिन क्यों? यह सवाल जिस दिन हिन्दूवादी संगठनों की समझ में आ जायेगा, उस दिन भारत, भारतीयों और हिन्दू धर्म की तस्वीर बदल जायेगी! लेकिन सच्चाई यह है कि हिन्दूवाद या हिन्दुत्व की बात करने वाले चाहते ही नहीं कि भारत, भारतीयों और हिन्दू धर्म की तस्वीर बदले। ये सब चाहते हैं कि सभी हिन्दु, हिन्दुत्व को उसी नजरिये से देखें, जैसा उनके द्वारा हजारों सालों से दिखाया जाता रहा है।

अब यह सम्भव नहीं है, क्योंकि अब उन लोगों ने भी सोचने, समझने और बोलने की ताकत के साथ-साथ जमीनी संघर्ष करने की ताकत भी अर्जित कर ली है, जिन्हें हिन्दू धर्म एवं हिन्दू धर्म के प्रवर्तक तथा संरक्षकों ने इन सबसे हजारों सालों तक वंचित रखा था। सैद्धान्तिक हकीकत कुछ भी हो, लेकिन व्यवहार में देश के अधिकतर लोग वर्तमान में हिन्दुत्व का जो मतलब समझते हैं, वो इस प्रकार है :-

हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ब्राह्मणों द्वारा लिखे गये हैं।

हजारों सालों तक हिन्दू धर्म के ग्रन्थों को पढने-पढाने का अधिकार केवल ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों तक ही सीमित था।

वर्ण-व्‍यवस्था, जातिभेद, छुआछूत, दहेज, सतिप्रथा, स्त्री के साथ भेदभाव इसी हिन्दू धर्म की दैन है।

क्षत्रियों एवं ताकतवर लोगों द्वारा निचली जातियों पर किया गया या किया जा रहा अत्याचार और पुरुष का नारी पर अत्याचार हिन्दू धर्म के संस्कारों तथा ब्राह्मणों के खुले या मूक समर्थन की ही दैन हैं।

हिन्दू धर्मशास्त्रों एवं क्षत्रियों के पुरोहितों ने क्षत्रियों के शराब सेवन को जायज एवं धर्मसंगत घोषित करके क्षत्रियों की बरबादी की नींव रख थी।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में जानबूझकर लिखा गया कि सारे हिन्दू धर्मस्थलों पर केवल ब्राह्मण ही पुजारी होंगे। जहाँ अछूतों को प्रवेश नहीं दिया गया और आज भी नहीं दिया जाता है।

इन एवं ऐसी ही अनेकों बातों को संस्कारों को बचपन से ग्रहण करते हुए हिन्दू का समाजीकरण होता है। जिसमें हिन्दुत्व वही है, जो हिन्दुत्व के प्रवर्तक एवं संरक्षक ब्राह्मण या उनके अनुयाई घोषित करते रहे हैं।

आज भी हिन्दुत्व पर उन्हीं लोगों का कब्जा है, जिनका अनादि काल से कब्जा रहा है। हाँ उन्होंने जानबूझकर हिन्दुत्व को ताकतवर बनाने के नाम पर कुछ ऐसी बातें जरूर अपनी विचारधारा में शामिल कर ली हैं, जिनसे अब हिन्दुत्व के प्रवर्तकों का साथ देने वालों में क्षत्रियों के छोटे से कुलीन वर्ग के साथ-साथ, वैश्य भी शामिल हो गये हैं। कुछ ऐसे लोगों को भी शामिल कर लिया है, जिनको ज्ञात ही नहीं है कि वे किनका समर्थन कर रहे हैं। ऐसे लोग हिन्दुत्व के सम्मोहन या अन्धभक्ति के शिकार हैं! जबकि हकीकत में हिन्दुत्व के प्रवर्तकों की इस नीति से हिन्दुत्व का भला नहीं हो रहा, बल्कि हिन्दुत्व का विनाश हो रहा है। हिन्दुत्व से हिन्दू दूर भाग रहे हैं। जिसके चलते भारत में विदेशी ताकतों का प्रभाव बढ रहा है। इस बात का प्रत्येक सच्चे भारतवासी को दु:ख भी है।

अब यह जानना अत्यन्त जरूरी है कि वर्तमान में हिन्दुत्व के प्रवर्तकों एवं संरक्षकों की हिन्दूवादी नीति क्या हैं, जिनके बल पर वे भारत में हिन्दुत्व एवं हिन्दूवादी सरकार की स्थापना करके, कथित रूप से भारत को मजबूत करने की बातें करते हैं। भारत के पचास करोड़ से अधिक लोगों का मानना है कि हिन्दूवादी चाहते हैं कि-

अजा एवं अजजा वर्गों का शिक्षण संस्थानों, सरकारी सेवाओं तथा विधायिका में आरक्षण समाप्त हो। अन्य पिछडा वर्ग का शिक्षण संस्थानों, सरकारी सेवाओं तथा पंचायत राज व्यवस्था में आरक्षण समाप्त हो। जिसके पीछे इनका तर्क है कि आरक्षण के कारण उच्च बुद्धिमता वाले लोग विदेशों में पलायन कर रहे हैं और निकृष्ट और कम योग्यता वाले लोग लाभ उठा रहे हैं। इसी कारण से देश का विकास नहीं हो रहा है। उनका तर्क है कि केवल बुद्धिमान लोग ही देश का विकास कर सकते हैं और आरक्षित वर्ग के कम योग्यता वाले लोग बुद्धिमान नहीं होते हैं।

हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की आकांक्षा करने वाले हिन्दुवादियों के इस तर्क से देश की करीब 25 प्रतिशत अजा एवं अजजा वर्ग की आबादी एवं 45 प्रतिशत के करीब अन्य पिछडा वर्ग की आबादी कुल 70 प्रतिशत आबादी को निकृष्ट एवं हीन घोषित कर दिया गया है। इन लोगों की नजर में 15 प्रतिशत मुसलमान भी निकृष्ट होने के साथ-साथ देशभक्त भी नहीं हैं। इस प्रकार करीब 85 प्रतिशत आबादी तो तुलनात्मक रूप से कम योग्य और निकृष्ट होने के साथ-साथ इस देश के विकास में और इस देश के बुद्धिमान लोगों के अवसरों को छीनने के लिये जिम्मेदार है और बुद्धिमान लोगों के विदेशों में पलायन करने के लिये जिम्मेदार है।

यहाँ विचारणीय सवाल यह है कि कौन हैं, वे बुद्धिमान लोग जिनके लिये इस देश के 85 प्रतिशत लोगों को लगातार हीन घोषित किया जाता रहा है। स्वाभाविक रूप से हिन्दुत्व एवं हिन्दूवादी सोच के प्रवर्तक एवं समर्थक। जिनका सदा से सभी संसाधनों एवं सत्ता पर कब्जा रहा है। जिनके कारण देश के 70 प्रतिशत लोगों को आरक्षण देने की जरूरत पडी!

वे अभी भी देश को हिन्दुवादी बनाने और राष्ट्रवादी बनाने के नाम पर फिर से सभी संसाधनों एवं सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं। इस सोच के उपरान्त भी सभी हिन्दूओं ये समर्थन हासिल करने की आकांक्षा करना कहाँ तक न्यायसंगत है? यहाँ बडी चालाकी से मुसलमानों का भय दिखाकर, धारा 370 को हटाने, राम मन्दिर का निर्माण करने और समान नागरिक संहिता का असंवैधानिक राग अलाप कर, निकृष्ट घोषित 70 प्रतिशत हिन्दुओं को भी हिन्दूवादी सोच के राजनैतिक दल भाजपा का समर्थन करने का अविवेकपूर्ण हथियार आजमाया जाता है। जो कभी भी सफल नहीं हो सकता है।

यदि हिन्दूवादी सोच के लोग वास्तव में ईमानदार और देशभक्त होने के साथ-साथ, यदि सच्चे समतावादी हैं तो देश के 70 प्रतिशत हिन्दुओं का विकास करने वाला हिन्दुत्व कायम करने की बात करें। जिसके लिये हिन्दु धर्म की रक्षा करने के नाम पर काम करने वालों को अपने ऐजेण्डे में कुछ ही बातें बदलनी होंगी। देखते हैं भारत में हिन्दूवादी सरकार कायम होती है या नहीं? ऐसा करने के बाद भारत के 50 करोड से अधिक लोग आपके साथ होंगे।

आपको केवल इतना सा करना है-

1. हिन्दू धर्म सभा का गठन : राष्ट्रीय स्तर से गाँव स्तर तक हिन्दू धर्म सभा का गठन किया जावे, जिसमें सभी हिन्दू जातियों का जनंसख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व हो। हिन्दू धर्म सभा की सिफारिशों पर भारत की संसद विचार करने के लिये संवैधानिक रूप से बाध्य हो। हिन्दू धर्म सभा द्वारा धर्मस्थलों के पुजारी नियुक्त किये जावे। प्रारम्भिक 50 वर्ष के लिये ब्राह्मण, वैश्य एवं क्षत्रिय वर्ग का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं हो। जिससे जन्मजातीय श्रेष्ठता एवं भू-देव जैसी मानसिक विकृतियाँ स्वत: समाप्त हो सकें। धार्मिक मामलो में हिन्दू धर्म सभा को निर्णय करने का अधिकार हो, जिसकी उच्च स्तरीय धर्म सभा में तीन स्तर तक अपील करने का भी प्रावधान हो।

2. सत्ता में आने पर दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले माता-पिता की एवं पूर्व पति या पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने वाले नागरिकों की सम्पूर्ण सम्पत्ति छीनकर ऐसे लोगों को देशद्रोही घोषित करके बिना मुकदमा चलाये, केवल प्राथमिक स्तर पर प्रमाणीकरण के बाद ही कम से कम 10 वर्ष के लिये जेल में डाल दिया जावे और ऐसे माता पिता के बच्चों का लालन-पालन एवं पढाई की सम्पूर्ण व्यवस्था सरकार द्वारा की जावे।

3. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि धर्म के अधार पर विवाह विच्छेद या तलाक मान्य नहीं होगा और कोर्ट द्वारा विवाह विच्छेद या तलाक घोषित होने के बाद पत्नी के भरणपोषण की वर्तमान विभेदकारी व्यवस्था समाप्त की जावे और विवाह विच्छेद या तलाक की सूरत में परिवार की सम्पत्ति में से सभी की हिस्सेदारी के लिये न्यायसंगत व्यवस्था लागू की जावे, जो सभी धर्म के अनुयाईयों पर लागू हो।

4. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि भारत में राजकाज के सम्पूर्ण कार्य हिन्दी एवं स्थानीय/क्षेत्रीय भाषाओं में किये जाने का प्रावधान किया जावे। कार्यपालिका, संसद एवं सर्वोच्च न्यायालय की भाषा केवल हिन्दी हो। अंग्रेजी में सरकारी काम काज पर पाबन्दी हो। विदेशों में होने वाले शोध का तत्कान हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करवाने के लिये हर तरह के तकनीकी साधनों से सम्पन्न एवं योग्यतम अनुवादकों की व्यवस्था हो। भारत में बिकने वाले किसी भी उत्पाद का विवरण अंग्रेजी में देना अपराध हो।

5. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि सार्वजनिक रूप से मांस एवं शराब की विक्री पर पूर्ण प्रतिबन्ध हो और सार्वजनिक रूप से शराब पीना अजमानतीय-अपराध घोषित किया जावे।

6. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि उच्चतर माध्यमिक स्तर (12) तक सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी शिक्षण संस्थानों में सम्पूर्ण रूप से मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था हो। जिसका खर्चा सरकार वहन करे। इसके साथ-साथ सरकारी एवं गैर-सरकारी सभी शिक्षण संस्थानों में एक समान पाठ्यक्रम और राष्ट्रीयता भाव जगाने वाली विद्यार्थियों की एक जैसी ही वेशभूषा हो, जिससे किसी भी विद्यार्थी को विशेष परिस्थितियों में किसी भी अन्य विद्यालय में प्रवेश लेने में कोई परेशानी नहीं हो।

7. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले सभी समाजों के मेधावी बच्चों को उच्चतम स्तर तक पढाई करने के लिये सरकारी द्वारा खर्चा वहन करने की पुख्ता व्यवस्था हो।

8. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि चुनावों की भ्रष्ट दलीय व्यवस्था समाप्त की जावे और स्वतन्त्र रूप से चुनाव लडने वाले उन प्रत्याशियों को, जो कम से कम पचास प्रतिशत वोट प्राप्त करने पर ही निर्वाचित घोषित किया जावे। चुनाव पाँच वर्ष के लिये हों, बीच में विधानसभा या लोकसभा भंग नहीं हो। राज्यसभा तत्काल समाप्त की जावे। मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री का चुनाव सदन में बहुमत के आधार पर किया जावे। दलबदल (विचारधारा/नेता बदलने) को पूर्ण मान्यता हो। कोई भी व्यक्ति अधिकतम तीन कार्यकाल तक ही विधायक या सांसद रह सके। कोई भी विधायक या सांसद अधिकतम दो कार्यकाल के लिये मंन्त्री या मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री रह सके। विधायिका के जिये यह जरूरी हो कि किसी भी प्रकार का कानून अपने कुल सदस्यों के बहुत से पारित किया जावे, न कि उपस्थित सदस्यों के बहुत से।

9. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि किसी भी न्यायाधीश को या भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी को 10 वर्ष की सेवा करने के बाद नौकरी छोडकर या सेवानिवृत्ति प्राप्त करने के बाद कम से कम 20 वर्ष तक सरकारी लाभ के पद पर पदस्थ होने या चुनाव लडने का अधिकार नहीं होगा।

10. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि देश की जनगणना जाति एवं धर्म के आधार पर की जावे, जिससे सभी जातियों एवं सभी धमों के बारे में भ्रम दूर हो सकें और कमजोर, गरीबी रेखा से नीचे और आरक्षित वर्ग की जनसंख्या के अनुसार उनके विकास के साधन उपलब्ध करवाये जा सकें।

11. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि छुआछूत करने वाले को कम से कम १० वर्ष की सजा का प्रावधान हो और मामले का निर्णय होने तक दोषी को किसी भी सूरत में जमानत नहीं दी जावे एवं मामले को निर्णय तीन माह में करने की बाध्यता हो।

12. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि लोक सेवकों द्वारा भ्रष्टाचार किये जाने पर, मिलावट करने पर या किसी भी प्रकार का मानव को क्षतिकारी उत्पाद बनाने या बेचने पर, कम से कम 20 वर्ष की सजा का प्रावधान हो और मामले का निर्णय होने तक दोषी को किसी भी सूरत में जमानत नहीं दी जावे एवं मामले को निर्णय हर हाल में तीन माह में करने की बाध्यता हो।

13. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि संविधान में वर्णित मूल अधिकारों का विरोध करने वाले और किसी भी प्रकार के विभेद को बढावा देने वाले मनुस्मृति जैसे सभी धर्मग्रन्थों से असंगत एवं असंवैधानिक हिस्सों को स्वयं हिन्दुओं द्वारा एक वर्ष के अन्दर-अन्दर हटाकर फिर से सभी को अधिकृत हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित किया जावे। जिसका खर्चा भारत सरकार के खजाने से वहन किया जावे। असंगत विवरण वाले पूर्व प्रकाशित धर्मग्रन्थों को निर्धारित समय अवधि में स्वयं ही जलाने का आदेश हो और निर्धारित अवधि के बाद ऐसे धर्मग्रन्थों को रखने वालों के विरुद्ध सख्त दण्डात्मक कार्यवाही की जावे।

14. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि हर वर्ग की महिलाओं को उनके अपने-अपने वर्ग में विधायिका में, शिक्षण संस्थानों में एवं सभी स्तर की सरकारी सेवाओं में संविधान के तहत पचास फीसदी आरक्षण दिया जाना सुनिश्चत किया जावे।

15. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि आतंकवाद में लिप्त अपराधियों एवं आतंकवाद को समर्थन देने लोगों को कम से कम उम्रकैद एवं अधिकतम फांसी का सजा का प्रावधान हो और किसी भी सूरत में आतंकवाद से जुडे मामलों में एक वर्ष के अन्दर-अन्दर निर्णय का क्रियान्वयन हो जाना चाहिये। आतंकवादियों के मामलों में राष्ट्रपति या राज्यपालों को प्रदत्त क्षमा आचना की शक्तियों को समाप्त किया जावे।

16. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि हजारों वर्षों से शोषित अजा एवं अजजा वर्ग के लोगों को सभी स्तर की सरकारी सेवाओं, शिक्षण संस्थाओं और विधायिका में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित किया जावे।

17. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि अन्य पिछडा वर्ग के लोगों को सभी स्तर की सरकारी सेवाओं, शिक्षण संस्थाओं और विधायिका में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित किया जावे।

18. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने से पूर्व सरकार की मंजूरी जरूरी नहीं हो।

19. सत्ता में आने पर लोगों को तुरन्त न्याय दिलाने हेतु प्रावधान किया जायेगा कि न्यायाधीशों की संख्या में 25 प्रतिशत बढोतरी की जावे।

20. सत्ता में आने पर प्रावधान किया जायेगा कि भ्रष्ट या अनैतिक कार्यों में लिप्त न्यायाधीशों जन प्रतिनिधियों, मंत्रियों आदि सभी को भी आम लोक सेवकों की भांति कानूनी कार्यवाही का सामना करना होगा।

21. किसी भी लोक सेवक को उसके विभाग की ओर से किसी भी प्रकार की सेवा या सुविधा मुफ्त में नहीं दी जायेगी। जिससे देश के बजट पर भार नहीं पडे और आम नागरिक के लिये सुविधाएँ मंहगी नहीं हों।

यदि हिन्दूवादी या राष्ट्रवादी इन कुछेक सुधारों को करने को सहमत हों तो न मात्र इस देश में हिन्दुत्व कायम होगा, अपितु भारत फिर से सोने की चिड़िया का सम्मान हासिल कर सकेगा और भारत को दांत दिखाने से पूर्व कोई भी दस बार सोचेगा। हाँ यदि हिन्दूवादी केवल 15 प्रतिशत उच्च जातीय आबादी के हितों को ही राष्ट्रीय हित मानते हैं तो फिर इस देश में कभी भी वो नहीं हो सकता, जो हिन्दूवादी चाहते हैं।

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40 Comments on "हिन्दू क्यों नहीं चाहते, हिन्दूवादी सरकार!"

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मुकेश चन्‍द्र मिश्र
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अच्छा लेख है………. हिन्दू धर्म और हिन्दू तो सदा ही सुधारवादी रहे हैं और समयानुसार बदलते रहे हैं और आगे भी बदलते ही रहेगे…. इतने हमलो के बावजूद अगर ये धर्म आज तक न सिर्फ जीवित है बल्कि लगातार आगे बढ़ता जा रहा है तो इसके लिए हिन्दुत्व की समयानुसार बदलाव वाली खासियत ही । है

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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लेख पर टिप्पणी करने के लिए आपका आभार!!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

dr.o.p.billore
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प्रारंभ में लेख विचारोत्तेजक लगा । खूब चाव से पढ़ा । किन्तु उत्तरोत्तर लेख में विचारों की गहनता उथली होती गई ,और मन की भड़ास निकलती दिखने लगी । लेखक का पूर्ण रूप से निष्पक्ष और कमाना रहित होना आवश्यक है । मन की चाहतों के सम्पुट ने लेख की महत्ता को कम किया है । आदि आदि । —

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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लेख पर टिप्पणी करने के लिए आपका आभार!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

rajendra kashayap
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i agree wethyou rajendra

डॉ. मधुसूदन
Guest
मीणा जी नमस्कार। एक मित्र के रूपमें कुछ सुझाव। (१) आप जो भी मत प्रस्थापित करना चाहे, उसके लिए तर्क दीजिए। तर्क सभी को समझना पडता है। (२) आरोपों के आधार पर,पूर्वाग्रहोंके आधारपर, लेख गढने पर वह वाद विवाद खडा करेगा। (३) व्यक्तिगत मत, आपको अपने जीवन में आचरण करने की स्वतंत्रता देता है। उदाहरणार्थ: मेरी माता जी का आदर मैं करुं, तो किसीको तर्क देने की आवश्यकता नहीं है।पर आप सभी मेरी माता जी का आदर करें, यह अपेक्षा करुं, तो मुझे तर्क देना होगा। संक्षेप में: तर्क आपको सर्व ग्राह्य बनाता है। आपका मत आपको अपने जीवन में… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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डा मीना जी मुझे आपसे सादर निवेदन करना है कि— – आपके अनेक बार आग्रह करने पर भी आपका यह लेख पढने का मन इस लिए न बना कि मुझे लगा कि आपके अन्य लेखों की तरह इसमें भी तर्क कम और पूर्वाग्रह, दूसरों की बात को न समझाने की प्रवृत्ति होगी. किन्तु इस लेख को पढ़ कर आपकी सदइच्छा पर श्रधा होती है. – आदरणीय मित्रवर सत्य तक पहुँचाने का श्रेष्ठ उपाय हमारे विचारकों ने संवाद को माना है. अतः पूर्वाग्रह रहित संवाद जारी रहना चाहिए. – जिस विषय के पक्ष या विपक्ष में हम लिख-बोल रहे हैं, उसका… Read more »
ललित किशोर शर्मा
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ललित किशोर शर्मा
आदरणीय , निसंदेह यही बात मीणा जी से मुझे कहनी है कि जिस तरह वो आरक्षण समर्थन पूर्वाग्रह और अपने आप को इतना हिन्दुत्व ग्रन्थो के अध्ययन करने वाला बताने के बाद भी ब्राह्मण विरोधी नाद करने को चेष्टारत है उनसे मै सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि अगर आपने इस प्रश्न के बजाय कि ” अन्यो को वंचित करा गया , तथाकथित अत्याचार किया गया ” आप इस प्रश्न पर अपने मस्तिष्क की नसो को बल देते कि “ऐसा क्यू किया गया ” || आपको सवाल का जवाब समझ आ जाता |
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