लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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गंगानन्‍द झा

download (1)यह बड़ा कौतुहलपूर्ण सवाल है कि जानते हुए भी कि मादक द्रव्यों के सेवन से हानि होती है, हम क्यों स्वेच्छा से, बल्कि व्यग्रता से इनका सेवन करते हैं। आदिम कबीलों से अत्याधुनिक समाजों तक में विभिन्न प्रकार के आत्मघाती शराब, तम्बाकू, कोकैन इत्यादि मादक द्रव्‍यों होता रहा है। कहा जा सकता है कि नशा करना मनुष्य की फितरत में शामिल है। सबाल यह समझने का नहीं है कि एक बार इन जहरीली चीजों का इस्तेमाल शुरु करने के बाद हम क्यों इसके आदी हो जाते हैं। इसका उत्तर है कि इनका सेवन की लत लग जाती है। सवाल यह है कि इनके सेवन के हानिकारक प्रभाव से अवगत होते हुए भी हम इनका सेवन शुरु ही क्यों करते हैं। लगता है कि मनुष्य के अवचेतन मन का कोई प्रोग्राम हमें ऐसा काम करने को प्रेरित किया करता है जिसके खतरनाक होने के बारे में हमें पता होता है।क्या हैं ये प्रोग्राम?

स्वाभाविक है कि अलग अलग समुदायों, अलग अलग व्यक्तियों में अलग अलग वजहें हो सकती हैं। जैसे कुछ लोग अपनी वर्जनाओं से उबरने के लिए अथवा अपने मित्रों का साथ देने के लिए अथवा अपने एहसासात को कुन्द करने अथवा ग़म गलत करने के लिए पीते हैं तो कुछ लोग शराब चखने के लिए, इसका मजा लेने के लिए पीते हैं। विभिन्न समुदायों एवम् वर्गों में एक सुखी जीवन की विभिन्न अवधारणाएँ भी मादक द्रव्यों के प्रति उनके रूख को तय करने में अपनी भूमिका रखती हैं। लेकिन इन व्याख्याओं में से कोई भी इस विरोधाभास को नहीं सुलझाती कि हम मादक द्रव्यों के सेवन को हानिकारक जानते हुए भी क्यों जानबूझकर बेचैनी से नशा करते हैं।

मनुष्य के आचरण का अध्ययन करनेवाले विकासवादी वैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य की विशिष्टताओं के पूर्ववर्ती लक्षण जानवरों में देखे जा सकते हैं। इसले मनुष्य के आचरम को समझने में जानवरों के आचरण मददगार हो सकते हैं। विकासवादी वैज्ञानिक एवम् पर्यावरणविद् जैरेड डायमण्ड इसकी व्याख्या के लिए जन्तु जगत के अपने अवलोकन से साक्ष्य पेश करते हैं।

इस्राइली जीव वैज्ञानिक आमोज़ ज़ाहावी ने 1975 ई में जन्तु आचरण पर अपने अध्ययन के प्रसंग में एक अभिनव सामान्य सिद्धान्त प्रतिपादित किया, जिसपर आज भी बहस जारी है। यह सिद्धान्त जन्तु आचरण में मँहगे या आत्मघाती संकेतों की भूमिका के सम्बन्ध में है। उदाहरण के लिए उन्होंने दर्शाया कि कैसे अक्षमता होने के ही कारण नर के हानिकारक लक्षण मादा को आकर्षित कर पाते हैं। जैरेड को इस सिद्धान्त में मनुष्य के द्वारा मादक द्रव्यों जैसे नुकसानदेह चीजों के इस्तेमाल की विरोधाभास की व्याख्या के संकेत दिखे।

उनके अनुसार ज़ाहावी के द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त जन्तुओं में आपसी संप्रेषण की सामान्य समस्या से सरोकार रखता है। हर जानवर को अपने सहवासी, संभावित सहवासी, सन्तान, माता पिता, प्रतिद्वन्द्वियों, अथवा संभावित हिंस्र जानवरों को संदेश संप्रेषित करने की जरूरत होती है । मृग की ताक में लगे एक शेर का उदाहरण लिया जा सकता है। अगर मृग शेर को ऐसा संकेत दे सके कि वह इतनी तेजी से दौड़ सकता है कि शेर उसे पकड़ने में असमर्थ रहेगा तो यह मृग के लिए उपयोगी होगा । इसलिए उसके पीछे दौड़ने पर शेर को कुछ हासिल नहीं होगा। केवल समय और ऊर्जा की बरबादी होगी। इसलिए उसको पकड़ने की कोशिश से बाज आए। अगर मृग हकीकत में शेर से तेज दौड़नेवाला न भी हो तो भी ऐसे संकेत देकर, जो शेर को पीछा करने से हतोत्साहित करते हों, वह अपना समय और ऊर्जा बचाता है। कैसे संकेत शेर के लिए विश्वनीय होंगे जिनसे शेर समझे कि यह मृग हकीकत में मुझसे तेज दौड़ने की क्षमता रखता है, यह गलत दावा नहीं कर रहा है?

ये सकेत अक्सर विरोधाभासी होते हैं क्योंकि इनसे वे अपनी दुर्बलता जाहिर करते हैं या अपने लिए खतरे की सम्भावना बढ़ाते हैं। जैसे कि मृग अपने निकट आनेवाले शेर को देखकर यथा सम्भव तेज दौड़ने के बजाय अपने चारो टाँगों पर हवा में बार बार कुलाँचे भरता हुआ धीमी गति से दौड़ता है। यह तो आत्मघाती आचरण कहा जाएगा, इसमें समय और ऊर्जा दोनो की हानि होती है और शेर के द्वारा पकड़े जाने की सम्भावना बढ़ जाती है। यह और ऐसे अनेक उदाहरण जन्तु आचरण के विरोधाभास से भरी समस्याएँ हैं। संकेतों की प्रामाणिकता क्रम-विकास की प्रक्रिया द्वारा स्थापित हुई है।

ज़ाहावी का सिद्धान्त इस समस्या की तह तक जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार ये हानिकारक लक्षण एवम् आचरण सच्चे संकेत माने जाते हैं क्योंकि संकेत देनेवाला जानवर इन संकेतों को देने में खतरा और नुकसान झेल रहा होता है। ऐसे संकेतों के मुकाबले में, जिनमें कोई खतरा नहीं उठाना पड़े, ये संकेत अधिक प्रामाणिक माने जाएँगे। ऐसे खतरे झेलने की प्रवणता केवल उत्कृष्ट प्राणी में ही होगी। ज़ाहावी के सिद्धान्त का निष्कर्ष – अपने को हानि पहुँचाकर और उस पर इठलाकर कर हम अपनी उत्कृष्टता का घमण्ड करते हैं।

इस सिद्धान्त का उपयोग हमारे द्वारा मादक द्रव्यों के सेवन की व्याख्या करने में किया जा सकता है, खासकर किशोरावस्था में, जब नशीले द्रव्यों के सेवन की शुरुआत की प्रवणता अधिक रहती है। इस उम्र में हम अपने आपको, अपनी हैसियत जाहिर करने के लिए अधिकाधिक सजग एवम् प्रयासशील रहते हैं। दस हजार साल पहले हम शेर को या अपने कबीले के दुश्मन को ललकारकर अपने को उत्कृष्ट प्रमाणित किया करते थे। मादक द्रव्यों का सेवन—अतीत की एक उपयोगी प्रवृत्ति, जो अब कलुषित हो गई है, का उदाहरण है—अक्षमता को संकेत के रुप में इस्तेमाल करने पर भरोसा करना ।

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