लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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श्रीराम तिवारी

भारत के मध्यम वित्त वर्ग में इन दिनों एक बृहद बैचेनी स्पष्ट परिलक्षित हो रही है.वर्तमान पूंजीवादी प्रजातंत्र ने देश के तीनों राजनैतिक समूहों {यूपीए,एनडीए और तीसरा मोर्चा} को उसी तरह हेय दृष्टि से देखना शुरू कर दिया है;जिस तरह अतीत में उसने बर्बर सामंती या विदेशी आक्रान्ताओं के शाशन तंत्र को देखा था. राजनैतिक नेताओं को अविश्वाश से देखने के लिए राजनैतिक लोग जितने गुनाहगार हैं,उसे ज्यादा देश की वह जनता भी जिम्मेदार है जो तमाम शोषण-दमन और भय-भूंख-भृष्टाचार से पीड़ित होने के वावजूद उन्हीं नेताओं और दलों को ६५ साल से चुनती आ रही है जो उसके इस मौजूदा दयनीय हश्र के लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार है. आइन्दा जब भी कोई चुनाव होंगे तब पुनः वे ही दल और नेता फिर से जीत कर संसद में पहुंचेंगे जिन पर यह अराज्नैतिकता की आकांक्षी जनता,बाबा-लोग, ,अन्ना एंड कम्पनी और मीडिया के लोंग नाना प्रकार से सच्चे -झूंठे आरोप लगाने में एक दुसरे से बढ़-चढ़कर हैं. अपनी बैचेनी को अभिव्यक्ति देकर ये समझते है की इस तरह कोई गैरराजनैतिक अवतारी पुरुष,कोई बाबा कोई योगी ,कोई गांधीवादी या कोई चमत्कार उनके दुःख दारिद्र दूर कर देगा?जहां तक निम्न आय वर्ग-,रोजनदारी मजदूरों,भूमिहीन-किसानों,आदिवासियों,दलितों,कामगार-महिलाओं,निजी क्षेत्र में कार्यरत कम वेतन और ज्यादा मेहनत करने वा� ��े मजबूर नौजवानों की आम और सनातन चिंता का सवाल है तो उसको वाणी देने के लिए गोस्वामी तुलसीदास बाबा ने शानदार शब्द रचना की है..

कोऊ नृप होय हमें का हानी ! चेरि छोड़ होहिं का रानी !!

इन दिनों दो तरह के लोग अपने-अपने ढंग और अपने-अपने मिजाज़ के अनुरूप भृष्टाचार,कालेधन ,महंगाई,और कुशाशन के खिलाफ लड़ रहे हैं. एक तरफ उन लोगों की विशाल कौरवी सेना है जो या तो राज्यों की सत्ता में है या केंद्र में काबिज़ है.ये लोग वर्तमान व्यवस्था पर घडियाली आंसू बहाकर अपने पापों को छिपाने की सफल कोशिश कर रहे हैं.धनबल-बाहुबल-राजबल और मीडिया का इन बदमाशों को भरपूर समर्थन प्राप्त है.रजनीती की पतित पावनी गंगा को मैला करने में इसी वर्ग का हाथ है.इस वर्ग को रोटी-कपडा -मकान की फ़िक्र नहीं बस उनकी चिंता है कि लूट की वर्तमान भृष्ट व्यवस्था कहीं नंगी न हो जाए अतेव उसे आड़ में छिपाने के लिए कभी -कभी इन तथाकथित गैरराजनैतिक पाखंडियों, शिखंडियों का उपयोग करते रहते हैं. जब अन्ना एंड कम्पनी ने जंतर-मंतर पर ६-७ अप्रैल कोअनशन का स्वांग रचाया था तो सुश्री उमा भारती और अन्य उन राजनीतिज्ञों को मंच के पास नहीं फटकने दिया गया था;जो अन्ना के समर्थन {भले ही अपने मतलब के लिए }में वहाँ आये थे.अब -जबकि अन्ना एंड कम्पनी को मालूम पड़ा की देश की संसद में पारित किये बिना उनकी सारी मशक्कत बेमतलब है, चाहे जन-लोकपाल बिल हो या कोई भी क़ानून के समापन या संधारण का काम हो उसका रास्ता रायसीना हिल से जाता है. ये लोग कभी-कभी वर्गीय अंतर्विरोध के चलते आपस में भी टकरा जाते हैं.लोकपा� � के दायरे में कौन-कौन होगा?कौन नहीं होगा?इन तमाम नकली सवालों में देश की आवाम को उलझाए रखकर अपने वर्गीय हितों को बड़ी चालाकी से सुरक्षित रखा जाता है.

जब तक अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे स्वतः स्फूर्त जन-नायक खुले आम राजनीति में नहीं कूंदते तब तक वे वर्गीय अंतर्विरोध में महज फूटवाल की तरह कभी कांग्रेस,कभी भाजपा,कभी माकपा,कभी सपा जैसे राष्ट्रीय दलों और कभी क्षेत्रीय दलों की चौखट पर समर्थन की भीख मांगते नज़र आयेंगे.राजनीती को कल तक बुरा बताने वाले आज राजनीतिज्ञों के सामने सिर्फ इसलिए नहीं गिडगिडा रहे की लोकपाल पास हो जाए,बलकि इसलिए शरणम गच्छामि हो रहे हैं कि राजसत्ता की वर्तमान भृष्ट और शैतानी व्यवस्था के अजगर ने इन स्वतः स्फूर्त जनांदोलनो में शामिल कतिपय बाबाओं,वकीलों,सामाजिक कार्यकर्ताओं की वैयक्तिक कमजोरियों का कच्चा-चिठ्ठा तैयार कर रखा है.यदि ये आन्दोलन वर्तमान व्यवस्था से समझौता नहीं करेंगे तो धूमकेतु की तरह दोपहर में अस्त हो जायेंगे. उनके प्रणेता भी -जयप्रकाश नारायण,लोहिया,दीनदयाल औ र वी टी रणदिवे की तरह इतिहास में असफल विभूति के रूप में याद किये जायेंगे.जनता भी इन्हें भूलकर रोटी-कपडा-मकान की सनातन आकांक्षा लेकर फिर से नागनाथ्जी या सांपनाथ जी को वोट देकर उसी भृष्ट, अपवित्र ,राजनैतिक सिस्टम को दुलारने लगती है जिसे अन्ना या रामदेव के सामने बड़े जोश -खरोश से गरियाती हुई खीसें निपोरती रहती है.

भृष्टाचार मुक्त देश की कामना हर देश भक्त और सभ्य समाज को है मैं भी उसका अभिलाषी हूँ किन्तु कालाधन देश में वापिस आये, यह तो वैसे ही है कि मेरे घर में गंदगी आये…

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2 Comments on "तथाकथित अपवित्र राजनीतिज्ञों के आगे अब क्यों गिड़गिड़ा रही है अन्ना एंड कंपनी…"

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आर. सिंह
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तिवारी जी आखिर आप किस धातु के बने हैं. या तो आप समझते नहीं या समझ कर भी न समझने का ढोंग करते हैं.यह सही है की जो लोग इस आन्दोलन को चला रहे है वे नहीं चाहते की यह आन्दोलन जनता का आन्दोलन न होकर किसी वर्ग विशेष का आन्दोलन बन जाये,पर यह भी सत्य है की इस आन्दोलन की सफलता बिना उचित क़ानून के सम्भव ही नहीं है,अत: उनके कदमों को वहां तक तो जाना ही होगा,जहां इसे कानूनी रूप दिए जाने का प्रवधान है. ऐसे एक बात जो अब तक मैंने नहीं कही थी वह आज कहता… Read more »
anil gupta
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किसी भी सामान्य समझबूझ वाले व्यक्ति को यह मालूम होना चाहिए कि संसदीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कोई भी कानून केवल संसद में लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा ही बनाया जा सकता है. ऐसी स्थिति में अन्ना को यह पता होना चाहिए था कि लोकपाल कानून केवल संसद द्वारा ही बनाया जा सकता है.और संसद में कानून केवल सोनिया गाँधी को चिट्ठी लिखने से नहीं बन सकते उसके लिए सांसदों का समर्थन जुटाना जरूरी था.लेकिन इस सच्चाई के बावजूद अन्ना व उनको घेरे हुई मंडली ने अपने अलावा बाकी सभी को दुत्कारने का कार्य किया. उमा भारती के अलावा… Read more »
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