लेखक परिचय

हिमांशु डबराल

हिमांशु डबराल

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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 हिमांशु डबराल

‘क्या आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है

जिन्हें एक पहिया ढोता है?

या इसका कोई ख़ास मतलब होता है’

धूमिल की ये पंक्तियाँ आज भी ज़हन में कई सवाल छोड़ जाती….आज़ादी…हम आज़ाद है, ये कहने पर एक बंधू बोल पड़े – क्यों मजाक करते हो भाई? सच में कई बार मजाक ही लगता है …15 अगस्त आ रहा है, एक ऐसा दिन जिस दिन हर हिन्दुस्तानी को एहसास होता है की वो आजाद है…हफ्ते दस दिन पहले से टीवी रेडियो पर आज़ादी के जश्न के प्रोग्राम शुरू हो जाते हैं…बड़ी बड़ी बातें बड़े बड़े वादे…फिर अगले दिन से वही गुलामों वाली हरकते…वही गुलामी वाले फतवे…ऐसे में काहे कहें अपने को आज़ाद? जिस देश में लड़कियां अपनी मर्जी से आजा नही सकती…ये तो छोडिये लड़कियों पर पाबन्दी लगाने वाली पंचायत का समर्थन लड़कियां ही कर कर रही हों, ऐसी गुलाम मानसिकता के बीच कैसे कहें खुद को आज़ाद? मोबाईल लेकर बाहर निकलने पर लड़कियों पर तेजाब फेकने की बात करने वाले आतंकी छुट्टे सांड की तरह घूम रहें हो तो कैसे कहें आज़ाद? जब लाशों पर भी राजनेता राजनीति करतें है और सब फिर भी चुप हैं…कैसे कहे खुद को आज़ाद? जिस देश में एक तरफ कई लाख टन अनाज पड़े-पड़े सड़ जाता है और वहीँ दूसरी तरफ लोग भूखे मरने, तो किसान आत्महत्या करने को पर मजबूर हैं, उसे कैसे कहें आज़ाद? आज़ादी के वक्त न जाने क्या क्या सपने देखे गये थे या कहें दिखाए गये थे…दुष्यंत ने सही लिखा था की-

कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए,

कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए…

100 रूपये चोरी के इलज़ाम में एक बेक़सूर आदमी 10 साल की जेल काट लेता है और कई सौ करोड़ रूपये गटने के बाद नेता लोग खुले घूम रहें है, इतना ही नहीं 100 से ज्यादा लोगों की हत्या के जिम्मेदार आतंकी जेल में फाइव स्टार फेस्लिटी में बिरयानी के मज़े लेते हैं उसे कैसे कहें आज़ाद? जहाँ आज़ाद ख्यालों को जाहिर करने पर लोग आज़ाद नही रह पाते(मतलब जेल भेज दिए जातें है) और देश तोड़ने की बातें करने वाले लोग मस्त घूम रहे है कैसे कहें आज़ाद? यहाँ हिंसा पर भी दोहरा रुख अख्तियार किया जाता है, यहाँ के पत्रकार मरे लोगों की संख्या के हिसाब से खबर को तोलते हैं, ऐसे में कैसे कहें आज़ाद? जहाँ लड़की पैदा होने पर पढ़े लिखे लोगों में भी मातम छा जाता है…कुछ पढेलिखे लोग तो पैदा होने से पहले ही उस नन्ही जान को मार देते है, कैसे कहें आज़ाद?

यहाँ आज भी धर्म जाति के नाम पर लोग बंट जाते हैं और फिर भी हम खुदको सो कॉल सेक्यूलर कहते हैं.. कैसे कहें? खैर इस तरह की आज़ादी की बात करने निकला तो कई पन्ने भर जायेंगे लेकिन बात शायद ख़त्म न हो…

कैसी आज़ादी? कैसा देशप्रेम? सब पन्द्रह अगस्त जैसे दिनों में जाग जातें है ओर फिर सो जातें है…बात तो ऐसी करते हैं सब की बस आज ही देश के सरहद पर लड़ने चले जायेंगे…और शहीद हो जायेंगे…कुछ और तो छोड़ दीजिये फिर वोट देने तक नही जाते…और फिर कहीं मिले न मिले सिस्टम को गली देते हर नुक्कड़ पर जरुर मिल जाते हैं…क्यों हम असली आज़ादी पाने के लिए कुछ करने को तैयार नही हैं? और जो कर रहा है उसका मजाक बनाने में हम सबसे आगे रहते है….न अपनी कुछ ज़िम्मेदारी समझते है और न दूसरे को उसकी ज़िम्मेदारी निभाने देते हैं…क्या हमे ज़रुरात्त नही है की हम देश के लिए कुछ करें? क्या हममे इतना भी दम नही की जिन लोगों ने आज़ादी के लिए अपनी जान न्योछावर करदी उनके बलिदान का मोल रख पाए और इस देश को हर तरह से आज़ाद बनाकर दिखाएँ? लेकिन शायद हम कुछ करना ही नही चाहते…या कुछ और..पता नही लेकिन अदम गोण्डवी ये दो लाइन याद आ रहीं हैं-

सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है

दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है 

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