लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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self-educationमनुष्य जीवन का उद्देश्य शारीरिक उन्नति कर बौद्धिक व आत्मिक उन्नति करना है। शारीरिक उन्नति तो अच्छे भोजन व व्यायाम आदि हो जाती है परन्तु बौद्धिक उन्नति के लिए अच्छे संस्कारों सहित ज्ञान, परा व अपरा विद्या, की आवश्यकता होती है। संस्कार माता-पिता, आचार्यों आदि से मिलते हैं तथा ज्ञान की प्राप्ति माता-पिता व आचार्यों सहित अपने जीवन में स्वाध्याय के द्वारा होती है। आजकल हमारे देश में स्कूलों में जो शिक्षा दी जाती है उसमें संस्कारों को नाम-मात्र का ध्यान दिया जाता है। अध्यापकों द्वारा बच्चों को पाठ्य पुस्तकों का अध्ययन कराया जाता हैं जिससे एकांगी ज्ञान प्राप्त होता है। इसमें आध्यात्मिक व सामाजिक ज्ञान तो प्रायः होता ही नहीं है। इसकी पू र्ति किसी ऐसी धार्मिक  सामाजिक संस्था से जुड़कर हो सकती है जहां केवल तर्करहित परम्परागत ज्ञान ही न देकर उस परम्परागत ज्ञान की आधुनिक ज्ञान व विज्ञान से तुलना कर तर्क, बुद्धि व युक्ति पर सत्य सिद्ध होने वाली मान्यताओं व सिद्धान्तों का ज्ञान कराया जाता है।  क्या ऐसी संस्थायें हम लोग जान सकते हैं या वहां पहुंच सकते हैं? यह एक कठिन प्रश्न है। यद्यपि आर्य समाज में सत्य मान्याओं व सिद्धान्तों का प्रचार किया जाता है परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि जिस समाज से कोई व्यक्ति जुड़ रहा है वहां के संचालकगण किस प्रकार के हैं। वहां सत्य ज्ञान के प्रचार की समुचित व्यवस्था है या नहीं? आर्य समाज का सदस्य बनना बहुत अच्छी बात है परन्तु सावधानी से यह देखना चाहिये कि यदि वहां अभिलषित ज्ञान में कुछ बाधा है तो फिर वहां किसी स्वाध्यायशील व ज्ञानी व्यक्ति से सम्पर्क कर ईश्वर, जीवात्मा व उपासना आदि के ग्रन्थों का पता कर उसे प्रकाशकों से मंगा कर घर में बैठ कर सुविधानुसार पढ़ना चाहिये और उन सिद्धान्तों पर मनन करना चाहिये। इन विषयों के अनेक ग्रन्थ हैं जो किसी एक ही प्रकाशक से आसानी से पत्र, इमेल या फोन शुल्क देकर करके मंगाये जा सकते हैं।

वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय से हमें अपने अस्तित्व व सत्ता का यथार्थ ज्ञान होता है। हमारे अतिरिक्त संसार में जो सृष्टि की रचना-पालन व संहार करने वाली सत्ता “ईश्वर” है उसका भी तर्क, युक्ति व प्राचीन ऋषि परम्परा से चला आ रहा सत्य ज्ञान प्राप्त होता है। यदि जीवात्मा, ईश्वर का ज्ञान होने के साथ उपासना की सही पद्धति का ज्ञान भी हो जाये और हम उसे अपने जीवन में महत्व दें तो हमारी आत्मिक व सामाजिक उन्नति का होना सुनिश्चित हो जाता है। अतः इन विषयों के ग्रन्थों का अध्ययन करना प्रत्येक मनुष्य के लिए नितान्त आवश्यक है। इस श्रेणी के कुछ ग्रन्थों के नाम हैं, सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, 11 उपनिषद, 6 दर्शन,, चार वेद, स्वामी दयानन्द व स्वामी श्रद्धानन्द का जीवन चरित्र आदि। इन ग्रन्थों को पढ़ने से अनेकानेक विषयों का ज्ञान होगा और वह ज्ञान ऐसा है कि जो और कहीं उपलब्ध नहीं है। स्कूली पुस्तकों व व्यवसायिक पत्र-पत्रिकाओं में तो कुछ इच्छित सामग्री के मिलने का प्रश्न ही नहीं है। यह ऐसा ज्ञान है जिसे जानने के बाद हम अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य को जान व पहचान सकते हैं और उस पर सभी प्रकार से विचार कर उसकी सत्यता की पुष्टि होने पर उसे स्वीकार व अस्वीकार कर सकते हैं।

स्वाध्याय करते हुए यह बात महत्वपूर्ण हैं कि हमने जो पढ़ा-लिखा हुआ है उसका दुष्प्रभाव हमारे वर्तमान अध्ययन के विषयों पर न पड़े। होता यह है कि हमने अनेक विषयों का विपरीत प्रकार का साहित्य या विचार सुने व पढ़े हुए होते हैं। जब हम उनके विपरीत कोई उचित व सत्य बात पढ़ते हैं तो हमारे पुराने संस्कार उसमें बाधक हो जाते हैं और हमें वह सत्य विचार, मान्यतायें व सिद्धान्त एक दम स्वीकार नहीं होते हैं। इस कारण कई अध्येता उन बातों की सम्यक पड़ताल न कर उनके विरोधी हो जाते हैं और अपना अध्ययन बन्द कर देते हैं। इससे अध्ययनकत्र्ता को हानि होती है। जब भी हम किसी विषय का अध्ययन करें तो यह अति आवश्यक है कि हम अपने पूर्व के विचारों को उस अध्ययन में बाधक न बनने दें। जब कहीं ऐसी स्थिति बने तो नये विचारों को और गहराई से अध्ययन करें। अपने पूर्व निश्चित विचारों की भी अच्छी तरह से पड़ताल करें। किसी विषय के विशेषज्ञ विद्वान की सहायता भी ले सकते हैं। ऐसा करके सत्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करें। आजकल सर्व़त्र ऐसा देखने में आ रहा है कि लोगों के कई विषयों में सत्य के विपरीत विचार हैं परन्तु उन्हें उनका ज्ञान ही नहीं हो पाता। वह अज्ञानतावश या स्वार्थ से प्रेरित होकर सत्य का विरोध करते हैं। ऐसा सभी मतों व सम्प्रदायों में हो रहा जो कि सामाजिक एकता व सुख शान्ति में बाधा पहुंचाता है और इससे मनुष्य की व्यक्तिगत हानि भी होती है।

स्वाध्याय की बात चल रही है तो वेद की चर्चा करना भी सार्थक है। वेद ज्ञान की पुस्तकें हैं और इतिहास की दृष्टि से यह संसार की सभी पुस्तकों से प्रथम, प्राचीनतम् व आदि ज्ञान है। वेदों का जो ज्ञान है उसकी श्रेष्ठता की तुलना में संसार में कोई अन्य ग्रन्थ नहीं है। यह ऐसा ग्रन्थ है जिसमें ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति के बारे में सत्य व यथार्थ ज्ञान है जबकि पिछले 5,000 वर्षों में महर्षि दयानन्द व उनके अनुयायियों के लिखे ग्रन्थों के अतिरिक्त अध्यात्म या समाजिक विषयों पर जो ग्रन्थ उपलब्ध हैं, उनमें पूर्ण सत्य व यथार्थ ज्ञान नहीं पाया जाता। यही कारण है कि वेद आज भी सबसे अधिक प्रासंगिक, उपयोगी, उपादेय व अपरिहार्य हैं। वेदों की भाषा भी किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसकी शब्द रचना और व्याकरण संसार की भाषाओं में सर्वोत्तम है। वेदों के शब्द धातुज या यौगिक हैं जबकि यह गुण संसार की अन्य किसी भाषा में नहीं है। यह ज्ञान संसार में कहां से आया, कौन इसका लेखक है, इन प्रश्नों पर विचार करने पर यह तथ्य सामने आता है कि प्राचीनता की दृष्टि से सबसे प्राचीन होने के कारण यह ज्ञान मनुष्य वा मनुष्यों की रचना नहीं है। मनुष्यों में यह सामर्थ्य नहीं है कि वह प्रथम भाषा का निर्माण या रचना कर सकें। बच्चा जब पैदा होता है तो उसके शरीर में बोलने के सभी साधन व यन्त्र होते हैं परन्तु उसे भाषा माता-पिता, आचायों व अन्य मनुष्यों से सीखनी पड़ती है। यदि यह लोग उसके साथ बात-चीत न करें तो बच्चा कभी भी बोलना नहीं सीख सकता। बच्चा व बाद में युवक या प्रौढ़ व्यक्ति जो भी ज्ञान रखता है, वह उसने दूसरों से सीखा होता है। इसी कारण से पुस्तकों का महत्व है कि जो ज्ञान कहीं से न मिले तो वह पुस्तक से मिल जाता है। प्राचीन काल में जब ईश्वर ने अमैथुनी सृष्टि में मनुष्यों को बनाया तो युवावस्था में बनाने पर भी उनको बोलना सिखाने के साथ जीवनयापन करने हेतु समस्त प्रकार का ज्ञान दिये जाने की आवश्यकता थी। प्राचीन आरम्भिक मनुष्य बोलना ही जानते थे तो वह भाषा व ज्ञान को उत्पन्न कैसे करते? ज्ञान भाषा में निहित होता है। बिना भाषा से मनुष्य सोच नहीं सकता। चिन्तन व मनन के लिए किसी न किसी भाषा की आवश्यकता होती है। एक भाषा के उपलब्ध होने पर कुछ नकल कर व उसमें विकार उत्पन्न कर नई भाषा अस्तित्व में आ सकती है व समय के साथ स्वमेव आ जाती है परन्तु प्रथम भाषा तो केवल सर्वज्ञ व सर्वान्तर्यामी चेतन ईश्वर से ही प्राप्त होती है। वैदिक संस्कृत भाषा ईश्वर से ही प्राप्त हुई ससार की प्रथम भाषा है। वेद भी ईश्वर से प्राप्त वह ज्ञान है जो सृष्टि रचना के बाद अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न प्रथम चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा की अन्तरात्माओं में ईश्वरीय प्ररेणा से अर्थ सहित प्रदान किया गया था। इन चार ऋषियों ने अध्यापन व उपदेश आदि के द्वारा इसे अन्य मनुष्यों के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया। सृष्टि का आदि ज्ञान “चार वेद” और इनकी भाषा “वैदिक संस्कृत” भी परमात्मा द्वारा रचित व सारी सृष्टि के हमारे प्रथम पीढ़ी के पूर्वजों को प्रदान किये जाने से संसार के प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करे और अपना सर्वोपरि कर्तव्य मानकर इस भाषा को सीखे और वेदों के ज्ञान की परीक्षा कर इसकी अन्य सभी घार्मिक पुस्तकों से तुलना करें तथा  सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करे। यह सब कार्य स्वाध्याय, अध्ययन, विचार, चिन्तन व मनन के द्वारा मनुष्यों को करने है जो परस्पर पूरक होने से इन्हें स्वाध्याय के अन्तर्गत परिगणित कर सकते हैं।

प्राचीन काल में हमारे समस्त ऋषि-मुनि, मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम, योगेश्वर कृष्ण, अद्वितीय वीर हनुमान, महामति चाणक्य, महर्षि दयानन्द सरस्वती आदि ने जो यश व कीर्ति अर्जित की, उसका कारण वैदिक ज्ञान व उनका स्वाध्याय ही था। वैदिक साहित्य के अध्ययन व इनका स्वाध्याय कर हम पुनः अपने विख्यात व कीर्ति वाले पूर्वजों के समान उत्तम संस्कारों वाले मनुष्यों को उत्पन्न कर सकते हैं। हम समझते हैं कि यदि हम अपने जीवन में भली प्रकार से समय का विभाजन करें तो हम स्वाध्याय के लिए पर्याप्त समय निकाल सकते हैं। 1 घंटा प्रतिदिन वैदिक साहित्य के स्वाध्याय को देना कठिन कार्य नहीं है। यदि कोई मनुष्य यह व्रत या संकल्प लेकर स्वाध्याय आरम्भ करता है तो हम समझते हैं कि एक-दो वर्ष में ही वह अधिकांश वैदिक साहित्य का अध्ययन कर सकता है। इसका कारण हमारी यह गणना है कि मनुष्य एक धंटे में लगभग 15 पृष्ठ पढ़ता है। एक वर्ष में वह 5475 पृष्ठ हो जाते हैं। इस प्रकार से इन पृष्ठों में सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय, 11 उपनिषद, 6 दर्शन व वेदों का अधिकांश भाग पढ़ा जा सकता है। यदि भविष्य में देश में समस्त वैदिक साहित्य का अध्ययन अनिवार्य विषय हो जाएँ तो हमें लगता है कि इससे वह काल वैदिक काल के समान स्वर्णिम काल बन जायेगा जहां न कोई अन्धविश्वास, न पाखण्ड, न कुरीतियां, न मिथ्या पूजा, न फलित ज्योतिष और न असमानता, विषमता, जन्मना जातिवाद या छुआछूत जैसी बातें होंगीं। एक मत, एक विचार, एक भाषा, एक भाव की स्थिति होगी। इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए सर्वसम्मति के आधार पर व्यापक स्तर पर प्रयास होने चाहिये जिसमें किसी भी स्तर पर राजनैतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिये। यह महान लक्ष्य स्वाध्याय, अध्यययन-अध्यापन, उपदेश, वार्ता व सत्य व असत्य का विचार व शास्त्रार्थ आदि से प्राप्त किया जा सकता है। आईये, हम नित्य प्रति अधिक से अधिक स्वाध्याय का व्रत लें और मनुष्य के परम धर्म वेदों का पढ़ना-पढ़ाना व सुनना-सुनाना को अपने व दूसरों के जीवन में चरितार्थ कर भौतिक समृद्धि के साथ धर्म-अर्थ-काम व मोक्ष के पथिक बनें।

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