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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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pmराघवेंद्र प्रसाद मिश्र

लोकसभा चुनाव 2014 में होने हैं और इसके मध्य चुनाव होने के कोई आसार भी नजर नहीं आ रहे है। ऐसे समय में कांग्रेस व भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का मंथन करने का क्या औचित्य? मीडिया जगत को भी खबरों की विश्वसनीयता के संकट को देखते हुए ऐसे मुद्दे पर केंद्रित होने की जगह देश में व्याप्त समस्याओं पर बहस करना चाहिये, क्योंकि इस बहस से जनता का कुछ भी भला होने वाला नहीं है।

 

देश महंगाई, कुपोषण, आवास व रोजगार के घटते अवसर से गुजर रहा है और देश की राजनीतिक पार्टियां प्रधानमंत्री के उम्मीदवार की खोज में जुटी हैं। एक समय था जब जन समस्याओं को लेकर गंभीर बहस होती थी और उसे सुलझाने की दिशा में सरकार के साथ विपक्ष भी मुखर होकर सहयोग के लिए अग्रसर नजर आता था। आज जब समस्या माध्यम जगत में काफी हो गया है, जिसका लाभ लोगों को मिलना चाहिये, लेकिन राजनीतिक दल इनका दुरुपयोग कर राजनीतिक हित साधने में लगे हुए हैं। पृथक तेलंगाना की मांग व कर्नाटक में बागी विधायकों के चलतें जहां कांग्रेस व भाजपा अपनी अंदरूनी कलह से जूझ रही है, ऐसे समय में पार्टी नेताओं की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की चर्चा करना कहां तक सैद्धांतिक होगा। जाहिर सी बात है मीडिया जगत के माध्यम से लोगों को गुमराह करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। लोकसभा चुनाव 2014 में होना है और मध्य में चुनाव होने के कोई आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं, ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी की बात करने की क्या जरूरत। कांग्रेस हो या भाजपा उम्मीदवार तो पार्टी के संसदीय बोर्ड को तय करना है, वह भी उस समय जब चुनाव हो जाएंगे और पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में होगी। देश के सामने तमाम चुनौतिया मुहं बाये खड़ीं हैं। भारत-पाक सीमा पर सैनिकों की नृशंस हत्या, पेट्रो मूल्य वृद्धि, बेरोजगारी की बढ़ती समस्या आदि जैसे मुद्दे पर चर्चा की जगह मीडिया जगत में प्रधानमंत्री पद के लिए बहस करना राजनीतिज्ञों व मीडिया जगत में आई गिरावट को दर्शा रहा है। मीडिया जगत को अपने दायित्व के प्रति जवाब देना होगा, क्योंकि जिस तरह से खबरों को लेकर विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो रहा है, वह आने वाले समय के लिए ठीक न होगा। जनप्रतिनिधि जनसमस्याओं से अगर दूर हो रहे हैं तो इसका एक कारण यह भी है कि ससंद में बहस न होना। संसद में हंगामा करना विपक्ष की भूमिका में शामिल है पर उठाये गए मुद्दे का संतोषजनक जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी बनती है। पृथक तेलंगाना की मांग को लेकर जहां कांग्रेसी सांसदों में बीच मतभेद साफ दिख रहा है वहीं भाजपा के बागी विधायकों ने कर्नाटक सरकार को संकट में डाल दिया है। ऐसे समय में दोनों पार्टी के सामने विश्वास बहाली की चुनौती उत्पन्न हो गई है। भाजपा में अंदरूनी कलह रह-रह कर सामने आती रहती है शयद इसी कारण वह निरंतर अपना जनाधार खोती जा रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए जिस तरह से यशवन्त सिन्हा का विरोध उभर कर सामने आया उससे यही लगता है कि पार्टी में घोर अनुशासन की कमी है। यह अलग बात है कि भाजपा ने अचानक राजनाथ सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर पार्टी में उभरे मतभेद का पटाक्षेप कर दिया हो पर यशवंत का नरेंद्र मोदी के प्रति दिया गया बयान कलह को साफ दर्शा रहा है। अच्छे कार्यों के लिए पार्टी नेताओं की तारीफ करना और किसी को पार्टी से ऊपर होकर प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बताना दोनों दो बातें हैं। यशवंत सिन्हा ने जिस तरह से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किये जाने का बयान दिया है वह हास्यास्पद है। सिन्हा को मोदी अगर प्रधानमंत्री पद लायक नजर आ रहे है तो उनको यह राय संसदीय समिति को देनी चाहिए क्योंकि यह तय करना उसका काम है। उनके इस बयान से पार्टी को हो सकता है कि 2014 में कुछ लाभ मिल सके पर घटक दल जदयू का मतभेद सामने आ गया है। जदयू किसी भी सूरत में मोदी को स्वीकारने को तैयार नहीं है। इससे पहले भी भाजपा की नेता सुषमा स्वराज, लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह व अन्य नेताओं ने भी मोदी की तारीफ की है। लेकिन जिस तरह से सिन्हा ने तारीफ के साथ नसीहत दे डाली यह सोची समझी रणनीति का हिस्सा लग रहा है। कांग्रेस में राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाये जाने के बाद महासचिव दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर राहुल की तरफ इशारा किया है इससे यह साबित हो रहा है दोनों पार्टियों के बीच तैयारी चल रही है। सवाल यह उठता है कि लोकसभा चुनाव 2014 में होना है। चुनाव जीतने के लिए जनता का विश्वास हासिल करने की जरूरत है, केवल चर्चा करने से कोई प्रधानमंत्री नहीं बन जाता। प्रधानमंत्री किसको बनाना है यह जनता तय करेगी। मीडिया को भी यह बात सोचना होगा कि प्रधानमंत्री का उम्मीदवार पार्टियां किसको घोषित करेगी यह उनकी सरदर्दी है, बेवजह की बहस करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। कुछ चैनलों ने अभी से सर्वे भी कर डाले हैं कि कौन बन सकता है देश का प्रधानमंत्री। ऐसे लोगों को इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि जब चुनाव नतीजे आते हैं तो सारे के सारे आंकड़े धरे रह जाते हैं। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के दौरान किसी ने यह नहीं सोचा था कि सपा को पूर्ण बहुमत मिल जाएगा। जब चुनाव परिणाम आया तो राजनीतिज्ञों की सारी मिथ्या दूर हो गई। राजनीतिज्ञ पंडित व मीडिया पार्टी के चुनाव जीतने का आकलन उसके किये गए विकास कार्यों के आधार पर करते हैं। जबकि सच यह है कि कुछ लोग विकास के नाम पर, कुछ पार्टी प्रेम पर, कुछ प्रलोभन और अधिकतर लोग जाति आधारित वोट करते हैं, जिसका भरपूर फायदा खासतौर पर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दल उठा रहे हैं। देश में व्याप्त समस्याओं के आधार पर पार्टियों की जीत-हार का आकलन लगाना इसलिए ठीक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस आधार पर अगर वोटिंग की जाती तो शायद ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति कुछ और होती। आजादी के इतने वर्षों बाद भी कई गांव आज ऐसे हैं जिन्हें बिजली की रोशनी नसीब नहीं हो सकी है। केंद्र सरकार की ओर से गरीब परिवारों के लिए इंदरा आवास योजना तो चलाई गई। इस योजना के तहत करोड़ों रुपए भी खर्च किये जा चुके हैं पर वास्तविकता की धरातल पर जाया जाए तो कई गरीब परिवारों को आज भी छत नसीब नहीं हो सका है।

 

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1 Comment on "प्रधानमंत्री उम्मीदवार के लिए इतना मंथन क्यों"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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जब तक देश में जनता खुद वंशवाद को नही दुत्कारेका तब तक नेताओं को दोष देने से बदलाव नही आयेगा.

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