लेखक परिचय

रमेश पांडेय

रमेश पांडेय

रमेश पाण्डेय, जन्म स्थान ग्राम खाखापुर, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश। पत्रकारिता और स्वतंत्र लेखन में शौक। सामयिक समस्याओं और विषमताओं पर लेख का माध्यम ही समाजसेवा को मूल माध्यम है।

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-रमेश पाण्डेय-
israel gaza

आतंकी संगठन हमास के शासन वाले गाजा पट्टी में इजरायली सेना के हमले जारी हैं। हमास की ओर से भी झुकने के कोई संकेत नहीं हैं और वह इजरायली इलाकों में रॉकेट हमले जारी रखे हैं। दोनों ओर से खेले जा रहे इस खूनी खेल में अब तक 604 फलस्तीनी और 29 इजरायली अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं। नागरिकों की मौतों के लिए इजरायली सेना ने हमास को जिम्मेदार ठहराया है। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका की ओर से किए जा रहे तमाम प्रयासों के बावजूद युद्धविराम के कोई संकेत नहीं हैं। कहा जाता है कि 70 साल पहले फिलीस्तीनियों द्वारा किया गया त्याग आज उन्हीं के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका है। हिटलर द्वारा भगाए गए हजारों शरणार्थियों को पनाह देने वाला फिलीस्तीन आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। बीते दिनों इजराइल ने गाजा में कई रॉकेट दागे, जिससे कई बेगुनाह बेमौत मारे गए। आश्चर्य यह है कि इजराइल के जुल्म को दुनिया चुपचाप देख रही है। खासतौर पर वे देश भी, जो पूरी दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाने का वादा करते हैं। मेरा सवाल उनसे है कि अगर उनके देश पर भी हमला होता, तो क्या वे चुप बैठते ? घोर दुर्भाग्य है कि एक तरफ, दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष वातानुकूलित कमरों में बैठकर अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का हल करने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ, एक राष्ट्र बरबादी के कगार पर पहुंच चुका है, जिसे देखने वाला कोई नहीं! यह और भी दुखद है कि पवित्र रमजान में माह में महिलाओं-छोटे बच्चों का कत्लेआम किया जा रहा है और दुनियाभर में इस नरसंहार पर कोई भी देश अपना मुंह नहीं खोल रहा। मानवीयता को शर्मसार करने वाले इस अभियान को इजराइल ने और तेज करने के लिए कहा है तो समझा जाना चाहिए कि वहां हालात कितने भयावह होंगे। अतः किसी देश के ऐसे उन्मादी कृत्य पर चुप्पी साधने की बजाए सभी को सामूहिक तौर पर इसका प्रतिकार करना चाहिए। मानवीय मामलों का समन्वय करने वाले संयुक्त राष्ट्र के संगठन ओसीएचए की रिपोर्ट में 21 जुलाई की दोपहर तीन बजे से 22 जुलाई की दोपहर तीन बजे तक मारे गए बच्चों के आंकड़े दिए गए हैं। ओसीएचए के मुताबिक इस दौरान कुल 120 फलस्तीनी लोग मारे गए. इनमें 26 बच्चे और 15 महिलाएं थीं। संगठन के मुताबिक जुलाई के पहले हफ्ते में गाजा में संघर्ष की शुरूआत होने के बाद से अब तक कुल 599 फलस्तीनी मारे गए हैं। इनमें से 443 आम लोग हैं। मरने वाले आम नागरिकों में 147 बच्चे और 74 महिलाएं शामिल हैं। इस संघर्ष में 28 इसराइली भी मारे गए हैं, जिनमें दो आम नागरिक और 26 सैनिक शामिल हैं। इस संघर्ष में 3504 फलस्तीनी घायल हुए हैं। इनमें 1,100 बच्चे और 1,153 महिलाएं शामिल हैं। इन आंकड़ों में उन मामलों को शामिल नहीं किया गया है, जिनकी पुष्टि नहीं हो पाई है।

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4 Comments on "इजराइली अत्याचार पर खामोशी क्यों"

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डॉ. मधुसूदन
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Common man in USA does not side with Muslims.

World Trade center collapse engineered by Islamic terrorist has not faded from the memory of the common citizen. That act alone had generated anti-Islamic feelings.

Law is supposed to be blind.
BUT COMMON MEN ARE NOT BLIND.
May be same everywhere.
(Excuse writing in English….a different Computer.)

शिवेंद्र मोहन सिंह
Guest
शिवेंद्र मोहन सिंह

शायद लेखक भांग के नशे में बैठ कर लेख लिख रहे हैं। या इन्हें भी धर्मनिरपेक्षता का चश्मा लग गया है। या तथाकथित पत्रकार बाकि लोगों को बेवकूफ समझते हैं। पहल किसकी तरफ से हुई थी ? फिलीस्तीनियों को क्यों सुझाव दे रहे कि रॉकेट मत दागो ? अभी इराक में सामूहिक कत्लेआम हो रहा था तब लेखक का नजर का चश्मा क्या उतर गया था? चूड़ियाँ हिन्दुओं ने पहनी हैं यहूदियों ने नहीं ।

mahesh
Guest

Sir, Actually islam is the mother of terrorism in this world. They want to kill all non muslims( Kafirs) in the name of Allah or Jehad..

That is the reason in the world non muslims are afraid from them and dont want to help any muslims or any muslim country…

I said live and lets live.. In our culture and religion..( In only hindu religion)
Sarve Bhavantu Sukhinaah..Sarve santu niramaya,, And Wasudev Kutumbkam.,

But in Islam and other religion too they don,t want to see other religion people happy and live peacefully…

So the result is Tit for Tat…

Thanks

योगी दीक्षित
Guest
योगी दीक्षित

हम क्यों दूसरों की फटी में टांग अड़ाएं? क्या हमास और फलस्तीन कश्मीर मुद्दे पर भारत का साथ देते हैं? संसद में इराक में ISIS द्वारा गैर मुस्लिमों पर अत्याचार और धमकियों पर बहस कराने की मांग क्यों नहीं होती? क्या गैर मुस्लिम इंसान नहीं हैं? बंगला देश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार पर बहस क्यों नहीं होती? संकट में कौन हमारे काम आता है? फलस्तीन या इज़रायल?

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