लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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शर्म इनको मगर नहीं आती

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-गिरीश पंकज-

बस्तर की धरती 11 मार्च को एक बार फिर लाल आतंक के कारण लाल हो गयी. 25 मई 2013 को नक्सलियों ने 32 लोगों का कत्लेआम किया था. दस महीने बाद उन्होंने फिर 16 लोगों की बर्बर हत्या कर दी. विभिन्न चैनलों पर प्रसारित नहीं किया और न इस मुद्दे पर कहीं कोई ही नज़र आयी। इन चैनलों को आखिर हुआ क्या है? क्यों ये विषय की गम्भीरता के अनुसार आचरण नहीं करते? क्या राजनीति ही इनके जीवन का लक्ष्य है? मान लिया कि राजनीति की चर्चा में भयंकर रस है मगर जीवन को लहूलुहान कर देने वाले खलनायकों की करतूतों पर भी चर्चा के लिए समय निकला जाना चाहिए, लेकिन समय निकलेगा नहीं, क्योंकि ये अंदर की बात है. राजनीति पर चर्चा करने से उन्हें आर्थिक लाभ मिलता है, मानवीय मुद्दों पर चर्चा करके केवल समय बर्बाद होता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग चालाक हो गए है. प्रिंट मीडिया अभी भी संवेदनशील है, उसने नक्सली हिंसा को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया और इस हिंसा को लेकर अग्रलेख लिखे, त्वरित टिप्पणियां भी कीं.

नक्सल समस्या राष्ट्रीय समस्या हो गयी है। इस समस्या पर गम्भीर होकर विमर्श की ज़रूरत है लेकिन दुर्भाग्य यही है कि सरकार और प्रशासन तंत्र में बिलकुल गम्भीर नज़र नहीं आता अगर होता तो कोई रास्ता निकालने की दिशा में सकारात्मक पहल होती। हर बार नक्सली हत्याए करते हैं और हर बार सरकार केवल निंदा करने का ही काम करती है. पुलिस वाले भी शर्मसार होते हैं और बेबस नज़र आते हैं. आखिर उनका सूचना तंत्र इतना विफल कैसे हो जाता है? नक्सली क्षेत्र में जवान अतिरिक्त तैयारी के साथ क्यों नहीं जाते? वहां फूंक-फूंककर कदम रखने की ज़रूरत है. पिछले महीने जब मैंने अपने कुछ पत्रकार साथियों के साथ अबूझमाड क्षेत्र की यात्रा की थी, तब मैंने देखा कि अबूझमाड़ क्षेत्र में जो सड़क बन रही है, उसकी सुरक्षा में तैनात जवानों की संख्या बहुत कम थी। यही कारण है कि नक्सली भरी संख्या में आकर हमला करते हैं। उनसे निबटने के लिए जवान भी पर्याप्त होने चाहिए लेकिन वहां कम संख्या में जवान तैनात हैं। नक्सली रणनीति बनाते हैं, एम्बुश लगाये रखते हैं, इसलिए सावधानी के साथ आगे बढ़ने की ज़रूरत है, जरा-सी चूक से अनेक ज़िंदगियां तबाह हो जाती हैं. 11 मार्च को भी यही हुआ। पहले नक्सलियों ने सड़क निर्माण में लगी गाड़ियों को आग के हवाले किया तो जवान उस और निकल गए और तभी रस्ते में छिपकर बैठे नक्सलियों ने चौतरफा हमला शुरू कर दिया. जवान इस बुरी कदर घिरे कि पंद्रह जवान मारे गए अनेक घायल हो गए और एक नक्सली भी नहीं मरा। उलटे नक्सली हथियार भी लूटकर ले गए. यह दुखद है, शर्मनाक है विफलता है। पुलिस वाले बेशर्मी के साथ कह रहे हैं कि हमें पता था कि नक्सली हमला हो सकता है तो भाई, कर क्या रहे थे? ऐसी सूचना का क्या क्या मतलब जो केवल सूचना भर रह जाए? आप की तैयारी क्या थी? जवान मर गए और पुलिस बहादुरी दिखा रही है कि हमें सूचना थी? मुखबिरो को लाखों रुपये दिए जा रहे हैं, ऐसा बताया जाता है, फिर भी जवान मारे जाते हैं, यह कैसा विफल तंत्र है? अब सरकार ने निर्णय किया है कि बस्तर में और अधिक जवानों की तैनाती की वहा फ़ोर्स बढ़ानी चाहिए, नक्सलियों के मुकाबले अभी भी फ़ोर्स वहां कम है.

हर बार जब कोई बड़ी वारदात होती है तो फट से एक जांच आयोग बैठा दिया जाता है, यह आयोग एक सफ़ेद हाथी साबित होता है। सरकार केवल है, शहीदों के लिए कुछ मुआवजे की घोषणाएं करती है, नक्सल समस्या कैसे ख़त्म हो, इस पर गम्भीरता से बात ही नहीं होती, क्यों नहीं नक्सलियों से बात का रास्ता निकला जाता? दुनिया में बड़े से बड़ी समस्याओं का अंत हुआ है, कहीं बातचीत के जरिये तो कही आक्रामक तरीके से, नक्सल समस्या का भी समाधान हो सकता है लेकिन ईमानदार पहल तो हो। राजधानी में बैठकर केवल निंदा करने से समस्या का हल नहीं निकल सकता। बस्तर में तैनात कजे ग्रामीणों का दल जीतना होगा। अबूझमाड़ की यात्रा के दौरान हमारे आम थी कि सीधे-सादे आदिवासियों को पुलिस वाले पकड़कर जेल भेज देते हैं। पता तो करो कि वह नहीं? हमारी पुलिस और जवान अपने कुशल व्यवहार से ग्रामीणों का दिल जीते। ग्रामीण अगर प्रताड़ित किये जायेंगे, तो उनके मन में दहशत रहेगी, गुस्सा रहेगा। वे सहयोग ही नहीं करेंगे और बिना उनके सहयोग के नक्सलियों तक पहुंचाना सम्भव नहीं। फ़ोर्स को विनम्र होना होगा। नक्सलियों और ग्रामीणो में फर्क करने का विवेक भी जाग्रत करना होगा।

कुल मिलाकर देखें तो नक्सल समस्या के समाधान की दिशा में अब मिल-जुलकर कार्रवाई की ज़रूरत है. पहले चरण में तो रास्ता वही गांधीवादी हो, नक्सलियों से बात तो हो, संवाद की स्थिति बने। नक्सलियों के कुछ बौद्धिक एजेंट जो साफ़-साफ़ पहचाने जाते हैं, उनकी मदद ली जाये, उन तक किसी तरह पहुंचकर बात तो हो, उनसे सवाल किया जाये कि पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स आखिर है क्या? नक्सली जवानों के ही दुश्मन नहीं है, वे आम लोगों की हत्याएं भी रहे हैं. पिछले साल झीरामघाटी में उन्होंने कांग्रेस के अनेक नेताओं की हत्या कर दी थी. लगता है कि नक्सलियों को हिंसा के खेल में आनंद मिलता है क्योंकि विचारधारा के स्तर पर देखें तो अगर उनका कोई एजेंडा है भी तो क्या उसका समाधान खराब ही है? क्या वे भी बातचीत के लिए हाथ नहीं बढ़ा सकते? आखिर वे क्या चाहते हैं? आदिवासियों की भलाई ही न? तो वे भी संवाद की लिए खुद आगे आ सकते हैं? बहुत हुआ हिंसा का तांडव। अब बस्तर को शान्ति का टापू बनाया जाये, जो वो कभी था. सरकार भी पहल करे, नागरिक भी करें. पत्रकारों ने नक्सलियों से मिलाने के लिए 26 जनवरी से 30 जनवरी 2014 को अबूझमाड़ की पदयात्रा की थी, एक बार फिर सर्वदलीय मार्च होना चाहिए. हजारों की संख्या में निहत्थे लोग नक्सलियों तक पहुंचे और उनसे बात करें. विश्वास है जन शक्ति के आगे ये नक्सल-शक्ति आत्मसमर्पण कर देगी। लेकिन प्रश्न यही है कि ऐसा कोई मार्च अब दोबारा कभी निकलेगा भी? लोग सरकारी मदद लेकर मार्च करना चाहते हैं. सुविधाजीवी जीवन चाहते हैं। बंद कमरों में बैठकर चर्चा करते हैं, मगर दुर्भाग्य यही है कि जिनको चर्चा करनी चाहिए, वे भी तो नहीं कर रहे हैं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग नक्सल हिंसा के खिलाफ चैनलों में लगातार कार्यक्रम कर सकते हैं, यहां लगातार बहस हो, शहरों के लोगों से राय मांगकर उसे प्रसारित किया जाए, ये चैनल क्या केवल हंसाने अथवा विज्ञापन कबाड़ने के लिए रह गए हैं? नक्सल हिंसा के विरुद्ध अधिकांश चैनलों की चुप्पी देखकर यही कहा जा सकता है कि शर्म इनको मगर नहीं आती. यह पंक्ति नक्सलियों के लिए भी है.

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