लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

Posted On by &filed under विविधा.


बाबर कोई मसीहा नहीं अत्याचारी, अनाचारी, आक्रमणकारी और इस देश के निवासियों का हत्यारा है

-लोकेन्‍द्र सिंह राजपूत

सितम्बर में अयोध्या (अयुध्या, जहां कभी युद्ध न हो) के विवादित परिसर (श्रीराम जन्मभूमि ) के मालिकाना हक के संबंध में न्यायालय का फैसला आना है। जिस पर चारो और बहस छिड़ी है। फैसला हिन्दुओं के हित में आना चाहिए क्योंकि यहां राम का जन्म हुआ था। वर्षों से यहां रामलला का भव्य मंदिर था, जिसे आक्रांता बाबर ने जमींदोज कर दिया था। एक वर्ग चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि निर्णय मुसलमानों के पक्ष में होना चाहिए, क्योंकि वे बेचारे हैं, अल्पसंख्यक हैं। उनकी आस्थाएं हिन्दुओं की आस्थाओं से अधिक महत्व की हैं। मुझे इस वर्ग की सोच पर आश्चर्य होता है। कैसे एक विदेशी क्रूर आक्रमणकारी का मकबरा बने इसके लिए सिर पीट रहे हैं। एक बड़ा सवाल है – क्या अत्याचारियों की पूजा भी होनी चाहिए? क्या उनके स्मारकों के लिए अच्छे लोगों के स्मारक को तोड़ देना चाहिए? (कथित बाबरी मस्जिद रामलला के मंदिर को तोड़कर बनाई गई है।), क्या लोगों की हत्या करने वाला भी किसी विशेष वर्ग का आदर्श हो सकता है? (बुरे लोगों का आदर्श बुरा हो सकता है, लेकिन अच्छे लोगों का नहीं। रावण प्रकांड पंडित था, लेकिन बहुसंख्यक हिन्दु समाज का आदर्श नहीं। कंस बहुत शक्तिशाली था, लेकिन कभी हिंदुओं का सिरोधार्य नहीं रहा। हिन्दुओं ने कभी अत्याचारियों के मंदिर या प्रतीकों के निर्माण की मांग नहीं की है। फिर एक अत्याचारी और विदेशी का मकबरा इस देश में क्यों बनना चाहिए? क्यों एक वर्ग विशेष इसके लिए सिर पटक-पटक कर रो रहा है।)

इतिहास-बोध और राष्ट्रभावना का अभाव

काबुल-गांधार देश, वर्तमान अफगानिस्तान की राजधानी है। १० वीं शताब्दी के अंत तक गांधार और पश्चिमी पंजाब पर लाहौर के हिन्दूशाही राजवंश का राज था। सन् ९९० ईसवी के लगभग काबुल पर मुस्लिम तुर्कों का अधिकार हो गया। काबुल को अपना आधार बनाकर महमूद गजनवी ने बार-बार भारत पर आक्रमण किए। १६ वीं शताब्दी के शुरू में मध्य एशिया के छोटे से राज्य फरगना के मुगल (मंगोल) शासक बाबर ने काबुल पर अधिकार जमा लिया। वहां से वह हिन्दुस्तान की ओर बढ़ा और १५२६ में पानीपत की पहली लड़ाई विजयी होकर दिल्ली का मालिक बन गया। परन्तु उसका दिल दिल्ली में नहीं लगा। वही १५३० में मर गया। उसका शव काबुल में दफनाया गया। इसलिए उसका मकबरा वहीं है।

बलराज मधोक ने अपनी पुस्तक ‘जिन्दगी का सफर-२, स्वतंत्र भारत की राजनीति का संक्रमण काल’ में उल्लेख किया है कि वह अगस्त १९६४ में काबुल यात्रा पर गए। वहां उन्होंने ऐतिहासिक महत्व के स्थान देखे। संग्रहालयों में शिव-पार्वती, राम, बुद्ध आदि हिन्दू देवी-देवताओं और महापुरुषों की पुरानी पत्थर की मूर्तियां देखीं। इसके अलावा उन्होंने काबुल स्थित बाबर का मकबरा देखा। मकबरा ऊंची दीवार से घिरे एक बड़े आहते में स्थित था। परन्तु दीवार और मकबरा की हालत खस्ता थी। इसके ईदगिर्द न सुन्दर मैदान था और न फूलों की क्यारियां। यह देख बलराज मधोक ने मकबरा की देखभाल करने वाले एक अफगान कर्मचारी से पूछा कि इसके रखरखाव पर विशेष ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? उसका उत्तर सुनकर बलराज मधोक अवाक् रह गए और शायद आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएं। उसने मधोक को अंग्रेजी में जवाब दिया था – “Damned foreigner why should we maintain his mausaleum.” अर्थात् कुत्सित विदेशी विदेशी के मकबरे का रखरखाव हम क्यों करें?

काबुल में वह वास्तव में विदेशी ही था। उसने फरगना से आकर काबुल पर अधिकार कर लिया था। परन्तु कैसी विडम्बना है कि जिसे काबुल वाले विदेशी मानते हैं उसे हिन्दुस्तानी के सत्ताधारी और कुछ पथभ्रष्ट बुद्धिजीवी हीरो मानत हैं और उसके द्वारा श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर तोड़कर बनाई गई कथित बाबरी मस्जिद को बनाए रखने में अपना बड़प्पन मानते हैं। इसका मूल कारण उनमें इतिहास-बोध और राष्ट्रभावना का अभाव होना है।

लगातार बाबर के वंशजों के निशाने पर रही जन्मभूमि :

पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी गुट लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद ने पिछले कुछ वर्षों में करीब आठ बार रामलला के अस्थाई मंदिर पर हमले की योजना बनाई, जिन्हें नाकाम कर दिया गया। ५ जुलाई २००५ को तो छह आतंकवादी मंदिर के गर्भगृह तक पहुंच गए थे। जिन्हें सुरक्षा बलों ने मार गिराया।

Leave a Reply

12 Comments on "क्यों बने आक्रांता का मकबरा?"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
इंसान
Guest
गए दिन D.P. Singh Baghel द्वारा लिखी टिप्पणी ने मानो फिर से विषय को हमारे समक्ष रखते प्रस्तुत आलेख की ओर मेरा ध्यान खींचा है और आज मुझे परिवर्तित राजनैतिक स्थिति में लगभग छः वर्ष पहले लिखीं बिल्ली (यूपीए शासन) के गले में घंटी (व्याख्या, समाधान) बांधते उलाहना अथवा विषय के लय को और आगे बढ़ाते अन्य टिप्पणियों में राजनीतिक टिप्पणीकार और प्रवक्ता.कॉम पर “कांग्रेस रेजिडेंट” को पढ़ने का अवसर मिला है| देखता हूँ कि फिरंगी ने हिन्दुओं और मुसलमानों में चिरस्थाई मत-भेद को बनाए रखने के लिए विषय के स्वतंत्रता के बहुत पहले के स्वरूप को १८८६ और तत्पश्चात… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
Guest
-मान्यवर प्रो. दंडवते जी, ईलियट और डोसन के प्रमाणिक प्रमाण के लिए साधुवाद. मेरे विचार में इस पुस्तक और ऐसी अन्य पुस्तकों पर घोषित नहीं अघोषित प्रतिबन्ध है. -कैसा अजीब देश बना डाला है भारत को हमारे शासकों ने जहां हमरी दुर्दशा करने वालों के स्मारक बनते हैं. सैंकड़ों महिलाओं के सतीत्व का हार्न करने वाले लार्ड दन्हौज़ी के नाम पर नगर बसा है, गुलामी के प्रतीक क्वीन बैटन को लेकर दौड़ लगाने में शर्म के स्थान पर प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं, मानवता के शत्रु क्रूर बाबर के स्मारक बनाने की वकालत बड़ी निर्लाज्जता से की जाती है. -१९४७… Read more »
D.P.Singh Baghel
Guest

Bhot khub ap hame garb h mahoday

इंसान
Guest

यदि आप रोमन लिप्यान्तरण न कर अपनी टिप्पणी देवनागरी में लिखते तो हमें आप पर भी गर्व करने का अवसर मिलता!

डॉ. मधुसूदन
Guest
बाबर कत्ल किए काफिरों की खोपडियों का ढेर लगाकर, मैदान में शामियाना तानकर, फिर उस ढेर को फेरे लगाकर खुशीसे मस्त होकर नाचा करता था। पर, एक बारकी बात जो (History of India as written by Own Historians)- में पढा हुआ याद है, कि जब खूनसे लथपथ ज़मिन हुयी और बाबर के पैरों तले खूनसे भिगने लगी, तो शामियाने को पीछे हटाना पडा। फिर भी मारे हुए काफ़िरों की मुंडियों का ढेर और बढता ही गया, और फिरसे बाबर के पैरोंतले ज़मिन रक्तसे भीगी, तो फिर और एक बार शामियाना पीछे हटाया गया । ऐसे बाबर का मकबरा सोच भी… Read more »
D.P.Singh Baghel
Guest

Bhot khub hame ap pe naj h 9795869904

bhagat singh
Guest
kisne kaha ki nirnai hinduo ke packh me ya musalmano ke packh me aana chahiye,yadi yaesa hi he to court ki bat hi kayo karte hain,aur fir aap logo ne to pahle hi kah diya hain ki nainai kuch bhi aaye mandir vahi banega. babar ke makbare ki bat aap hi kar rahe hain hindustan me to kisi ne nahi ki.aap log hi kahani gadhte hain fir uske ird gird nafrat ke vatvrakch lagate hain jise aane wali peedhiyo ko katna padta hain. ramlala ki pooja tak ke liye aapko mayavati sarkar ki daya par nirbhar rahnapadta hain jinke purvajo… Read more »
इंसान
Guest
भगत सिंह जी द्वारा किया उपरोक्त रोमन लिप्यान्तरण को पुनः हिंदी में लिख प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि उनकी टिप्पणी को ठीक से पढ़ा जा सके| “किसने कहा कि निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में या मुसलमानों के पक्ष में आना चाहिए? यदि ऐसा ही है तो कोर्ट की बात ही क्यों करते हैं और फिर आप लोगों ने तो पहले ही कह दिया है कि निर्णय कुछ भी आए मंदिर वहीं बनेगा| बाबर के मकबरे की बात आप ही कर रहे हैं हिन्दुस्तान में तो किसी ने नहीं की| आप लोग ही कहानी गढ़ते हैं फिर उसके इर्द गिर्द नफरत… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest
क्या आप सच्चे हृदय तल से न्याय में मानते हैं? यदि हां तो आगे पढें। बहुत सारे पाठक अपने आप को धर्म निरपेक्ष भी मान बैठे हैं। निम्न निकष पर आप वास्तव में “धर्म निरपेक्ष”ता की कसौटी कर सकते हैं। ॥प्रारंभ॥ न्यायाधिशको निर्णय ऐसेही करना होता है। न्याय की देवी इसी लिए आंख पर पट्टी बांधकर दिखायी जाती है। उसे न हिंदू दिखता है, न मुसलमान। उसे तो एक इन्सान और दूसरा इन्सान दिखायी देता है। वह एक को “क्ष” नामसे जानता है, दूसरे को “य”। क्या आप ऐसा निर्णय कर सकते हैं? यदि हां, तो अब आप पूरे इतिहासको… Read more »
wpDiscuz