लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भः- फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा

 

प्रमोद भार्गव

देरी और दलाली से अभिशप्त रहे रक्षा सौदों में राजग सरकार के वजूद में आने के बाद से लगातार तेजी दिखाई दे रही है। इस स्थिति का निर्माण करना सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए जरूरी था। वरना रक्षा उपकरण खरीद के मामले में संप्रग सरकार ने तो लगभग हथियार डाल दिए थे। रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के चलते तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी तो इतने मानसिक अवसाद में आ गए थे कि वे हथियारों की खरीद को टालना ही अपनी उपलब्धि मानने लगे थे। नतीजतन,हमारी तीनों सेनाएं शस्त्रों की कमी का अभूतपूर्व संकट झेल रही थीं। अब जाकर नरेंद्र मोदी सरकार ने इस गतिरोध को तोड़ा है और लगातार हथियारों व उपकरणों की खरीद का सिलसिला आगे बढ़ रहा है। इसी सिलसिले की अगली कड़ी फ्रांस से हुआ 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीदी सौदा है। यह जानकर हैरानी होगी कि पिछले 17 साल से देश की सरकारों ने कोई लड़ाकू विमान नहीं खरीदा है। इसलिए इस खरीद को विपक्ष विवादों की उड़ान कहकर भले ही आत्मतुष्ट होता रहे,अंततः इस खरीद का स्वागत ही होना चाहिए।

भारत आए फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 36 लड़ाकू राफेल विमानों के सौदे को खरीद के अंतिम चरण में पहुंचा दिया है। हालांकि इस सौदे में अभी विमानों के मूल्य को लेकर गतिरोध बना हुआ है। फिलहाल एक विमान की कीमत फ्रांस एक हजार करोड़ रुपए बता रहा है,जो भारत को मंजूर नहीं है। भारत इस कीमत को कम कराने में लगा है। हालांकि खरीद से संबंधित अंतर सरकारी रूपरेखा समझौते पर दस्तखत हो चुके हैं।

यह सौदा फ्रांसीसी कंपनी दासौ से हुआ है। इस सौदे को अंजाम तक पहुंचाने की पहल वायु सैनिकों को संजीवनी देकर उनका आत्मबल मजबूत करने का काम करेगी। क्योंकि पिछले 17 साल से हमारी केंद्र सरकारें नए लड़ाकू विमान खरीदने में नाकाम रही हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे हुई बातचीत के बाद यह सौदा अंतिम रुप ले पाया है। इस लिहाज से सौदे के दो फायदे देखने में आ रहे हैं। एक हम यह भरोसा कर सकते हैं कि ये युद्धक विमान जल्दी से जल्दी हमारी वायुसेना के जहाजी बेड़े में शामिल हो जांएगे। दूसरे,इस खरीद में कहीं भी दलाली की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है,क्योंकि सौदे को दोनों राष्ट्र प्रमुखों ने सीधे संवाद के जरिए अंतिम रूप दिया है।

पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह और रक्षा मंत्री एके एंटनी की साख ईमानदार जरूर थी,लेकिन ऐसी ईमानदारी का क्या मतलब,जो जरूरी रक्षा हथियारों को खरीदने की हिम्मत ही न जुटा पाए ? जबकि ईमानदारी तो व्यक्ति को साहसी बनाने का काम करती है। हालांकि रक्षा उपकरणों की खरीदी से अनेक किंतु-परंतु जुड़े होते हैं,सो इस खरीद से भी जुड़ गए हैं। यह सही है कि जंगी जहाजों का जो  सौदा हुआ है वह संप्रग सरकार द्वारा चलाई गई बातचीत की अंतिम परिणति है। इस खरीद प्रस्ताव के तहत 18 राफेल विमान फ्रांस से खरीदे जाने थे और फ्रांस के तकनीकी सहयोग से स्वेदेशीकरण को बढ़ावा देने की दृष्टि से 108 विमान भारत में ही बनाए जाने थे। स्वदेश में इन विमानों को बनाने का काम हिंदुस्तान एयरोनाॅटिक्स लिमिटेड ;एचएएल, को करना था,ये शर्तें अब इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं। इससे मोदी के ‘मेक इन इंडिया‘ कार्यक्रम को धक्का लगेगा। क्योंकि तत्काल युद्धक विमानों के निर्माण की तकनीक भारत को मिलने नहीं जा रही है ? जाहिर है, जब तक एचएएल को यूरोपीय देशों से तकनीक का हस्तांतरण नहीं होगा,तब तक न तो स्वेदेशी विमान निर्माण कंपनियों का आधुनिकीकरण होगा और न ही हम स्वेदेशी तकनीक निर्मित करने में आत्मनिर्भर हो पाएंगे। इसलिए मोदी कुछ विमानों के निर्माण की शर्त भारत में ही रखते तो इस सौदे के दीर्घकालिक परिणाम भारत के लिए कहीं बेहतर होते । हालांकि दासौ ने भरोसा जताया है कि इन विमानों के निर्माण की संभावनाएं भारत में तलाशेगी। लेकिन निर्माण की यह शर्त समझौते में बाध्यकारी नहीं है। हालांकि दासौ कंपनी विमानों के रखरखाव की तकनीक हस्तांरण करने को जरूर तैयार हो गई है।

rafael विमानों की इस खरीद में मुख्य खामी यह है कि भारत को प्रदाय किए जाने वाले सभी विमान पुराने होंगे। इन विमानों को पहले से ही फ्रांस की वायुसेना इस्तेमाल कर रही है। हालांकि 1978 में जब जागुआर विमानों का बेड़ा ब्रिटेन से खरीदा गया था,तब ब्रिटिश ने हमें वही जंगी जहाज बेचे थे,जिनका प्रयोग ब्रिटिश वायुसेना पहले से ही कर रही थी। लेकिन  हरेक सरकार परावलंबन के चलते ऐसी ही लाचारियों के बीच रक्षा सौदें करती रही हैं। इस लिहाज से जब तक हम विमान निर्माण के क्षेत्र में स्वावलंबी नहीं होंगे,लाचारी के समझौतांे की मजबूरी झेलनी ही होगी। शायद इसीलिए भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इस खरीद को विवादों की उड़ान की संज्ञा देते हुए,इसकी खामियों की पूरी एक फेहरिष्ट जारी कर दी है। स्वामी का दावा है कि लीबिया और मिस्त्र में राफेल जंगी जहाजों का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। दूसरे,राफेल विमानों में ईंधन की खपत ज्यादा होती है और कोई दूसरा देश इन्हें खरीदने के लिए तैयार नहीं है। तीसरे,कई देशों ने राफेल खरीदने के लिए इसकी मूल कंपनी दोसौ से एमओयू किए,लेकिन बाद में रद्द कर दिए। इन तथ्यात्मक आपत्तियों के अलावा स्वामी ने सौदे को आड़े हाथ लेते हुए कहा है कि यदि फ्रांस की मदद ही करनी थी तो इन विमानों को खरीदने की बजाय,दिवालिया हो रही दोसौ कंपनी को ही भारत सरकार खरीद लेती ? बावजूद इस सौदे की एक अच्छी खुबी यह है कि सौदे की आधी धनराशि भारत  में फ्रांसीसी कंपनी को निवेश करना अनिवार्य होगा।

इन सब तोहमतों के बावजूद ये विमान खरीदना इसलिए जरूरी था,क्योंकि हमारे लड़ाकू बेड़े में शामिल ज्यादातर विमान पुराने होने के कारण जर्जर हालत में हैं। अनेक विमानों की उड़ान अवधि समाप्त होने को है और पिछले 17 साल से कोई नया विमान नहीं खरीदा गया है। इन कारणों के चलते आए दिन जेटों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं सामने आ रही हैं। इन दुर्घटनाओं में वायु सैनिकों के बिना लड़े ही शहीद होने का सिलसिला बना हुआ है और वायु सेना की मारक क्षमता इतनी कमजोर हो चुकी है कि भारत लंबे समय तक इंतजार की स्थिति में नहीं है। पाकिस्तान और चीन की बढ़ती चुनौतियों के चलते भी यह सौदा बेहद जरूरी था। फ्रांस भारत की इन लाचारियों से अवगत था,शायद इसीलिए उसने परमाणु ऊर्जा समझौते की पहली शर्त राफेल विमान खरीदने की रखी थी।

हकीकत तो यह है कि मोदी सरकार को अब लाचारियों से भरी ऐसी खरीदों के स्थायी समाधान तलाशने की जरूरत है । उसे एचएएल एवं डीआरडीओ जैसी संस्थाओं का आधुनीकिकरण और स्वेदेशीकरण करने की जरूरत है। फिलहाल हमारे यहां हल्के युद्धक विमान और आधुनिकतम हल्के किस्म के हेलीकाॅप्टर बनाए जा रहे हैं। टाटा कंपनी सी-130 माॅडल के विमानों के पुर्जे भारत में बनाकर दूसरे देशों में निर्यात कर रही है।  जब ऐसा संभव है तो हम अपने ही देश के लिए शाक्तिशाली युद्धक विमानों का निर्माण क्यों नहीं कर सकते हैं ? एचएएल भारतीय कंपनियों को उपकरण व पुर्जे बनाने का लाइंसेंस देकर इस दिशा में उल्लेखनीय पहल कर सकती है। यदि ऐसा भविष्य में होता है तो हमारी उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और मोदी ‘मेक इन इंडिया‘ के स्वेदेशीकरण के जिस स्वप्न को दिखा रहे हैं, उसके साकार होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।

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