लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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नौकरशाह से जनसेवक बने शशि थुरूर पहली मर्तबा केंद्र में मंत्री बने हैं। मंत्री बनने के बाद भी उनके चाल चलन आचार विचार में कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं हो रहा है। पहले की ही तरह वे सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट पर ही अपनी टिप्पणी देने का क्रम जारी रखे हुए हैं।

हालात देखकर लगने लगा है मानो भारत सरकार का विदेश राज्यमंत्री का कार्यालय कागजों पर नहीं वरन् इंटरनेट की एक विशेष सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट पर ही चल रहा हो। लगता है कि शशि थुरूर के विभाग के कार्यालय में अगर किसी को किसी नस्ती (फाईल) को थुरूर से ओके करवाना हो तो उसे भी इस नेटवर्किंग वेबसाईट पर ही डालकर उनका अनुमोदन लेना होगा। माना कि इक्कीसवीं सदी में भारत का नया चेहरा इंटरनेट की टेक्नालाजी से लवरेज होगा, किन्तु थुरूर मामले में भारत सरकार की चुप्पी ने साफ जता दिया है कि प्रधानमंत्री भी चाहते हैं कि भारत सरकार के मंत्री टि्वटर, ऑरकुट, फेसबुक या दूसरी सोशल नेटविर्किंग वेवसाईट के माध्यम से अपना कामकाज निष्पादित करें।

मंत्री पद संभालने के बाद ही शशि थुरूर ने मंत्री जैसे बर्ताव के बजाए वालीवुड की सेलीब्रिटीज की तरह ही इंटरनेट पर अपने प्रशंसकों से सवाल जवाब का कभी न रूकने वाला सिलसिला आरंभ कर दिया। पहले कांग्रेस अध्यक्ष के हवाई जहाज में इकानामी क्लास में यात्रा करने के उपरांत इकानामी क्लास को केटल क्लास (मवेशी का बाडा) फिर काम के बोझ का हवाला देकर अपनी व्यस्तताएं उजागर करने पर उन्हें कांग्रेस की राजमाता और प्रधानमंत्री ने तगडी नसीहत दी थी। बावजूद इसके थुरूर का इंटरनेट का गुरूर कम होता नहीं दिखता।

अबकी बार थुरूर ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट पर भारत सरकार के ही वीजा संबंधी नियम कायदों के निर्णय के खिलाफत में अपने स्वर मुखर कर दिए हैं। अमूमन सरकार द्वारा जो निर्णय लिए जाते हैं उससे मंत्रीमण्डल के हर सदस्य को इत्तेफाक रखना ही होता है। सरकार के निर्णय के खिलाफ किसी भी मंत्री का सार्वजनिक बयान क्षम्य श्रेणी में कतई नहीं आता है।

जब हेडली और राणा जैसे सरगना देश में बेखौफ आ जा रहे हों तब वीजा नियमों का कडाई से पालन सुनिश्चित किया जाना भारत सरकार की पहली प्राथमिकता ही बनती है। विदेश राज्य मंत्री शशि थुरूर इन नियम कायदों में पता नहीं क्यों शिथिलता की हिमायत करते नजर आ रहे हैं। थुरूर का यह कथन भी बचकाना ही कहा जाएगा जिसमें उन्होंने कहा है कि 26/ 1 को अंजाम देने वाले आतंकियों के पास वीजा नहीं था, फिर भी हमला नहीं रोका जा सका।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने थुरूर के बचपने पर मोहर लगाते हुए कह ही दिया कि थुरूर धीरे धीरे राजनीतिक संस्कृति को समझ जाएंगे। थुरूर के बडबोलेपन पर परोक्ष तौर पर कटाक्ष करते हुए चतुर्वेदी कहते हैं कि पुरानी आदतों के बदलने में समय लगता ही है। वैसे थुरूर की दूसरी गल्ती पर प्रधानमंत्री उनसे नाखुश ही प्रतीत हो रहे हैं। पहली मर्तबा थुरूर के बडबोलेपन के बारे में प्रधानमंत्री ने स्वयं आगे आकर प्रकरण को शांत करवा दिया था, पर अब लगता है कि थुरूर को दूसरी गल्ति भारी पड सकती है।

राजनयिक से जनसेवक बने शशि थुरूर के अंदाजे बयां को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि थुरूर के पास राजनैतिक सोच समझ का जबर्दस्त अभाव है। वे इतना भी नहीं जानते हैं कि किस बात को किस मंच पर उठाया जाना चाहिए। सोशल नेटवर्किंग वेव साईट के दीवाने थुरूर हर किसी बात को ट्वीटर पर ही शेयर करते हैं। इससे एक तो वे विवादों में रहते हैं दूसरे टि्वटर की बिना मोल पब्लिसिटी भारत सरकार के माध्यम से ही हो रही है।

शशि थुरूर के टि्वटर के गुरूर ने विदेश मंत्री एम.एस.कृष्णा को भी कडे तेवर अपनाने पर मजबूर ही कर दिया। अंतत: कृष्णा को कहना ही पडा कि मैं हूं विभाग का बास और शशि थुरूर को करना होगा उनका अनुसरण। उनके अनुसार विदेश मंत्री नीतियां तय करते हैं और हर एक को उस नीति पर चलना ही होता है। अगर किसी को इसमें कोई खोट दिखे तो उसे सरकार के अंदर ही उठाया जाना चाहिए। कृष्णा का सीधा इशारा थुरूर के इंटरनेट प्रेम की ओर ही था।

वीजा नियमों के बारे में विदेश मंत्री शशि थुरूर की हायतौबा गलत नही मानी जा सकती है। दरअसल कोई भी विदेशी अगर भारत यात्रा पर आकर अगर 180 दिनों से ज्यादा का वक्त गुजारता है, तो उसे दुबारा भारत आने के लिए साठ दिनों का अंतराल जरूरी होता है। इसके बाद ही उसे वीजा मुहैया हो सकता है।

शशि थुरूर की पत्नि कनाडा मूल की नागरिक हैं और दुनिया के चौधरी अमेरिका के न्यूयार्क शहर में कार्यरत हैं। नए नियमों के अनुसार अगर उन्हें भारत आना होगा तो उन्हें दो माह का समय इंतेजार में बिताना होगा। थुरूर की वीजा मामले में हायतौबा वाकई इस मसले पर उनकी चिंता को जाहिर करती है या वे अपनी पत्नि को लुभाने का जतन कर रहे हैं, यह तो वे ही जाने पर थुरूर साहेब को पता होना चाहिए कि भारत गणराज्य का गृह मंत्रालय विशेष और वाजिब मामलों में इन नियमों को शिथिल भी कर देता है।

बहरहाल वीजा मामले में थुरूर को सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट पर भारी समर्थन मिला है, जिससे वे गदगद हैं और उन्होंने अपने शुभचिंतकों को धन्यवाद भी दिया है। अगर सत्तर के जमाने में थुरूर को मंत्री बना दिया जाता तो कव्वाली में मिली तालियों के बाद कव्वाल की तरह वे भी कह उठते -”पार्टी आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करती है।”

भारत ने वीजा के नियम कायदों में कडाई बरतने की मंशा बनाई। दुनिया के चौधरी अमेरिका ने इस पर स्पष्टीकरण मांग लिया। पहली मर्तबा कठोर हुई भारत सरकार ने साफ लहजे में अपना जवाब दे दिया। फिर बीच में ही बोल उठे थुरूर। थुरूर की इस तरह की बचकानी हरकतों से दुनिया भर में भारत सरकार की एकजुटता में ही कमी का गलत संदेश गया है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि अब इस तरह के प्रयोग बंद कर बडबोले शशि थुरूर को सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट के लिए पूरा समय निकालने के लिए मुक्त करें, क्योंकि थुरूर की प्रथमिकता भारत सरकार के बजाए इंटरनेट जो ठहरी।

-लिमटी खरे

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