लेखक परिचय

जगदीश यादव

जगदीश यादव

लेखक अभय बंग पत्रिका व अभयटीवी डॉट कम के सम्पादक हैं। संपर्क न. 09831952619/ 09804410919

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आजादी के बाद से ही तमाम राज्यों व शहरों से लेकर सड़को के नाम बदलने की मांग होती रही है। समाजशास्त्रियों व देश के इतिहास से लेकर तमाम मुद्दों की जानकारी रखने वालों का मानना है कि उक्त ढर्रे से वेस्ट बंगाल जो अब चलन के तौर पर पश्चिम बंगाल के नाम से जाना जा रहा है यह राज्य भी अछूता नहीं रहा है। कलकत्ता को बदलकर कोलकाता कर दिया गया। उदहरण के तौर पर हरिसन रोड़ महात्मा गांधी रोड बन गया लेकिन बंगाल की तकदीर नहीं बदल रही है। आजादी के बाद से ही शहर के साथ-साथ राज्य का नाम भी बदलने की मांग की जाती रही है। बदलाव के रथ पर सवार लोग पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘बांग्ला’ या बंग एक लम्बे अंतराल से करना चाह रहें थे। बदलाव की डफली बजा रहें लोगों का अपना तर्क है कि जब पूर्वी बंगाल व पूर्व पाकिस्तान स्वतंत्र बंग्लादेश हो गया तब पश्चिम बंगाल का नाम क्यों नहीं बदला जा सकता है। लेकिन सवाल तो यह भी है कि क्या नाम बदलकर क्या इतिहास और राज्य के भूगोल को भी बदला जा सकता है? कभी राज्य के नाम को बंग करने के लिये राज्य के तत्कालिन मुख्यमंत्री ज्योति बसु व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी उत्सुक रहें हैं। वैसे जानकारों की माने तो पश्चिम बंगाल के नाम के आगे “पश्चिम ‘शब्द निरार्थक नहीं है। दस्तावेजों की माने तो सिकंदर के द्वारा किये गये हमले के दौरान बंगाल में गंगारीदयी नामक साम्राज्य था। गुप्तश व मौर्य वंश के बाद में ‘शशांक’ बंगाल प्रदेश का नरेश बना। माना जाता है कि’शशांक’ की भूमिका सातवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उत्तर-पूर्वी भारत में महत्वापूर्ण रही।

उसके बाद ‘गोपाल’ ने पाल राजवंश की स्थापना की और पाल शासकों ने लगभग चार शताब्दियों तक राज्य किया। इनके उपरांत बंगाल पर सेन राजवंश का अधिकार तो रहा लेकिन दिल्ली के मुस्लिम शासकों ने इन्हें हराया। सोलहवीं शताब्दी में मुग़ल काल से पहले ही बंगाल पर अनेक मुस्लिम राजाओं और सुल्तानों ने शासन किया। कहते है कि इख़्तियारुद्दीन मुहम्मद बंगाल का पहला मुसलमान विजेता था। मुग़लों के बाद आधुनिक बंगाल का इतिहास ने फिर करवट बदला और सन 1757 में प्लासी का युद्ध ने इतिहास की धारा को मोड़ । इसके बाद ही अंग्रेज़ों ने पहली बार बंगाल और भारत में अपने पांव जमाए। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक कारणों से बंगाल को दो हिस्सों में विभक्त कर मुस्लिम बहुल क्षेत्र पूर्वी बंगाल और हिन्दू बहुल क्षेत्र पश्चिमी बंगाल बना दिया। 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल का विभाजन हुआ। बंग भंग की इस कारवाई ने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की चिंगारी जला दी। विभाजन का भारी विरोध हुआ, पर वह टला नहीं। बहरहाल 1947 में देश के विभाजन के बाद भी बंगाल विभाजित रहा। पूर्वी बंगाल, पूर्वी पाकिस्तान बना और पश्चिमी बंगाल भारत में रहा। वह नाम अबतक चला आ रहा 1947 के बाद देशी रियासतों के विलय का काम प्रारम्भ हुआ और राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की सिफारिशों के अनुसार पड़ोसी राज्यों के कुछ बांग्लाभाषी क्षेत्रों का पश्चिम बंगाल में विलय कर दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि अब नाम बदल जाने से क्या शहर का चरित्र या संस्कृति में बदलाव होगा गया ?

“सिटी आफ जाय’उपन्यास के फ्रांसीसी लेखक डोमिनिक ला ने महानगर कोलकाता का क्या खुब चित्रण किया है कि फुटपाथ पर रहने वाले गरीब, असहाय लोगों की आह क्या बाहरी शहर की अभिजात्य संस्कृति के नीचे दब गयी है? जुलूसों के शहर ‘कलकत्ता’ जो कि अब कोलकाता हो गया है। यहां बढ़ते अपराध के ग्राफ और आज भी खाने के लिये कूड़ेदान में जद्दो जहद करते लोग दिख जाते हैं। घंटे भर की बारीश से महानगर तालाब की शक्ल में तथाकथित लण्डन की सोच का मजाक व्यंग्य करे ही उड़ जाता है। अपराध व जरायम पेशादारों के कारण पुलिस-प्रशासन भी कई बार बौना साबित होते रहें हैं। ऐसे में फिर सवाल तो उठना लाजमी ही है कि नाम बदलने पर क्या राज्य की दिशा व दशा भी बदलेगा। या फिर बस यूं ही खास राजनीतिक स्वार्थ या किसी मंशा के तहत राज्य का नाम बंग या बांग्ला किया जाएगा। खैर एक बार फिर साबित हुआ कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी भाकपा हमेशा से ही तृणमूल कांग्रेस की चिर विरोधी रही है। लेकिन भाकपा ने अब राज्य का नाम बदलकर ‘बंगाल’ करने के मुद्दे पर ममता बनर्जी सरकार का यह कहते हुए समर्थन किया कि यह कदम वास्तविकता की झलक पेश करता है। राज्य का नाम बदलने के पश्चिम बंगाल सरकार के प्रस्ताव पर भाकपा महासचिव सुरवरम सुधाकर रेड्डी की माने तो उक्त कदम ठीक है और वह साथ में है।

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