लेखक परिचय

अमिताभ त्रिपाठी

अमिताभ त्रिपाठी

एक स्‍वतंत्र पत्रकार, जो देश, समाज व धर्म के लिए पूर्णत: समर्पित है।

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कुछ महीनों पूर्व कांग्रेस नीत संप्रग गठबंधन सरकार से इसके महत्वपूर्ण घटक तृणमूल कांग्रेस के समर्थन वापस लेने पर ऐसे कयास लगाये गये थे कि इस कदम से तृणमूल कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाडी मार ली है और इसकी नेत्री ममता बनर्जी को इससे कहीं अधिक नुकसान होगा और सरकार अधिक स्वतंत्रता से प्रशासन चला सकेगी और निर्णय ले सकेगी।

परंतु ऐसा लगता है कि जिस सरकार में प्रशासन चलाने जैसी कोई चीज ही नहीं है उसके लिये बहुमत या अल्पमत से कोई फर्क नहीं पडता है। अपनी दिशाहीनता और निकम्मेपन के चलते देश को हर मोर्चे पर गर्त में ले जाने वाली सरकार आज तो पूरी तरह कोमा में जाती दिख रही है।

गठबंधन के एक और प्रमुख घटक तमिलनाडु की डीएमके ने भी सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी है। हालाँकि कांग्रेस और मीडिया डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि के उस बयान से बहुत आस लगाये हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि 21 मार्च तक यदि सरकार ने हमारी माँगे मान ली तो हम समर्थन वापसी पर पुनर्विचार कर सकते हैं। परंतु यह पूरा मामला कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना का है।

एम करूणानिधि राजनीति के मँजे खिलाडी हैं और राजग सरकार के समय तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री प्रमोद महाजन ने उन पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी कि उनके काले चश्मे के चलते यह पता नहीं लग पाता कि उनकी नजरें कहाँ हैं। यही कुछ कांग्रेस के साथ हो रहा है। कांग्रेस ने डीएमके को बहुत लाचार और हर ओर से घिरा मानकर करुणानिधि की नजरों को नहीं पहचाना। एम करुणानिधि ने सरकार के सामने जो शर्तें रखी हैं उनका पालन असम्भव है। ये शर्तें पूरी तरह दशरथ से माँगे गये कैकेयी के दो वर हैं परंतु दिक्कत यह है कि यहाँ कांग्रेस और डीएमके दोनों ही ऐसे पात्र हैं जो राम के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते और रामसेतु गिराने पर आमादा हैं।

करुणानिधि ने सरकार से कहा है कि वह 21 मार्च को जेनेवा में अमेरिका द्वारा श्रीलंका के विरुद्ध आने वाले प्रस्ताव में “ जनसंहार” “ युद्ध अपराध” जैसे शब्द शामिल कराये। दूसरा भारत की संसद श्रीलंका के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करे। ये दोनों ही माँगे मानना सरकार के वश में नहीं है। जेनेवा में इतने आनन फानन में अपना पक्ष बदलना सम्भव नहीं है और न ही संसद में ऐसे किसी प्रस्ताव पर सरकार को विपक्ष का साथ मिलेगा। करुणानिधि इस बात को बखूबी जानते हैं और इसी कारण उन्होंने गेंद कांग्रेस के पाले में डाल दी है ताकि अस्थिरता का दोष उन पर न आये।

वास्तव में करुणानिधि का यह निर्णय अपेक्षित और बहुप्रतीक्षित था। जब से 2जी मामले में उनके मंत्री ए राजा और उनकी पुत्री कनिमोजी को जेल की हवा खानी पडी थी तभी से उनकी पार्टी में कांग्रेस को लेकर गुस्सा था परंतु समय और मुद्दे की प्रतीक्षा की जा रही थी। सरकार के कार्यकाल में अधिक समय रहते यदि यह निर्णय होता तो इसका अधिक नुकसान डीएमके को होता इसी कारण करुणाणिधि अपमान का घूँट पीते रहे परन्तु उनके लिये वह घटना शूर्पनखा की नाक कटने से कम नहीं थी। डीएमके को अब सही मुद्दा मिला है क्योंकि आने वाले समय में प्रवर्तन निदेशालय भी 2जी मामले में अपनी चार्जशीट दाखिल करने वाला है जिसमें कि मनी लान्ड्रिंग के मामले में भी ए राजा और कनिमोजी को फिर से जेल जाना पड सकता है । करुणानिधि इस बार चूकना नहीं चाहते। सुनने में आ रहा है कि डीएमके और कांग्रेस के सम्बंध तमिलनाडु में काफी खराब हो चुके हैं और 21 मार्च को औपचारिक रूप से सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद डीएमके राज्य में कांग्रेस से अपना गठबंधन भी तोड लेगी। डीएमके तमिलनाडु के फिल्मी कलाकार विजयकांत की डीएमडीके के साथ नया गठबन्धन बनाने की तैयारी में है जिसके पास कांग्रेस से अधिक जनाधार है।

डीएमके की घोषणा के बाद भले ही सरकार कह रही हो कि सरकार की स्थिरता पर कोई प्रभाव नहीं हुआ है और सरकार के पास बहुमत है पर यह बात सत्य है कि आने वाले समय में सरकार को और भी कठिनाइयों का सामना करना पडेगा। पिछले चार वर्षों से सीबीआई के सहारे कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों के नेताओं को साध कर रखा है परंतु अब नयी स्थिति में उनकी सौदेबाजी की ताकत बढ गयी है क्योंकि सीबीआई तो सरकार के अधीन तब रहेगी जब सरकार रहेगी और इस कारण सरकार के लिये अगला खतरा शीघ्र ही मुलायम सिंह यादव की ओर से आने वाला है।

 

पिछले कुछ महीनों से यह बात आम है कि मुलायम सिंह यादव सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की फिराक में हैं परंतु वे उस प्रतीक्षा में थे कि सरकार इस स्थिति में आ जाये कि उनके समर्थन वापस लेने से वह गिर जाये और मायावती भी उसके लिये कवच न बन सकें। अब ऐसी स्थिति बन रही है। नयी परिस्थितियों में इस बात की पूरी सम्भावना है कि सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र कमेटी की सिफारिशें न लागू होने का बहाना लेकर मुलायम सिंह भी सरकार से किनारा कर लें।

जिस प्रकार डीएमके अपने निजी कारणों से सरकार से समर्थन वापस लेना चाहती थी परंतु ऐसे मुद्दे और समय की तलाश में थी कि उसे इसका राजनीतिक लाभ भी मिले उसी प्रकार मुलायम सिंह यादव भी मजबूरी में सीबीआई के भय से सरकार के साथ हैं पर उपयुक्त अवसर की तलाश में हैं। ऐसे में इस बात की पूरी सम्भवना है कि वर्तमान सरकार अपना कार्यकाल पूरा न कर पाये और समय से पहले आम चुनाव हो जायें।

यदि समय से पहले चुनाव होते हैं तो जनता को यह तय करना होगा कि जिस प्रकार गठबंधन सरकारों के चलते आर्थिक नीति, विदेश नीति सहित अनेक मुद्दों पर सरकार को क्षेत्रीय दलों के दबाव का शिकार होना पडा है उसकी पुनरावृत्ति रोकने के लिये एक सशक्त नेता के नेतृत्व में एक दल की मजबूत सरकार केंद्र में स्थापित करने के लिये अपना जनादेश देना चाहिये ताकि पिछले अनेक वर्षों में देश की जो दुर्गति हुई है उसे ठीक किया जा सके।

 

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