लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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अशोक सिंह 

एक बार फिर संसद का सत्र खत्म हुआ और हमेशा की तरह महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण से जुड़ा बिल ठंडे बस्ते में ही रहा। दूसरी ओर सरकार भी आम सहमति बनाने के मूड में नजर नहीं आई। हालांकि सभी राजनीतिक दल एक सुर में महिला अधिकारों की बात करते हैं परंतु बिल को पारित करवाने के विशय पर बंटे नजर आते हैं। कुछ राजनीतिक दल आरक्षण में आरक्षण की मांग कर रहे हैं, ऐसे में यह सरकार का फर्ज बनता है कि वह इस दिशा में कोई ठोस पहल करे और एक ऐसा बिल प्रस्तुत करे जो सर्वमान्य हो। इन सब में सबसे अधिक आष्चर्य महिला सदस्यों के रूख से होती है जो पार्टी लाइन से उपर उठकर इसके समर्थन में आवाज बुलंद करने की बजाए पार्टी विचारधारा का समर्थन करती नजर आती है। देश के विकास में समान भागीदारी के लिए संसद में भले ही महिलाओं के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई परंतु ग्रामीण विकास में महिलाओं की भागीदारी सुनिष्चित करने के लिए भारत के 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में इसकी व्यवस्था अवश्यं की गई है। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में महिलाएं पंचायत में चुन कर आ रही हैं। अन्य राज्यों सहित झारखण्ड जैसे पिछड़े राज्यों में भी बड़ी संख्या में महिला जनप्रतिनिधि निकलकर सामने आयी हैं विषेशकर दलित व आदिवासी समुदाय की महिलाओं की संख्या उत्साहजनक रही है। महिलाओं को आरक्षण प्रदान करने के पीछे मूल भावना यह है कि ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिति में सुधार हो।

हालांकि पंचायत को महिलाओं के लिए सशक्त माध्यम बनाने की जिस प्रकार कल्पना की गई थी वह शायद अबतक अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है। यह एक बहुत अहम प्रष्न है कि पंचायतों में महिलाओं की भूमिका किस प्रकार सशक्त होनी चाहिए? महिलाएं आज प्रधान, उप-प्रधान, पंच व सदस्य, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पंचायत समिति तथा जिला पार्शद् अर्थात सभी पदों पर चुनी जा रही हैं। परंतु इसके बावजूद उनके कार्य क्षेत्र में कोई विशेष प्रगति होती नहीं दिख रही है। जिसपर गहन विचार विमर्ष करने की आवश्यधकता है। उन खामियों को ढ़ूढ़ने और उसे दूर करने की जरूरत है। मेरे विचार में चुनी गई महिलाओं को अच्छी तरह से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने की जरूरत है। पंचायत और समाज को यह विश्वाजस दिलाने की आवश्य्कता है कि वह केवल चुनी गई गुडि़या नहीं हैं कि उनके सारे काम पुरूष करेंगे और वह केवल उनपर हस्ताक्षर करेंगी। बल्कि उन्हें लोगों के साथ एक विश्वाकस और सम्मान का रिश्ता कायम करना जरूरी है। महिला प्रतिनिधियों को अपने कार्यक्षेत्र में व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की आवष्यकता है। वे अपने क्षेत्र के प्रत्येक व्यक्ति को आदर व सम्मान के साथ सुनें और उनकी परेशानियों के निवारण का उपाय ढूंढें। उनका लक्ष्य पूरे क्षेत्र का समेकित विकास होना चाहिए। अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों के बीच सामंजस्य बनाना, साथ ही महिला मण्डल, स्वयं सहायता समूह और अन्य महिला संगठनों को सशक्त करने के साथ-साथ उसे कार्यशील करना प्राथमिकता होनी चाहिए। जब भी वे कुछ कहें तो उसमें एक सकारात्मक दृश्टिकोण झलके। इससे न केवल वे अपनी बात समझाने और मनवाने में कामयाब होंगी बल्कि उनकी प्रतिश्ठा और गरिमा भी बढ़ेगी।

महिलाओं को अपनी भूमिका के निर्वाह हेतु इन तीन चीजों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है-स्वयं की क्षमता, पुरूषों तथा समाज का नजरिया व सहयोग, महिला और पुरूष का एक साथ तालमेल बैठाकर काम करना। महिलाओं को सशक्त करने के लिए उनकी क्षमतावृद्धि करना अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए प्रशिक्षण एक महत्वपूर्ण माध्यम है। महिलाओं को पुरूषों के साथ काम करने का सामंजस्य बैठाना ही पडे़गा, जिसके लिए सभी को विशेष प्रयास करने होंगे। हालांकि वास्तविकता यह है कि आज की तारीख में भी पंचायत राज में महिलाएं इतनी सशक्त, जागरूक और सक्रिय नहीं हैं, परन्तु 73वें संविधान संशोधन ने उन्हें आगे आने, नेतृत्व व अपने गांव या क्षेत्र का विकास करने का मौका प्रदान किया है। पंचायत में प्रधान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है ऐसे में एक महिला प्रधान की भूमिका काफी जिम्मेदारी भरा और चुनौतीपूर्ण होती है। सामान्यतः महिला प्रतिनिधियों को पंचायत की बैठक में नियमित व सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। महिला प्रतिनिधि, अन्य महिला ग्राम सभा सदस्यों का सहयोग लेकर पंचायत के विकास के लिए फैसले ले सकती हैं। पंचायत में महिलाओं की भागीदारी के पीछे विषेश कारण उनका सशक्तिकरण करना है ऐसे में चुनी गई महिला जनप्रतिनिधि महिलाओं की समस्याओं को अधिक कारगर ढ़ंग से समझ सकती हैं। साथ ही वह प्राथमिकता के आधार पर समस्याओं का समाधान करने में पहल कर सकती हैं। इसके लिए गांव में सक्रिय महिला मण्डल व स्वयं सहायता समूहों से नियमित सहयोग लेते की जरूरत है। अगर पंचायत बैठक में कोई महिला समस्या लेकर आती है तो उसे ध्यानपूर्वक सुनें व संतोशजनक जवाब देने का प्रयास करें। जिम्मेवारियों का स्वयं पालन करें। प्रखण्ड विकास कार्यालय या अन्य सरकारी विभाग में जाना पड़े तो अपने अन्य सहायोगी खासकर महिला प्रतिनिधियों का व महिला मण्डल का सहयोग लें।

किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए आवष्यक है कि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो। ऐसे में अपनी जानकारी को बढ़ाने के लिए उन्हें जहाँ एक ओर नियम व अधिनियम पढ़ने चाहिए वहीं दूसरी और विभिन्न स्रोतों से सूचनाएँ प्राप्त करें तथा उसका आदान प्रदान भी करें। इसके अलावा समय समय पर अन्य अतिरिक्त जानकारी के लिए पंचायत सचिव व अन्य बुद्धिजीवियों से सलाह करते रहने चाहिए। बुनियादी बात यह है कि उन्हें ग्राम पंचायत व ग्राम सभा की बैठक की अध्यक्षता व संचालन स्वयं करनी चाहिए तथा जाति, धर्म, वर्ण, लिंग, क्षेत्रवाद, पार्टीबाजी से ऊपर उठकर गांव व पंचायत का विकास पर जोर देना चाहिए। गांववालों को पंचायत से सबसे अधिक आशा सरकार द्वारा मिलने वाली सहायता से होती है। ऐसे महिला जनप्रतिनिधियों को लाभार्थियों का चयन बिना किसी दबाब के प्राथमिकता के आधार पर करनी चाहिए। पंचायत के विकास कार्यक्रमों में महिला जनप्रतिनिधियों को सशक्त भूमिका निभाने की जरूरत है। सामाजिक कुरीतियों जैसे-शराब, दहेज, पर्दा, शोषण तथा अन्य सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने में महिला जनप्रतिनिधि की भूमिका न सिर्फ पंचायत बल्कि समाज को भी एक नई दिशा प्रदान कर सकता है। (चरखा)

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