लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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motherडा. राधेश्याम द्विवेदी
स्तनपान के प्रति जन जागरूकता लाने के मक़सद से अगस्त माह के प्रथम सप्ताह को पूरे विश्व में स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। स्तनपान सप्ताह के दौरान माँ के दूध के महत्त्व की जानकारी दी जाती है। नवजात शिशुओं के लिए माँ का दूध अमृत के समान है। माँ का दूध शिशुओं को कुपोषण व अतिसार जैसी बीमारियों से बचाता है। स्तनपान को बढ़ावा देकर शिशु मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है। शिशुओं को जन्म से छ: माह तक केवल माँ का दूध पिलाने के लिए महिलाओं को इस सप्ताह के दौरान विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाता है। स्तनपान शिशु के जन्म के पश्चात एक स्वाभाविक क्रिया है। भारत में अपने शिशुओं का स्तनपान सभी माताऐं कराती हैं, परन्तु पहली बार माँ बनने वाली माताओं को शुरू में स्तनपान कराने हेतु सहायता की आवश्यकता होती है। स्तनपान के बारे में सही ज्ञान के अभाव में जानकारी न होने के कारण बच्चों में कुपोषण का रोग एवं संक्रमण से दस्त हो जाते हैं।
स्तनपान जरुरी क्यों है:- शिशु के लिए स्तनपान संरक्षण और संवर्धन का काम करता है। रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति नए जन्मे हुए बच्चे में नहीं होती है। यह शक्ति माँ के दूध से शिशु को हासिल होती है। माँ के दूध में लेक्टोफोर्मिन नामकतत्त्व होता है, जो बच्चे की आंत में लौह तत्त्व को बांध लेता है और लौह तत्त्व के अभाव में शिशु की आंत में रोगाणु पनप नहीं पाते। माँ के दूध से आए साधारण जीवाणु बच्चे की आंत में पनपते हैं और रोगाणुओं से प्रतिस्पर्धा कर उन्हें पनपने नहीं देते। माँ के दूध में रोगाणु नाशक तत्त्व होते हैं। माँ की आंत में वातावरण से पहुँचे रोगाणु, आंत में स्थित विशेष भाग के संपर्क में आते हैं, जो उन रोगाणु-विशेष के ख़िलाफ़ प्रतिरोधात्मक तत्त्व बनाते हैं। ये तत्त्व एक विशेष नलिका थोरासिक डक्ट से सीधे माँ के स्तन तक पहुँचते हैं और दूध के द्वारा बच्चे के पेट में। बच्चा इस तरह माँ का दूध पीकर सदा स्वस्थ रहता है। माँ का दूध जिन बच्चों को बचपन में पर्याप्त रूप से पीने को नहीं मिलता, उनमें बचपन में शुरू होने वाली मधुमेह की बीमारी अधिक होती है। बुद्धि का विकास उन बच्चों में दूध पीने वाले बच्चों की अपेक्षाकृत कम होता है। अगर बच्चा समय से पूर्व जन्मा (प्रीमेच्योर) हो, तो उसे बड़ी आंत का घातक रोग, नेक्रोटाइजिंग एंटोरोकोलाइटिस हो सकता है। अगर गाय का दूध पीतलके बर्तन में उबाल कर दिया गया हो, तो उसे लीवर (यकृत) का रोग इंडियन चाइल्डहुड सिरोसिस हो सकता है। इसलिए माँ का दूध छह-आठ महीने तक बच्चे के लिए श्रेष्ठ ही नहीं, जीवन रक्षक भी होता है।
स्तनपान की विशेषताएँ:- माँ के दूध की विशेषताओं के बारे में महिलाओं को ख़ासतौर पर विश्व स्तनपान सप्ताह के दौरान बताया जा रहा है। कहा जाता है कि माँ के दूध में ज़रूरी पोषक तत्व, एंटी बाडीज,हार्मोन, प्रतिरोधक कारक और ऐसे आक्सीडेंट मौजूद होते हैं, जो नवजात शिशु के बेहतर विकास और स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी होते हैं।
माँ का दूध सर्वोतम आहार:- एकनिष्ठ स्तनपान का अर्थ जन्म से छः माह तक के बच्चे को माँ के दूध के अलावा पानी का कोई ठोस या तरल आहार नहीं देना चाहिए। माँ के दूध में काफ़ी मात्रा में पानी होता है जिससे छः माह तक के बच्चे की पानी की आवश्यकताऐं गर्म और शुष्क मौसम में भी पूरी हो सकें। माँ के दूध के अलावा बच्चे को पानी देने से बच्चे का दूध पीना कम हो जाता है और संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है। प्रसव के आधे घण्टे के अन्दर-अन्दर बच्चे के मुँह में स्तन देना चाहिए। ऑपरेशन से प्रसव कराए बच्चों को 4- 6 घण्टे के अन्दर जैसे ही माँ की स्थिति ठीक हो जाए, स्तन से लगा देना चाहिए।
प्रथम दूध (कोलोस्ट्रम):- प्रथम दूध (कोलोस्ट्रम) यानी वह गाढ़ा, पीला दूध जो शिशु जन्म से लेकर कुछ दिनों (4 से 5 दिन तक) में उत्पन्न होता है, उसमें विटामिन, एन्टीबॉडी, अन्य पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं। यह संक्रमणों से बचाता है, प्रतिरक्षण करता है और रतौंधी जैसे रोगों से बचाता है। स्तनपान के लिए कोई भी स्थिति, जो सुविधाजनक हो, अपनायी जा सकती है। कम जन्म भार के और समय पूर्व उत्पन्न बच्चे भी स्तनपान कर सकते हैं। यदि बच्चा स्तनपान नहीं कर पा रहा हो तो एक कप और चम्मच की सहायता से स्तन से निकला हुआ दूध पिलायें। बोतल से दूध पीने वाले बच्चों को दस्त रोग होने का ख़तरा बहुत अधिक होता है अतः बच्चों को बोतल से दूध कभी नहीं पिलायें। यदि बच्चा 6 माह का हो गया हो तो उसे माँ के दूध के साथ- साथ अन्य पूरक आहार की भी आवश्यकता होती हैं। इस स्थिति में स्तनपान के साथ-साथ अन्य घर में ही बनने वाले खाद्य प्रदार्थ जैसे मसली हुई दाल, उबला हुआ आलू, केला, दाल का पानी, आदि तरल एवं अर्द्व तरल ठोस खाद्य पदार्थ देने चाहिए, लेकिन स्तनपान 1/2 वर्ष तक कराते रहना चाहिए। यदि बच्चा बीमार हो तो भी स्तनपान एवं पूरक आहार जारी रखना चाहिए। स्तनपान एवं पूरक आहार से बच्चे के स्वास्थ्य में जल्दी सुधार होता है।
बच्चों के लिए आहार (6 से 12 महीने):- बच्चों को स्तनपान के साथ-साथ अर्धठोस आहार, मिर्च मसाले रहित दलिया, खिचडी, चावल, दालें, दही या दूध में भिगोई रोटी मसल कर दें। एक बार में एक ही प्रकार का भोजन शुरू करें। भोजन की मात्रा व विविधता धीरे-धीरे बढ़ाए। पकाए एवं मसले हुए आलू, सब्जियाँ, केला तथा अन्य फल बच्चे को दें। बच्चे की शक्ति बढाने के लिए आहार में एक चम्मच तेल या घी मिलाएँ। स्तनपान से पहले बच्चे को पूरक आहार खिलायें।
कुपोषण:-विकास के लाख दावे करने के बावज़ूद भी विश्व में भारत एक अकेला ऐसा देश है जहाँ हर साल नवजात शिशुओं के जन्म दर और मृत्यु दर का अनुपात सबसे अधिक है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण सर्वेक्षण 2005-2006 के अनुसार देश के क़रीब 46% बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं। उत्तर प्रदेश में यह आँकड़ा लगभग 46% है। भारत में सबसे ज़्यादा कुपोषण से ग्रसित बच्चे मध्य प्रदेश में हैं। उत्तर प्रदेश में लगभग 40% बच्चे औसत दर्जे से कम भार के पैदा होते हैं। प्रत्येक साल 0 से 5 वर्ष तक की आयु वर्ग के बच्चों में होने वाली मृत्यु के अंतर्निहित कारणों में लगभग 60% मृत्यु कुपोषण के कारण होती है। कुपोषण की समस्या ग्रामीण छेत्रों में पिछड़ी जाति के लोगों, तथा अशिक्षित वर्ग के लोगों में अधिक व्याप्त है। कुपोषण की समस्या गर्भवती महिलाओं में व्यापक होने के कारण पैदा होने वाले बच्चे कम भार के होते हैं।
कुपोषण के कारण:- शिशु को सही समय और पर्याप्त मात्रा में माँ का दूध न मिल पाना भी कुपोषण की समस्या का एक प्रमुख कारण है। शिशु के जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान की शुरुआत, शिशु और 5 साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु के अनुपात को कम कराने की दिशा में महत्त्वपूर्ण क़दम है। जिसके द्वारा उच्च नवजात मृत्यु दर को जबरदस्त ढंग से घटाया जा सकता है और हर साल भारत में क़रीब दस लाख शिशुओं की जान बचाई जा सकती है। आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में केवल 23% माताएँ ही शिशु के जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान करा पाती हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में यह आँकड़ा सिर्फ़ 7.2% है। जो कि भारतीय राज्यों में शिशु स्तनपान के अनुपात में 28वें स्थान पर आता है। जो महिलायें शिशु को जन्म के पहले एक घंटे में स्तनपान शुरू करा देती हैं उनके पास शिशुओं को पहले 6 महीने तक सफलतापूर्वक और पूर्णतः स्तनपान कराने के व्यापक अवसर बढ़ जाते हैं। पहले 6 महीनों तक पूर्णतः स्तनपान कराने से शिशु स्वस्थ रहता है और पूर्ण क्षमता के साथ उसके विकास को भी सुनिश्चित करता है।
कुपोषण में सुधार:- पोषण में सुधार लाने के लिया समुदाय स्तर पर पोषण से सम्बंधित व्यवहारों में परिवर्तन लाकर पोषण स्तर में सुधार लाया जा सकता है। उचित पोषण के कुछ प्रमुख व्यवहार को हमें ध्यान रखना चाहिए जैसे– शिशु को गरम रखना एवं किसी भी बाह्य संक्रमण से बचाना। गर्भवती महिला को गर्भावस्था के दौरान दिन में दो घंटे आराम तथा एक अतिरिक्त खुराक अवश्य लेनी चाहिए। उम्र के अनुसार निर्धारित टीकाकरण अवश्य कराना चाहिए। माँ को पोष्टिक आहार लेते रहना चाहिए। खाने में ऐसे खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करना चाहिए जिसमें लोहे की मात्र ज़्यादा से ज़्यादा हो, इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि माँ और बच्चा दोनों ही हमेशा ‘आयोडीन’ युक्त नमक का ही प्रयोग करें ।
स्तनपान के फ़ायदे:- स्तनपान के अनेक फ़ायदे हैं। नवजात शिशु के लिए माँ के दूध से बेहतर और कोई भी दूध नहीं होता है। इससे दोनों माँ और बच्चे को अनेक लाभ पहुँचता है। स्तनपान के अनेक फ़ायदे हैं- माँ का दूध सुपाच्य होता है जिससे यह शिशु को पेट सम्बन्धी गड़बड़ियों से बचाता है। स्तनपान शिशु की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक होता है। स्तनपान से दमा और कान सम्बन्धी बीमारियाँ नियंत्रित रहती है, क्योंकि माँ का दूध शिशु की नाक और गले में प्रतिरोधी त्वचा बना देता है। स्तनपान से जीवन के बाद के चरणों में उदर व श्वसन तंत्र के रोग, रक्त कैंसर, मधुमेह तथा उच्च रक्तचाप का ख़तरा कम हो जाता है। स्तनपान से शिशु की बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है क्योंकि स्तनपान कराने वाली माँ और उसके शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ता प्रगाढ़ होता है। स्तनपान कराने वाली माताओं को स्तन या गर्भाशय के कैंसर का ख़तरा कम होता है। शोधों से सिद्ध हुआ है कि लम्बे तक स्तनपान करने वाले बच्चे बाद के जीवन में उतने ही अधिक समय तक मोटापे से बचे रह सकते हैं। माँ के दूध में मिलने वाले तत्त्व मेटाबोलिज्म बेहतर करते हैं। गर्भावस्था के समय या स्तनपान के दौरान माँ का जो भी खान-पान रहता है वह बाद में बच्चे के लिए भी पसंदीदा बन जाता है। माँ के दूध में पाए जाने वाले डी.एच.ए.(D.H.A.) व ए.ए.(A.A.) फैटी एसिड मस्तिष्क की कोशिकाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्तनपान से बच्चे का आई. क्यू. (Intelligence Quotient) अच्छी तरह विकसित होता है।
कृत्रिम दूध और माँ के दूध में अंतर:-कृत्रिम दूध, माँ के दूध की गुणवत्ता, का अनुकरण करने की कोशिश कर सकता है, लेकिन सही मायने में यह अनुकरण हो ही नहीं सकता है। यह इसलिए कि माँ के दूध में अनेक गुणधर्म हैं, जिनका अनुकरण करना नामुमकिन है। कृत्रिम दूध में माँ के दूध के जैसी सामग्री कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा और विटामिन इत्यादि डाल दिए जाते हैं, किंतु इनकी मात्रा नियत रहती है। माँ के दूध में इनकी मात्रा बदलती रहती है। कभी माँ का दूध गाढा रहता है तो कभी पतला, कभी दूध कम होता है तो कभी अधिक, जन्म के तुरंत बाद और जन्म के कुछ हफ्तों बाद या महीनों बाद बदला रहता है। इससे दूध में उपस्थित सामग्री की मात्रा बदलती रहती है, और यह प्रकृति का बनाया गया नियम है कि माँ के दूध में बच्चे की उम्र के साथ बदलाव होते रहते हैं। भौतिक गुणवत्ता के अलावा, माँ के दूध में अनेक जैविक गुण होते हैं, जो कि कृत्रिम दूध में नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए माँ के दूध देने से माँ-बच्चे के बीच लगाव, माँ से बच्चे के रोग से बचने के लिए प्रतिरक्षा मिलना और अन्य। इसके बावज़ूद जिन माँ को अपना दूध नहीं हो पाता है, उनके लिए फ़िर यही जानवर या कृत्रिम दूध का सहारा होता है। इसके बारे में अन्य जगह ज़िक्र किया गया है।
स्तनपान सर्वोत्तम उपलब्ध भोजन:- स्तनपान बच्चे के लिए सर्वोत्तम उपलब्ध भोजन है और बच्चे की सभी ज़रूरतों को पूरा करता है। स्तनपान करने वाले बच्चे सर्वाधिक संतुलित आहार प्राप्त कर लेते हैं और उन्हें संक्रमण की संभावना कम होती है। केवल माँ के दूध में ही प्रोटीन, आवश्यक वसायुक्त लवण और बच्चे के मस्तिष्क के विकास के लिए आवश्यक अन्य ज़रूरी पदार्थ मिलते हैं। स्तनपान केवल छः महीने तक जारी रखना चाहिए। प्रसव पूर्व क्लिनिकों में आने वाली गर्भवती महिलाओं और परिवार के अन्य सदस्यों को स्तनपान के लाभों के बारे में बतलाया जाना चाहिए, ताकि यदि कोई महिला घर में प्रसव करना चाहे तो भी उसे जानकारी न होने के कारण कोई भी बच्चा स्तनपान के लाभों से वंचित न रहे। कुपोषण और संक्रमण जैसे रोग से केवल स्तनपान कराने से ही बहुत सी ज़िन्दगियों को बचाया जा सकता है। यद्यपि स्तनपान कराने की दर अधिक है, फिर भी दूध पिलाने से पूर्व अन्य भोजन देने, स्तनपान में विलम्ब करने, कोलोस्ट्रम को फेंक देने और भोजन के बीच में बच्चे को पानी पिलाने जैसी संभावित हानिकारक आदतें अभी भी आम बात है। गर्भावस्था के दौरान और बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं को अच्छी तरह भोजन करना चाहिए और आराम करना चाहिए। प्रायः सभी महिलाएँ जिनमें कुपोषण वाली महिलाएँ भी शामिल हैं, अच्छी तरह स्तनपान करा सकती हैं। स्तनपान बच्चे को प्रसव के आधे घंटे के अंदर कराया जाना चाहिए। सीजेरियन सेक्शन से जन्म लेने वाले बच्चे को माँ की हालत ठीक होते ही 4 से 6 घंटे में स्तनपान कराया जाना चाहिए। जन्म के बाद पहले कुछ दिनों तक पीले गाढ़े दूध कोलेस्ट्रॉम में प्रचुर मात्रा में विटामिन, एंटीवॉडीज और सूक्ष्मपोषक तत्त्व होते हैं। इससे संक्रमण का प्राकृतिक रूप से बचाव होता है और शिशु का एनीमिया, केराटोमेलासिया जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से होने वाली रोगों से भी बचाव होता है। स्तनपान कराने वाले बच्चे को 6 माह की आयु तक पानी की कोई आवश्यकता नहीं होती। स्तन के दूध में बच्चों की ज़रूरत को पूरा करने के लिए 4 माह तक पर्याप्त पानी होता है। बच्चों को भूख लगने पर ही खिलाया जाना चाहिए। ऐसा करने से अधिक दूध बनता है और स्तनों में अधिक दूध होने से दर्द भी नहीं होता है। कम वजन वाले और समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे भी स्तनपान कर सकते हैं। बोतल और पेसीफायर का कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यदि बच्चा अस्वस्थ है, तब भी स्तनपान कराना जारी रखना चाहिए ताकि बच्चे को पर्याप्त पोषण मिलता रहे। कुपोषणग्रस्त बच्चे को संक्रमण होने का अधिक ख़तरा होता है। स्तनपान करने से बच्चे को आराम भी मिलेगा। दो वर्ष से कम आयु का बच्चा अपनी माँ पर पूरी तरह निर्भर होता है। यदि वह फिर से गर्भवती हो जाती है तो वह पर्याप्त देखभाल नहीं कर पाएगी। यदि महिला दो वर्ष के अंदर गर्भवती हो जाती है तो उसमें भी आयरन और अनिवार्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हो जाएगी।

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