लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
हिन्दी भाषा को लेकर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन का सफल समापन हो गया। अब बात इसे लेकर हो रही है कि हमने इस सम्मेलन को लेकर क्या हासिल किया। कमियां ढूंढऩे वालों को इस कार्यक्रम के बहाने सरकार और नेताद्वय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को घेरने का उचित अवसर मिल गया। सोशल मीडिया में अनेकों ने यह बात प्रमुखता से उठाने की कोशिश की है कि आखिर इस विशाल वैश्विक सम्मेलन से किसी को क्या मिला है, सिर्फ धन की बर्बादी हुई है, हिन्दी का तो कुछ भी भला नहीं हो सका है। इस तरह की बात करने वालों की हाँ में हाँ मिलाने वालों की भी कोई कमी इस सोशल मीडिया के मंच पर नहीं देखी जा रही है। लेकिन किसी ने इस बात पर अभी चर्चा शुरू नहीं की है कि यह सम्मेलन एक भारतीय भाषा के रूप में हिन्दी को और हिन्दी भाषियों को क्या कुछ दे गया।
वस्तुत: यहाँ हमें जानना ही होगा कि यह विश्व हिन्दी सम्मेलन पूर्व में हुए 9 सम्मेलनों से कई मायनों में कैसे भिन्न था। इस सम्मेलन में यह पहली बार हुआ कि सिर्फ साहित्य पर चर्चा नहीं हुई। पंथ, निराला, अज्ञेय, नागार्जुन, महादेवी, प्रेमचंद, सुभद्रा कुमारी, दिनकर,कबीर, नानक, तुलसीदास, रैदास, जायसी के आगे साहित्य के स्तर से ऊपर उठते हुए हिन्दी भाषा के विश्व क्षितिज पर छा जाने के लिए होने वाले प्रयत्नों की चर्चा, उसे और अधिक प्रभारी बनाने के विषय में बातें तथा संकल्प इस हिन्दी सम्मेलन के जरिए लिए जाने के प्रयत्न किए गए हैं। साहित्य से आगे भाषा के स्तर पर यहाँ व्यापक चर्चा और संकल्प इस सम्मेलन में लिए गए हैं।
वैसे भी हिन्दी स्वयं को बाजार की भाषा के रूप में स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ ही रही है। हमें वह दिन भी याद है, जब चैनलों का संजाल भारत में बिछना आरंभ हुआ था और शुरूआती दिनों में यह अंग्रेजी भाषा में अपने कार्यक्रमों का प्रसारण करते थे, किंतु कुछ ही महिनों में हुआ यह था कि यह सभी अंग्रेजी पसंद चैनल भारत में हिन्दी पर जोर देते दिखाई दिए, क्यों कि उन्हें अपने कार्यक्रमों को देखने के लिए दर्शक ही नहीं मिल रहे थे। वास्तव में हम इसे हिन्दी भाषियों और हिन्दी भाषा की ताकत मान सकते हैं, जिसके कारण ही यह संभव हो सका कि जो अंग्रेजी को पसंद करते हैं, उसे आगे बढ़ाना चाहते हैं, बाजारी कारणों के कारण ही सही हिन्दी भाषा को व्यवहार में लाने के लिए मजबूर देखे गए।
भोपाल में आयोजित हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन को लेकर अनेक प्रश्न हो सकते हैं, हो सकता है कि जो यह नकारात्मकता देखने का प्रयत्न कर रहे हैं वह कुछ मामलों में सही भी हों, किंतु यहाँ बताना उचित होगा कि इस सम्मेलन ने हिन्दी भाषा को अपने तीन दिन के अल्प समय में बहुत कुछ सकारात्मक दिशा में दिया भी है। वस्तुत: सभी को यह ध्यान रखना होगा कि किसी भी भाषा या संस्कृति को लेकर यदि सामान्य जन के बीच धारणा नकारात्मक अथवा सकारात्मक दोनों में से कोई भी पहले बन जाए तो उसे तोडऩा बहुत मुश्किल होता है। भारत में कम से कम हमारी हिन्दी के साथ भी कुछ ऐसा ही है। एक तरफ वह बाजार की भाषा के रूप में अपनी पहचान बना रही है, तो दूसरी ओर वह अपने घर में नित्य प्रति दोयम दर्जे के व्यववहार से त्रस्त है। आज न सिर्फ विद्यालयीन, विश्वविद्यालयों में ही नहीं बल्कि प्रशासनिक तथा अन्य स्थानों पर यही देखने में आता है कि जहां प्रतिभावानों की योग्यता की कद्र कई बार इसीलिए नहीं हो पाती क्यों कि वे बहुभाषिक स्तर पर मात खा जाते हैं, उन्हें फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना नहीं आती है। इस चली आ रही व्यवस्था को तोडऩे की दिशा में क्या-क्या नए प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं, यह चुनाव और निर्णय करने व कराने का प्रयास इस विश्व हिन्दी सम्मेलन के जरिए आज हुआ है।
पहली बार सरकार से लेकर प्रशासन के महत्वपूर्ण अधिकारी विश्व हिन्दी सम्मेलन में चले सत्रों में उपस्थित रहे, न केवल उपस्थित रहे बल्कि उन्होंने इन सत्रों में अन्य हिन्दी विद्वानों के साथ बराबर से अपनी हिस्सेदारी तय की, इतना ही नहीं तो इससे आगे बढ़ते हुए कई सरकारी सेवकों ने अपनी ओर से सभी को आश्वस्त किया कि वे अपनी ओर से अथक कोशिश करेंगे कि सभी कार्य हिन्दी भाषा में करने के लिए पूरी तन्मसयता से प्रयत्नरशील रहेंगे। इस सम्मेलन के कारण संपूर्ण देश में यह बात मध्य प्रदेश के जरिए पहुंची है कि जब एक राज्य आगे अपने यहां से केंद्र को हिन्दी भाषा में योजनाएं बनाकर भेजने के लिए प्रतिबद्ध हो सकता है तो हम क्यों नहीं ऐसा कर सकते, हमारे राज्य की प्रमुख भाषा भी तो हिन्दी ही है।
यहां विश्व हिन्दी सम्मेलन के कारण पहली बार यह संभव हो सका कि विभिन्न सत्रों में गंभीररूप से भाषा के विस्तार और सुधार को लेकर अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिन्दी का आपसी तालमेल बैठाने को लेकर आत्म मंथन आरंभ हुआ। देवनागरी लिपि के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयोग होने चाहिए न कि रोमन लिपि के साथ यह विचार भी इसी सम्मेललन में मूर्तरूप पाने की दिशा में आगे बढ़ा है। इस सम्मेेलन का परिणाम यह हुआ है कि मंच से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय को अंतर्राष्ट्रीय बनाने की घोषणा की है, यानि इस दिशा में प्रयत्न अब शासन स्तर पर आरंभ हो जाएंगे। क्या यह देश और विशेषकर मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात नहीं कि महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के बाद यह देश का दूसरा विश्वविद्यालय होगा जिसे कि हिन्दी भाषा से संबंधित वैश्विक स्तर का बनाया जाएगा। उन्होनें प्रदेश में राजभाषा विभाग को दोबारा प्रारंभ करनें की बात कही। प्रदेश में उपभोक्ता वस्तु हिन्दी में बेची जायेगी, सभी अधिसूचनाएं हिन्दी में, उच्च न्यायालय के फैसलों का अनुवाद हिन्दी में, अधिकारियों का प्रशिक्षण हिन्दी में कराए जाने की बात कहकर शिवराज सिंह चौहान ने देश के अन्य राज्यों को भी राजनीतिक स्तर पर हिन्दी को मजबूति प्रदान करने का रास्ता दिखा दिया है।
इस सम्मेलन में जिनका अंतिम दिन जिन विद्वानों का सम्मान हुआ उनमें प्राय: सभी प्रो. मोहम्मद इस्माइल जैसे हिन्दी भाषा को समर्पित थे। मोहम्मद इस्माइल इस सम्मेलन में भाग लेने सऊदी अरब से आए थे और वे अपने देश में हिन्दी पढ़ाते हैं, उनके विद्यालय में 19 हजार बच्चे उनके माध्यम से नित्य प्रति हिन्दी की बारीकियां सीख रहे हैं। भारत सहित दुनिया के 39 देशों से आए ऐसे सभी विद्वानों का सम्मान सचमुच यह बताता है कि यह सम्मेलन हिन्दी के भावी विस्तार का संदेश देने को लेकर पूरी तरह सफल रहा है। इसके इतर यहां अलग-अलग विषयों पर चले सत्रों में विद्वानों ने मंच से जिन शिफारिशों को रखा है, यदि उसका आने वाले दिनों में 20 प्रतिशत भी अमल हो गया तो हिन्दी एक राष्ट्रभाषा के रूप में अपनी जंग जीत लेगी, ऐसा कहा जा सकता है। सम्मेलन में विमर्श के दौरान कई ऐसे मुद्दे निकलकर आए, जिन पर सरकार काम करेगी।
दुनिया के सबसे बढ़े हिन्दी प्रेमियों के इस आयोजन में हिन्दी भाषा को बढ़ावा देने के लिए कुल 12 सत्र आयोजित किये गये थे, जिसमें विदेश नीति में हिन्दी, प्रशासन में हिन्दी, विधि एवं न्याय क्षेत्र में हिन्दी और भारतीय भाषाएं, बाल साहित्य में हिन्दी, अन्य भाषा-भाषी राज्यों में हिन्दी, हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यमों में भाषा की शुद्धता, गिरमिटिया देशों में हिन्दी, विदेशों में हिन्दी शिक्षण समस्याएं और समाधान, विदेशियों के लिए भारत में हिन्दी अध्ययन की सुविधा, देश और विदेश में प्रकाशन समस्याएं और समाधान विषय प्रमुखता से रखे गए थे। विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में हिन्दी को विश्व भाषा बनानें के लिए न केवल पूरा खाका तैयार किया गया बल्कि इस दिशा में आगे बढऩे के लिए वह प्रतिबद्ध भी दिखाई दिया।
विदेश नीति में हिन्दी सत्र का पूरा ध्यान इस बात पर था कि कैसे हम अपने राजनयिकों के द्वारा हिन्दी के प्रसार को विभिन्न देशों में बढ़ा सकते हैं। विदेश नीतियां जो बनायी जायें उसमें हिन्दी को कैसे बढ़ावा दें। इसके साथ ही विदेश नीति में अंग्रेजी के एकाधिकार को कम करना, विदेशी भाषाओं में हिन्दी के भाषाकारों और अनुवादकों को बढ़ावा देने का यहां निर्णय लिया गया। विदेश मंत्रालय शीघ्र ही पासपोर्ट के प्रारूप को हिन्दी में बनाएगा यह भी इसी सम्मेलन की बदौलत निश्चित हो सका है। प्रशासन और विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी को लेकर यहां राजभाषा लोकपाल की नियुक्ति, प्रशासन, न्याय एवं विज्ञान के लिए हिन्दी शब्दकोष तैयार करना, अंग्रेजी नहीं आने पर अधिकारी को निलंबित करने की व्यवस्था समाप्त करना एवं बड़े स्तर पर हिन्दी में ही पत्र व्यवहार, संपर्क करनें के प्रस्ताव पारित किये जाने की बाते तय की गईं। विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी के लिए विज्ञान शब्दकोष, विज्ञान साहित्य के हिन्दी में विस्तार, प्रसार-प्रचार, चिकित्सा विज्ञान की हिन्दी में शिक्षा, विज्ञान संचार एवं रक्षा विज्ञान का हिन्दी में प्रसार कर आम लोगों तक पहुंचाना, आईआईटी जैसे संस्थान में हिन्दी को अनिवार्य विषय के रूप में परिलक्षित करना इत्यादि विषयों पर चर्चा करते हुए प्रस्ताव पारित हुए हैं।
संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यह सुनिश्चित किया कि हिन्दी में शिक्षण, प्रशक्षिण ई-अधिगम (ई-लर्निंग), कम्प्यूटर, ई-मेल, डिजीटल इंडिया में हिन्दी, रोजगार के लिए हिन्दी, देवनागरी का सरंक्षण और संवर्धन के लिए ई-स्क्रिप्ट तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा जाएगा। विधि न्याय में पुराने उर्दू फारसी के शब्दों के समानांतर हिन्दी शब्द के शब्दकोष लाना, प्रशासन से जुड़े, विधि-न्याय के शब्दों का बोलचाल के हिन्दी शब्दों के साथ जोडक़र उनका सरलीकरण करने जैसे प्रस्ताव, सुझाव तैयार किये गये।
बाल साहित्य अन्य भाषा-भाषी राज्यों में हिन्दी तक विस्तार, पूर्वोत्तर के राज्यों में हिन्दी के प्रभाव को बढ़ाया जाये, जहां हिन्दी कम बोली जाती है वहां स्थापित हिन्दी की संस्थाओं की भूमिका को और सुविधाएं देकर ताकतवर बनाने के संकल्प यहां हुए हैं। गिरमिटिया देशों में हिन्दी के विस्तार के साथ विदेश में हिन्दी संरक्षण, पाठय सामाग्री की एकरूपता, विदेशियों के लिए हिन्दी प्रशिक्षण देने वाली संस्थाओं का सामंजस्य, दूरस्थ प्रणाली से विदेशियों को हिन्दी शिक्षण देते हुए हिन्दी के प्रसार को विश्व के कोने-कोने में पहुंचाकर विश्व भाषा बनानें की दिशा में प्रयासों में तेजी लाने की प्रतिबद्धता जताई गयी।
इतना ही नहीं तो देश-विदेश में हिन्दी प्रकाशन पर भी बल देने के लिए सम्मेलन में चर्चा की गयी। हिन्दी पुस्तकों का वैश्विक बाजार, अप्रवासी लेखकों के लिए कार्यशालाओं के आयोजन एवं हिन्दी के प्रकाशन में आने वाली समस्याओं के कैस एक निश्चित समय में दूर किया जा सकता है, इस पर नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार बलदेव भाई शर्मा जैसे विद्वानों ने प्रकाश डाला। हिन्दी पत्रकारिता में भाषा की शुद्धता को लेकर प्रयास करनें चाहिए। पत्रकारिता में आम भाषा के चलन में आने वाले हिन्दी शब्दों का समावेश ज्यादा हो न कि उनके स्थान पर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग। इसीलिए यहां सत्र में प्रस्ताव रखा गया कि अखबार एवं टीवी चैनल प्रयास करें कि वे भाषा में शुद्धता बनानें के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे। इस तरह इस विश्व हिन्दी सम्मेलन को लेकर आलोचनाओं से मुक्त होते हुए खुले मन से कहा जा सकता है कि यह वैश्विक सम्मेलन हिन्दी भाषा के उत्थान की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। इससे यह भी उम्मीद बंध गई है कि 14 सितंबर 1949 को राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों ने कामकाज करने के साथ आपसी संपर्क स्थापित करनें का अभिनव कार्य किया था। लेकिन विश्व भाषा बनाने के लिए अब भी 129 देशों के समर्थन की आवश्यकता है। जिस प्रकार इस सम्मेलन में भारत सरकार के निर्णय और कार्यों की जानकारी प्राप्त हुई है, उससे यह संभावना अधिक बड़ गई है कि शीघ्र ही हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा में शामिल कर लिया जायेगा।

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1 Comment on "विश्व हिन्दी सम्मेलन से क्या पाया हमने"

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M. R. Iyengar
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मयंक जी ,
आपका लेख जानकारी पऊर्ण रहा. इसे मान लेने पर ऐसा लग रहा है कि यदि हम 25 प्रतिशत संकल्पों को कार्यान्विक़त कर सकें तो हमारे देश में हिंदी की स्थिति बहुत ही उभर जाएगी. अच्छे दिनों की कामना करता हूँ.

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