लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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snakeडा. राधेश्याम द्विवेदी
साँप या सर्प, पृष्ठवंशी सरीसृप वर्ग का प्राणी है। यह जल तथा थल दोनों जगह पाया जाता है। इसका शरीर लम्बी रस्सी के समान होता है जो पूरा का पूरा स्केल्स से ढँका रहता है। इसके पैर नहीं होते हैं। यह निचले भाग में उपस्थित घड़ारियों की सहायता से चलता फिरता है। इसकी आँखों में पलकें नहीं होती, ये हमेशा खुली रहती हैं। यह विषैले तथा विषहीन दोनों प्रकार के होते हैं। इसके ऊपरी और निचले जबड़े की हड्डियाँ इस प्रकार की सन्धि बनाती है जिसके कारण इसका मुँह बड़े आकार में खुलता है। इसके मुँह में विष की थैली होती है जिससे जुडे़ दाँत तेज तथा खोखले होते हैं अतः इसके काटते ही विष शरीर में प्रवेश कर जाता है। दुनिया में साँपों की कोई 2500-3000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसकी कुछ प्रजातियों का आकार 10 सेण्टीमीटर होता है जबकि अजगर नामक साँप 25 फिट तक लम्बा होता है। साँप मेढक,छिपकली, पक्षी, चूहे तथा दूसरे साँपों को खाता है। यह कभी-कभी बड़े जन्तुओं को भी निगल जाता है।
शीतरक्त प्राणी:-सरीसृप वर्ग के अन्य सभी सदस्यों की तरह ही सर्प शीतरक्त का प्राणी है अर्थात् यह अपने शरीर का तापमान स्वंय नियंत्रित नहीं कर सकता है। इसके शरीर का तापमान वातावरण के ताप के अनुसार घटता या बढ़ता रहता है। यह अपने शरीर के तापमान को बढ़ाने के लिए भोजन पर निर्भर नहीं है इसलिए अत्यन्त कम भोजन मिलने पर भी यह जीवीत रहता है। कुछ साँपों को महीनों बाद-बाद भोजन मिलता है तथा कुछ सर्प वर्ष में मात्र एक बार या दो बार ढेड़ सारा खाना खाकर जीवीत रहते हैं। खाते समय साँप भोजन को चबाकर नहीं खाता है बल्कि पूरा का पूरा निकल जाता है। अधिकांश सर्पों के जबड़े इनके सिर से भी बड़े शिकार को निगल सकने के लिए अनुकुलित होते हैं। अफ्रीका का अजगर तो छोटी गाय आदि को भी नगल जाता है। विश्व का सबसे छोटा साँप थ्रेड स्नेक होता है। जो कैरेबियन सागर के सेट लुसिया माटिनिक तथा वारवडोस आदि द्वीपों में पाया जाता है वह केवल 10-12 सेंटीमीटर लंबा होता है। विश्व का सबसे लंबा साँप रैटिकुलेटेड पेथोन (जालीदार अजगर) है, जो प्राय: 10 मीटर से भी अधिक लंबा तथा 120 किलोग्राम वजन तक का पाया जाता है। यह दक्षिण -पूर्वी एशिया तथा फिलीपींस में मिलता है।
सर्पदंश:-जब कोई साँप किसी को काट देता है तो इसे सर्पदंश या ‘साँप का काटना’ (snakebite) कहते हैं। साँप के काटने से घाव हो सकता है और कभी-कभी विषाक्तता (envenomation) भी हो जाती है जिससे मृत्यु तक सम्भव है। अधिकाश सर्प विषहीन होते हैं और कुछ विषैले होते हैं किन्तु अन्टार्कटिका को छोड़कर सभी महाद्वीपों में जहरीले सांप पाये जाते हैं। साँप प्राय: अपने शिकार को मारने के लिये काटते हैं किन्तु इसका उपयोग आत्मरक्षा के लिये भी करते हैं। विषैले जंतुओं के दंश में सर्पदंश सबसे अधिक भंयकर होता है। इसके दंश से कुछ ही मिनटों में मृत्यु तक हो सकती है। समुद्री साँप साधारणतया विषैले होते हैं, पर वे शीघ्र काटते नहीं। विषैले सर्प भी कई प्रकार के होते हैं। विषैले सांपों में नाग (कोब्रा), काला नाग, नागराज (किंग कोबरा), करैत, कोरल वाइपर, रसेल वाइपर,.ऐडर, डिस फालिडस, मॉवा (Dandraspis), वाइटिस गैवौनिका, रैटल स्नेक, क्राटेलस हॉरिडस आदि हैं। विषैले साँपों के विष एक से नहीं होते। कुछ विष तंत्रिकातंत्र को आक्रांत करते हैं, कुछ रुधिर को और कुछ तंत्रिकातंत्र और रुधिर दोनों को आक्रांत करते हैं।
बस्ती के एक घर में हैं सैकड़ों सांप:- बस्ती के दुबौलिया थाना क्षेत्र के पिपरौली गांव में खतरनाक कोबरा सांपों की अपनी एक अलग दुनिया है,जो अपनी दुनिया में चैन से रहते हैं । हक्कुल बचपन से ही सांपों के बीच में रहते रहते पले बढ़े हैं। इनका कहना है कि बचपन से ही इन सांपो के साथ खेलते खेलते बड़े हुए हैं, और धीरे-धीरे उन्हें लोगों ने सांप पकड़ने के लिए बुलाना शुरू किया। इनका कहना है कि पहले खपड़े के मकान में ये सांप सुरक्षित रहते थे, लेकिन खपड़ों के मकान समाप्त होने की वजह से इनके रहने की कोई जगह नहीं बची है, इस वजह से ये अब ज्यादा लोगों को काटते हैं, इनका कहना है कि इनका रहना जरूरी है क्योंकि सांप इंसान का आधा जीवन है। सांपो के संरक्षण के लिए हक्कुल 2009 से लड़ाई लड़ रहे हैं। राष्ट्रपती, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री के यहां से जन सूचना मांगी गई लेकिन आज तक कोई सूचना नहीं दी गई है, हक्कुल सरकार से इन सांपो को पालने के लिए से मांग किया था लेकिन राष्ट्रपती और प्रधानमंत्री के यहां से कागज आया कि प्रतिदिन वन विभाग के कर्मचारी आकर सांपो को ले जाए, वन विभाग इन सांपो को नहीं ले जाता, कहने के बाद भी कोई वन विभाग का कर्मचारी नहीं आता, हक्कुल का कहना है कि इसके रजिस्ट्रेशन और एनजीओ के लिए लखनऊ वन विभाग के विशेषज्ञ वासिफ जमशेद 21 हजार रूपए रजिस्ट्रेशन के लिए ले गए थे, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ, इसलिए मै स्वंय सांप पकड़ कर वन विभाग को नहीं दूंगा। वन विभाग के कर्मचारी आकर सांप पकड़ कर ले जाएं। हक्कुल ने सांपो के संरक्षण के लिए बहुत अच्छा प्रयास किया, सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते लगाते रहे, इनको कोई मदद नहीं मिली। हक्कुल ने सांपों को सुरक्षित रखने के लिए एक छोटा सा कमरा बनाया है, जिसमें सांप सुरक्षित रहते हैं, सांपो को बाहर निकाला जाता है तो ये अपने आप ही अपने घर में लौट जाते हैं। सांपों को खिलाने में हक्कुल को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ रहै है, गरीबी की वजह से सांपो को खिलाने में दिक्कत होती है, लेकिन मुर्गी की दुकानों से ये सांपों को खिलाने के लिए प्रतिदिन मांस का कटन लेकर आते है और इन सांपों का पेट भरते हैं। हक्कुल ने सांपों के रखरखाव के लिए 2011 में सरकार से जमींन मांग रहा था ,लेकिन हर्रैया तहसील के कर्मचारियों ने रुपये की मांग की जिससे नाराज होकर सांपों को तहसील में छोड़ दिया था ।
विषैले और विषहीन साँपों की पहचान:- पुराने जमाने में साँप के काटने से ज्यादातर लोग बिना सही इलाज के ही मर जाते थे। लोगों को यह पता ही नहीं था कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। बहुत कम लोगों को मालूम है कि सारे साँप जहरीले नहीं होते हैं। भारत में लगभग पाँच से छह सौ किस्म के साँप मिलते हैं जिनमें बहुत कम साँप ही जहरीले होते हैं। लेकिन आम तौर पर लोग साँप के काटने पर वह जहरीला है कि नहीं इसके बारे में बिना जाने ही डर से मर जाते हैं, शायद डर के मारे उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता है। भिन्न-भिन्न साँपों के शल्क भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं। इनके शल्कों से विषैले और विषहीन साँपों की कुछ सीमा तक पहचान हो सकती है। विषैले साँप के सिर पर के शल्क छोटे होते हैं और उदर के शल्क उदरप्रदेश के एक भाग में पूर्ण रूप से फैले रहते हैं। इनके सिर के बगल में एक गड्ढा होता है। ऊपरी ओंठ के किनारे से सटा हुआ तीसरा शल्क नासा और आँख के शल्कों से मिलता है। पीठ के शल्क अन्य शल्कों से बड़े होते हैं। माथे के कुछ शल्क बड़े तथा अन्य छोटे होते हैं। विषहीन सांपों की पीठ और पेट के शल्क समान विस्तार के होते हैं। पेट के शल्क एक भाग से दूसरे भाग तक स्पर्श नहीं करते। साँपों के दाँतों में विष नहीं होता। ऊपर के छेदक दाँतों के बीच विषग्रंथि होती है। ये दाँत कुछ मुड़े होते हैं। काटते समय जब ये दाँत धंस जाते हैं तब उनके निकालने के प्रयास में साँप अपनी गर्दन ऊपर उठाकर झटके से खीचता है। उसी समय विषग्रंथि के संकुचित होने से विष निकलकर आक्रांत स्थान पर पहुँच जाता है। कुछ साँपों के काटने के स्थान पर दाँतों के निशान काफी हल्के होते हैं, पर शोथ के कारण स्थान ढंक जाता है। दंश स्थान पर तीव्र जलन, तंद्रालुता, अवसाद, मिचली, वमन, अनैच्छिक मल-मूत्र-त्याग, अंगघात, पलकों का गिरना, किसी वस्तु का एक स्थान पर दो दिखलाई देना, तथा पुतलियों का विस्फारित होना प्रधान लक्षण हैं। अंतिम अवस्था में चेतनाहीनता तथा मांपेशियों में ऐंठन शु डिग्री हो जाती है और श्वसन क्रिया रुक जाने से मृत्यु हो जाती है। विष का प्रभाव तंत्रिकातंत्र और श्वासकेंद्र पर विशेष रूप से पड़ता है। कुछ साँपों के काटने पर दंशस्थान पर तीव्र पीड़ा उत्पन्न होकर चारों तरफ फैलती है। स्थानिक शोथ, दंशस्थान का काला पड़ जाना, स्थानिक रक्तस्त्राव, मिचली, वमन, दुर्बलता, हाथ पैरों में झनझनाहट, चक्कर आना, पसीना छूटना, दम घुटना आदि अन्य लक्षण हैं। विष के फैलने से थूक या मूत्र में रुधिर का आना तथा सारे शरीर में जलन और खुजलाहट हो सकती है। आंशिक दंश या दंश के पश्चात् तुरंत उपचार होने से व्यक्ति मृत्यु से बच सकता है।निरोधक उपाय में कुएँ या गड्ढे में अनजान में हाथ न डालना, बरसात में अँधेरे में नंगे पाँव न घूमना और जूते को झाड़कर पहनना चाहिए।
प्राथमिक घरेलू उपचार:-सर्पदंश का प्राथमिक उपचार शीघ्र से शीध्र करना चाहिए। दंशस्थान के कुछ ऊपर और नीचे रस्सी, रबर या कपड़े से ऐसे कसकर बाँध देना चाहिए कि धमनी का रुधिर प्रवाह भी रुक जाए। लाल गरम चाकू से दंशस्थान को 1/2 इंच लंबा और 1/4 इंच चौड़ा चीरकर वहाँ का रक्त निकाल देना चाहिए। तत्पश्चात् दंशस्थान साबुन, या नमक के पानी, या 1 प्रतिशत पोटाश परमैंगनेट के विलयन से धोना चाहिए। यदि ये प्राप्य न हों तो पुरानी दीवार के चूने को खुरचकर घाव में भर देना चाहिए। कभी-कभी पोटाश परमैंगनेट के कणों को भी घाव में भर देते हैं, पर कुछ लोगों की राय में इससे विशेष लाभ नहीं होता। यदि घाव में साँप के दाँत रह गए हों, तो उन्हें चिमटी से पकड़कर निकाल लेना चाहिए। प्रथम उपचार के बाद व्यक्ति को शीघ्र निकटतम अस्पताल या चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए। वहाँ प्रतिदंश विष (antivenom) की सूई देनी चाहिए। दंशस्थान को पूरा विश्राम देना चाहिए। किसी दशा में भी गरम सेंक नहीं करना चाहिए। बर्फ का उपयोग कर सकते हैं। ठंडे पदार्थो का सेवन किया जा सकता है। घबराहट दूर करने के लिए रोगी को अवसादक औषधियाँ दी जा सकती हैं। श्वासावरोध में कृत्रिम श्वसन का सहारा लिया जा सकता है। चाय, काफी तथा दूध का सेवन कराया जा सकता है, पर भूलकर भी मद्य का सेवन नहीं कराना चाहिए ।जहरीले साँप के काटे जाने पर संयम रखना चाहिए ताकि ह्रदय गति तेज न हा। साँप के काटे जाने पर जहर सीधे खून में पहुँच कर रक्त कणिका को नष्ट करना प्रारम्भ कर देते है, ह्रदय गति तेज होने पर पर जहर तुरन्त ही रक्त के माध्यम से ह्रदय में पहुँच कर उसे नुक़सान पहुँचा सकते हैं। काटे जाने के बाद तुरन्त बाद काटे गये स्थान को पानी से धोते रहना चाहिये। काटे गये स्थान का किसी भी चीज़ से नहीं बांधना चाहिये कि साँप के काटने के तुरन्त बाद ही जहर खुन में मिल जाता है अतः कुछ बाधने या गरम चाकु द्वारा चीरा लगाने का कोई अर्थ नहीं है। काटे गये स्थान पर किसी चीज़ द्वारा कस कर बांधे जाने पर उस स्थान पर खुन का संचार रुक सकता है जिससे वहाँ के ऊतको को रक्त मिलना बन्द हा जायेगा, जिससे ऊतका क्षति पहुच सकती है। अतः साँप के काटे जाने पर ना घबराये तुरन्त ही नजदीकी प्रतिवष केन्द्र में जाना चाहिये। अक्सर यह कहा जाता है कि साँप का जहर दिल और मस्तिष्क तक पहुँचने या पूरे शरीर तक फैलने में लगभग तीन से चार घंटे का समय लेता है, उसके बाद धीरे-धीरे विष का असर पूरे शरीर में होने लगता है। लेकिन इन घंटों में अगर आप अपने दिमाग का सही प्रयोग करके डॉक्टर के पास ले जाने की तैयारी करने के बीच कुछ घरेलू इलाजों के मदद से विष के खतरे को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।
घरेलू इलाज:- साँप के काटे जाने पर ना घबराये। इन घरेलू इलाजों से मरीजों के हालत को कुछ हद तक संभाला जा सकता है, फिर डॉक्टर के पास ले जाये।
घी:-पहले मरीज को 100 एम.एल. (लगभग आधा कप) घी खिलाकर उल्टी करवाने की कोशिश करें, अगर उल्टी न हो तो दस-पंद्रह के बाद गुनगुना पानी पिलाकर उल्टी करवायें, इससे विष के निकल जाने या असर के कम होने की संभावना होती है।
तुअर दाल:-तुअर दाल का जड़ पीसकर रोगी को खिलाने से भी इन्फेक्शन या विष का असर कम होता है।
कंटोला:-कंटोला दो तरह का होता है, एक में फूल और फल दोनों होता है और दूसरे में सिर्फ फूल आता है उसको ‘बांझ कंटोला’ कहते हैं, उसका कंद (bulb) घिसकर सर्पदंश वाले जगह पर लगाने से विष का असर या इन्फेक्शन की संभावना कम होती है।
लहसुन:-लहसुन तो हर किचन में मिल जाता है,उसको पीसकर पेस्ट बना लें और सर्पदंश वाले जगह पर लगायें या लहसुन के पेस्ट में शहद मिलाकर खिलाने या चटवाने से इन्फेक्शन कम हो जाता है।

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