लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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अरविंद जयतिलक

यह बिडंबना कहा जाएगा कि आंदोलन की कोख से उपजी आम आदमी पार्टी जो देश में एक सकारात्मक राजनीति की उम्मीद बनी थी, चर्चा में बने रहने के लिए वह हर हथकंडा आजमा रही है जो न केवल अलोकतांत्रिक और अमर्यादित है बलिक अराजकता की श्रेणी में भी आता है। एक ओर वह राजनीतिक मानदंडों की कसौटी पर खुद को सबसे खरा बता रही है वहीं उसके कार्यकर्ता उदंडता और अराजकता से लोकतंत्र को शर्मसार कर रहे हैं। आश्चर्य है कि आमचुनाव सिर पर है और उसके कार्यकर्ता अपने दल की नीतियों को जनता के बीच ले जाने के बजाए वह सब कृत्य कर रहे हैं जिसकी कभी आलोचना किया करते थे। मुंबर्इ और गुजरात में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जिस तरह अराजक शैली में हुड़दंग मचाया है उससे ढेरों सवाल उठ खड़े हुए हैं। देश जानना चाहता है कि जब पांच मार्च को चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की तिथियों का एलान कर दिया और उसके साथ ही आदर्श चुनाव आचार संहिता भी लागू हो गयी, तो फिर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने गुजरात में रोड शो क्यों करना चाहा? जबकि वे इससे भलीभांति सुपरिचति थे कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद प्रशासन से अनुमति लिए बिना न तो चुनावी सभा की जा सकती है और न ही रोड शो। अगर केजरीवाल को रोड शो करना ही था तो चुनाव आयोग से इसकी अनुमति ले सकते थे। लेकिन वे इसकी जरुरत नहीं समझे, जो दर्षाता है कि वह आदर्श चुनाव आचार संहिता को ठेंगा पर रखते हैं और खुद को कानून से उपर। इस तरह की प्रवृत्ति से एक राजनेता की छवि तानाशाह और अराजक की बनती है। जब गुजरात प्रशासन ने आदर्श चुनाव आचार संहिता का हवाला देकर उन्हें पाटन में रोका तो वे बखेड़ा खड़ा करते देखे गए। साथ ही अपने कार्यकर्ताओं को उकसाने के लिए यह शिगूफा छोड़ा कि उन्हें मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर रोका गया। इसके बाद देश भर में उनके कार्यकर्ता भड़क गए। आप के सैकड़ों कार्यकर्ता दिल्ली में भाजपा कार्यालय पर धावा बोल नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाने लगे। और जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रतिकार किया तो वे र्इंट-पत्थर बरसाने लगे। अब जब उनके अराजक कृत्यों की चतुर्दिक निंदा हो रही है तो वे अपने को निर्दोष बता भारतीय जनता पार्टी को ही गुनाहगार ठहरा रहे हैं। हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी के सदस्य भी पत्थरबाजी किए हो। लेकिन भाजपा के लोगों की मानें तो के शीर्ष नेता आशुतोष, शाजिया इल्मी, जरनैल सिंह, महेंद्र व प्रोफेसर आनंद कुमार अपने कार्यकर्ताओं को समझाने-बुझाने के बजाए उन्हें उकसा रहे थे। अगर इसमें रत्तीमात्र भी सच्चार्इ है तो यह चिंताजनक है। इसलिए कि ये वे नाम हैं जिससे देश सुपरिचत ही नहीं बलिक उनसे लोकतांत्रिक आचरण की अपेक्षा भी करता है। लेकिन उन्होंने अपने समुचित दायित्वों का निर्वहन न कर अपनी छवि मलिन की है। मौंजू सवाल यह है कि अन्य दलों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता अराजकता पर उतारु क्यों हुए? आखिर उनका अराजक आचरण किस तरह नयी राजनीति का मानदंड है? बेशक लोकतंत्र में सभी दलों को अधिकार है कि वह अपना विचार रखें और विरोध दर्ज कराएं। पहले भी जनतांत्रिक तरीके से असहमति जतायी जाती रही है। व्यकितगत तौर पर नेताओं का विरोध भी होता रहा है। किंतु यह रवायत कभी नहीं रही कि एक दल के कार्यकर्ता दूसरे दल के मुख्यालय पर जाकर धरना-प्रदर्शन और हमला करे। लेकिन आप की तथाकथित नयी राजनीति ने लोकतंत्र की गरिमा का क्षरण किया है। अगर उनके अराजक आचरण को देखकर देश इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि आम आदमी पार्टी अपनी ढ़हती लोकप्रियता का ग्राफ ऊंचा उठाने और मुसिलम मतों को पाले में लाने के लिए मोदी के खिलाफ आक्रामक हुर्इ तो यह अनुचित नहीं है। इसलिए कि अब आम आदमी पार्टी भी तथाकथित सेक्यूलर दलों की तरह ही तुष्टिकरण की नीति पर आगे बढ़ रही है। बेशक अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी को गुजरात सरकार की कमियां और भाजपा की नीतियों की आलोचना करने का अधिकार है। लेकिन इसकी आड़ में वह अपने हर अराजक और अलोकतांतत्रिक कदम को न्यायोचित कैसे ठहरा सकते हैं? यह विचार या ख्याल किसी अराजक दल के ही मन में आ सकता है कि वह जो कर रहा है वह देशहित में है और बाकी जो बुरा हो रहा है उसके लिए भाजपा और मोदी जिम्मेदार हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी मीडिया में बने रहने के लिए ऐसा ही सिद्धांत गढ़ रही है। हालांकि गौर करें तो उनकी अराजकता की यह कोर्इ पहली बानगी नहीं है। याद होगा दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुए अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस के अफसरों पर कार्रवार्इ को लेकर रेलभवन पर धरना दिया। जबकि वहां धारा 144 लागू था। इससे नाराज सर्वोच्च अदालत को कहना पड़ा कि संवैधानिक पद पर रहते हुए संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ कोर्इ संविधान के तहत सड़क पर आंदोलन कैसे कर सकता है। केजरीवाल और उनके कार्यकर्ताओं ने मुंबर्इ में अराजकता और गुजरात में चुनाव आचार संहिता का उलंघन कर न सिर्फ अपनी गलती दोहरायी है बलिक असहिश्णुता की राजनीति को भी महिमामंडित किया है। शायद केजरीवाल और उनकी पार्टी इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी है कि मोदी को टारगेट कर मीडिया में सुर्खिया बटोरा जा सकता है। शायद इसीलिए केजरीवाल बगैर अप्वाइमेंट के नरेंद्र मोदी से 16 सवाल पूछने पहुंच गए। सवाल यह कि क्या इस तरह कोर्इ किसी मुख्यमंत्री से मिलता है? केजरीवाल से पूछा जाना चाहिए कि जब वे खुद मुख्यमंत्री थे तो क्या ऐसे किसी से मिलते थे? अगर नहीं तो फिर उन्हें अपने लिए विशेषाधिकार क्यों चाहिए? जब देश के अन्य दल मीडिया के जरिए नरेंद्र मोदी से हजारों सवाल पूछ रहे हैं तो वे क्यों नहीं? अच्छी बात तो यह होगी कि केजरीवाल सिर्फ सवाल ही न पूछे बलिक लोगों के सवालों का जवाब भी दे। लेकिन शायद वह मान बैठे हैं कि उन्हें सिर्फ सवाल पूछने का अधिकार है, उत्तर देने का नहीं। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। याद होगा समाजसेवी अन्ना हजारे ने केजरीवाल से कुछ सवाल किए थे लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया। वे अपने साथियों के सवालों से भी बच रहे हैं। आखिर क्यों? यह आचरण किस तरह लोकतंत्र के अनुकूल है। मजे की बात यह कि एक ओर केजरीवाल मीडिया पर पक्षपातपूर्ण आरोप लगा रहे है वहीं मीडिया की चर्चा में बने रहने के लिए सौ-सौ नौटंकी भी कर रहे हैं। क्या यह उनके दोहरे मानदंड को उजागर नहीं करता है? हो सकता कि केजरीवाल को इस खेल में नफा दिख रहा हो। लेकिन इस तरह की अराजक राजनीति लोकतंत्र की शुचिता को नष्ट करती है। उचित होगा कि केजरीवाल और उनकी पार्टी चुनाव आयोग और आदर्श चुनाव आचार संहिता का सम्मान करें और दलों से टकराव का विचार त्यागें। उचित यह भी होगा कि आम आदमी पार्टी अपनी अराजकता और उदंडता के लिए देश से माफी मांगे। इससे उसकी साख बढ़ेगी। लेकिन शायद केजरीवाल की पार्टी अपने अराजकतावादी दृष्टिकोण को ही लोकतंत्र का मूलमंत्र मान बैठी है।

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3 Comments on "अराजकता के फ्रेम में फिट होती आप"

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गंगानन्द झा
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गंगानन्द झा

प्रारम्भ से से हो रहे भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलनों के स्वरुप में एक उभयनिष्ठ बात रही है– “कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना” क्या इनमें से कोई सचमुच भ्रष्टाचार के ही विरोध में था ?
आत्मघोषित मसीहाओं के द्वारा अन्ना को सामने रखकर सिविल सोसायटी का बैनर लगाकर बनाई गई रणनीति को प्याज के परतों की तरह उघरना ही है।

आर. सिंह
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पहली बात .मैं सहमत हूँ कि इस तरह किसी भी दल के मुख्यालय पर जाना और वहां उकसाये जाने पर वही कुछ करना जो अंदर से हो रहा था,गलत है।लोग यह भी कह सकते हैं कि पत्थर और इंटें पहले बाहर से बरसाई गयीं,तो उनके बारे में मैं यही कहूँगा कि वे वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।अशोक पथ पर ईंटों के उतने बड़े टूकड़े या पत्थर बिखरे हुये नहीं मिलते और न यह संभव था कि आआप के कार्यकर्त्ता ये वस्तुएं झोली में भर कर ले जाते। पहले पत्थर और इंटें अंदर से चली होंगी।बाद में आआप… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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अण्णा के आंदोलन से यह कार्टून क्यों अलग हुआ?
और आगे बढा, तथाकथित भ्रष्टाचार के विरोधमें।
अपेक्षित था, कि, वह मोदी की प्रशंसा करता, उनको जिताने में सहायता करता।पर सारा खेल उलटा खेल रहा है।
भ्रष्टाचार विरोधी मोदी का ही विरोध कर रहा है।
कौनसे तर्क पर? मूर्ख-शिरोमणी “चुनौती स्वीकार करता हूँ”, कहता है।
अबे तुझे चुनौती किसने दी?——लेखक को सुंदर आलेख के लिए धन्यवाद।

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