लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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आज इस कम्प्यूटर युग में मजदूर को मजदूरी के लाले पडे है। ऐसे में 1 मई को मजदूर दिवस मनाये तो कौन मनाये। कल तक बडी बडी मिले थी, कल कारखाने थे, कल कारखानो एंव औधोगिक इकाईयो में मशीनो का शोर मचा रहता था मजदूर इन मशीनो के शोर में मस्त मौला होकर कभी गीत गाता तो कभी छन्द दोहे गुनगुनाता था। पर आज ये सारी मिले कल कारखाने मजदूरो की सूनी ऑखो और बुझे चूल्हो की तरह वीरान पडे है। जिन यूनियने के लिये मजदूरो ने सडको पर अपना लहू पानी की तरह बहाया था उन सारी यूनियने के झन्डे मजदूरो के बच्चो के कपडो की तरह तार तार हो चूके है। फिर भी 1 मई को हम लोग अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर ॔॔मजदूर दिवस ’’ का आयोजन करते है। इस दिन केन्द्र और राज्य सरकारो द्वारा मजदूरो के कल्याणार्थ अनेक योजनाये शुरू की जाती है पर आजादी के 62 साल बाद भी ये सारी योजनाये गरीब मजदूर को एक वक्त पेट भर रोटी नही दे सकी।
मई दिवस का इतिहास यू तो बहुत पुराना है, संघषो की बहुत लम्बी कहानी है दरअसल अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर मई दिवस की शुरूआत अमेरिका में हुई थी। एक दिन में आठ घन्टे काम करने का श्रमिक आन्दोलन अमेरिका में गृहयुद्व के तुरन्त बाद शुरू हो गया था। अमेरिकी नेशनल लेबर यूनियन ने अगस्त 1866 में अपने अधिवेशन में यह मॉग रखी की मिल व कारखनो के मालिक मजदूरो से एक दिन में आठ घन्टे का काम ले। चूकि मालिक मजदूरो से लगातार कडी मेहनत गुलामो की तरह करवाते है जो गलत है, निरंतर काम करने से प्रायः ऐसा हो रहा है की मजदूर थकान और कमजोरी के कारण कल कारखानो में अकसर बेहोश होकर गिर जाते है। अमेरिकी नेशनल लेबर यूनियन की इस घोषणा से दबे कुचले गुलामो की जिन्दगी जी रहे मजदूरो को बल मिला और देखते ही देखते यह आन्दोलन पूरे अमेरिका में फैल गया तथा मजदूरो के संगठित होने के कारण शक्तिशाली होता चला गया।
उन्नीसवी शताब्दी के 9वे दशक में अमेरिका के लगभग सभी प्रमुख ओधौगिक शहरो में मजदूर आठ घन्टे के कार्य दिवस को अपनी मॉग प्रमुखता से उठाने लगे। मजदूरो के प्रर्दशन और आन्दोलन बते चले गये। अमेरिका के शिकागो शहर में 03 मई 1886 को लगभग 40 हजार मजदूर अपनी मांगे सरकार से मनवाने के लिये सडको पर उतर आये। मजदूरो के नारो से पूरा शिकागो शहर गूंज उठा देखते ही देखते प्रर्दशन उग्र हो गया। पुलिस ने बडी बेरहमी से भूखे प्यासे निहत्थे मजदूरो पर गोलिया बरसा दी इस गोलीकाण्ड में घटना स्थल पर 6 मजदूर मारे गये और 40 के लगभग घायल हुए। निर्दोश निहत्थे भूखे प्यासे मासूम मजदूरो का खून जब धरती पर बहा तो प्रदशर्नकारियो में दुगनी ताकत भर गया मजदूरो ने खून से सने अपने साथियो के कपडे उठाये और उन कपडो को परचम बना कर आसमान की तरफ लहरा दिया। तभी से खून से रंगा ये लाल झन्डा मजदूरो के संघर्ष का प्रतीक बन गया।
पुलिस द्वारा निहत्थे बेगुनाह मजदूरो पर की गई इस बर्बर कार्यवाही के मद्दे नजर 04 मई को शिकागो में मजदूरो के साथ साथ शहर की जनता ने भी एक जुलूस निकाला जुलूस के पीछे पीछे चल रही पुलिस की टुक्डी पर किसी शरारती तत्व ने देसी बम फैक दिया जिस के कारण एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई और पॉच पुलिसकर्मी घायल हो गये। इस के बाद पुलिस ने प्रदशर्नकारियो पर अंधाधुंध गोली चला दी आन्दोलन चला रहे नेताओ को पकड पकड कर फॉसी पर लटका दिया गया। इस दमनचक्र के बाद भी मजदूरो का संघर्ष जारी रहा और 1 मई 1890 में इन महान बलिदानीयो की स्मृति में पूरे विश्व में ॔॔स्मरण दिवस’’ मनाने का आहवान किया गया और बाद में यह “मजदूर दिवस’’ के रूप में मनाया जाने लगा।
मजदूरो के प्रदशर्न और आन्दोलनो को देखते हुए अमेरिकी काग्रेस ने आठ घन्टे के कार्य दिवस का कानून 25 जून 1886 लगभग बीस साल मजदूरो और अमेरिकी नेशनल लेबर यूनियन द्वारा चलाये आन्दोलन के बाद संसद में पारित किया। आठ घन्टे कार्य दिवस का कानून 6 अमेरिकी राज्य विधान मंडलो में भी बनाये गये पर शुरू शुरू में मालिको पर इस का कोई प्रभाव नही पडा और न ही मजदूरो को काम के घन्टो में छूट दी गई,लेकिन मजदूर एक दिन में आठ घन्टे कार्य के लिये संघर्ष करते रहे।
आज हम दफतरो ,कारखानो ,दुकानो , प्राईवेट प्रतिष्ठानो, घरो, भट्टो पर आज हम लोग आराम से आठ घन्टे छः घन्टे की डयूटी अन्जाम देते है। बाकी आराम या ओवर टाईम करते है। ये सही है कि इन्सान मेहनत करता है तो एक तय सीमा के बाद उस का शरीर थकने लगता है उस के काम करने की क्षमता में गिरावट आने लगती है इस के लिये ये जरूरी है कि वो थोडा आराम करे ताकि अगले दिन फिर से कार्य करने के लिये वो तरोताजा हो सके। ये ॔॔श्रमिक दिवस’’ अथवा ॔॔मजदूर दिवस’’ आखिर क्यो मनाया जाता है। इस का अर्थ आज भी असॅख्य मजदूर नही जानता ये दिवस कितनी कुर्बानियो के बाद हासिल हुआ इस का एहसास तक नही है हमे।
आज इस कम्प्यूटर युग ने मशीनो की रफतार तो तेज कर दी परन्तु कल कारखानो और औधोगिक इकाईयो की रौनक छीन ली मजदूरो से भरी रहने वाली ये मिले कारखाने कम्प्यूटरीकृत होने से एक ओर जहॉ मजदूर बेरोजगार हो गया वही ये इकाईया बेरौनक हो गई। या यू कहा जाये की मजदूर के बगैर बिल्कुल विधवा सी लगती है। मजदूर आज भी मजदूर है चाहे कल उसने ताज महल बनाया हो ताज होटल बनाया हो या फिर संसद भवन,उसे आज भी सुबह उठने पर सब से पहले अपने बच्चो के लिये शाम की रोटी की फिक्र होती है।
 
देश की नय्या को ये खेता हमारे देश में
हर बशर इस का लहू पीता हमारे देश में
तन से लिपटा चीथडा है पेट से पत्थर बधॉ
इस तरहा मजदूर जीता है हमारे देश में
ताज इस का है अजन्ता और एलौरा इस की है
फिर भी ये फुटपाथ पर सोता हमारे देश में।

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1 Comment on "तन से लिपटा चीथडा है पेट से पत्थर बधॉ,,,,,,"

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अभिषेक पुरोहित
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क्षमा कीजियेगा क्या मिला मजदूर को??कुछ नहीं,केवल कुछ लोगो की तानाशाही हो गयी रूस,चीन,बंगाल व् केरल में,हिंसक दोr चला ,कोई उधोय्ग नहीं कोई कारखाना नहीं,केवल हड़ताल हड़ताल ओउर फिर हड़ताल……………अगर उन लोगो ने हड़ताल के साथ अगर मजदूरों की कुशलता बढ़ने का प्रयत्न किया जाता तो ज्यादा फायदा ही नहीं होता बल्कि एसा कोई मजदूर कल को मालिक भी बनता ,लेकिन हड़ताल ने मजदूर को अलसी बनाया वाही उसके जीवन स्तर में भी कोई सुधर नहीं हुआ उसे व्यसन युक्त बनाया गया,उसे बही निष्ठां से जोड़ा गया उसने जबरदस्त हिंसाचार किया,इश्वर-विवाह-धर्म की निंदा ही न की गयी बल्कि उसे चोट… Read more »
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