लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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डॉ. दीपक आचार्य

अनायास जो विचार आए लिख लें

दुबारा कभी पास नहीं फटकते ये

दिव्य तरंगों का बहुत ही व्यापक संसार हमारे इर्द-गिर्द दिन-रात परिभ्रमण करता रहता है। इन तरंगों का सीधा संबंध उन सभी विषयों से होता है जो इतिहास में घट चुके हैं, घट रहे हैं और आने वाले समय में घटने वाले हुआ करते हैं।

इनका संबंध हमारे स्वयं से, अपने परिवार से और परिवेश से लेकर उन सभी से हो सकता है जिनके साथ हमारे संपर्क हैं अथवा होने वाले हैं। व्यक्ति के जीवन की हर घटना के बारे में पूर्व संकेत काफी अर्से पहले जारी हो जाते हैं। इन्हें अपने सामने होने वाली अप्रत्याशित एवं आकस्मिक घटनाओं के माध्यम से जाना जाता है।

इसके अलावा हममें अथवा प्रकृति में जो भी परिवर्तन होने वाले होते हैं उनके बारे में हर व्यक्ति तक एक बार पूर्व संकेत पहुँचते ही हैं लेकिन बहुत थोड़े लोग ऐसे होते हैं जो इन संकेतों को समझ पाते हैं और उसी के अनुरूप निर्णय लेते हैं अथवा बिना व्याकुलता अथवा प्रसन्नता के द्रष्टा भाव से सब कुछ सहज भाव से देखते रहते हैं।

इन संकेतों के आगमन एवं इनकी प्राप्ति को समझने के लिए थोड़ी सी सतर्कता होनी जरूरी है। ये संकेत बहुत ही आकस्मिक होते हैं और धीमे स्वर में अपने तक पहुंचते हैं। ऐसे में हम जीवन में हर क्षण इतने शोरगुल से भरे रहते हैं कि हमें ऊपर से आने वाले किसी भी संदेश या विचार की भनक तक नहीं पड़ पाती। इन स्थितियों में हमारी ग्राह्यता क्षमता का ह्रास होने की वजह से हमारे लिए जारी किए जाने वाले संदेशों को हम पकड़ नहीं पाते।

इसी प्रकार ईश्वर और प्रकृति संसार के विभिन्न देशों में जिन लोगों से काम कराना चाहती है उन तक अपने दिव्य विचारों का प्रवाह करती रहती है। ये विचार हमारे जेहन में तभी पहुंच पाते हैं जब हम कभी न कभी कुछ क्षण के लिए ही सही, सारे कामों को त्यागकर शून्यावस्था का अहसास करें।

इस अवस्था में हमें खाली पात्र पाकर ये विचार हमारे आभामण्डल से टकराकर लौटते नहीं बल्कि हमारे में मन-मस्तिष्क में मूर्त्त रूप ले लेते हैं। ये विचार हमारे जीवन, कर्म और परिवेश से लेकर किसी भी प्रकार के हो सकते हैं।

दिन-रात में कई मौके हमारे सामने ऐसे आते हैं जब हमारे मन में कोई न कोई ऐसे विचार आ ही जाते हैं जिन्हें पहले कभी सुना नहीं होता है। ये हमारे काम के भी हो सकते हैं और हमारे माध्यम से औरों के काम के भी।

जो विचार व्यक्ति के मानसपटल पर अनायास आ जाते हैं वे ईश्वरीय सत्ता से प्रेरित होते हैं और उन्हें पकड़ कर इन पर आगे बढ़ा जाए या काम किया जाए तो वे कार्य श्रेष्ठतम परिणाम और कीर्ति प्रदान करते हैं और इनका वजूद कालजयी होता है।

हममें से बहुत से लोगों के जीवन में ऐसे मौके कई-कई बार आते हैं जब हमारे मन-मस्तिष्क में अचानक कोई विचार आ जाता है और हम उसके प्रति बेपरवाह रहते हैं। ऐसे में यह विचार समानधर्मा किन्हीं और लोगों के जेहन तक पहुंचने का प्रयास करता है।

यह विचार तब तक परिभ्रमण करता रहता है जब तक कि इसका आदर करने वाला कोई न मिल जाए। कई बार हम जब नए विचारों और कामों की चर्चा सुनते हैं तब हमें यह पता चलता है कि यही विचार उन तक भी पहुंचा था लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया। इसी विचार पर वे भी काम करना चाहते थे लेकिन अपने आलस्य की वजह से नहीं कर पाए। इन स्थितियों में आत्मग्लानि होना स्वाभाविक ही है। ऊपर से प्र्राप्त होने वाले ये दिव्य विचार एक बार अवज्ञा कर देने पर फिर कभी याद नहीं आ पाते, चाहे जितना सर खपाया जाए।

जो लोग इन दिव्य और आकस्मिक विचारों के प्रति गंभीर और सजग होते हैं वे इन विचारों के आते ही इन्हें अपनी डायरी या और कहीं लिख लेते हैं, वहीं ये दिव्य विचार या ऊपर से प्राप्त संदेश टिक जाते हैं और फिर आगे नहीं बढ़ पाते। इन अनायास प्राप्त विचारों को पकड़ कर आगे बढ़ा जाए तो हमे आशातीत सफलता और यश प्राप्त होने लगता है। और यह गौरव लम्बे समय तक बरकरार रहता है।

पहले जमाने में ऋषियों को करीब-करीब इसी प्रकार से दिव्य विचारों व संदेशों की सहज प्राप्ति होती थी जिन्हें बाद में मंत्र की संज्ञा दी जाती थी। कुछ-कुछ ऐसा ही इन दिव्य विचारों के बारे में भी है।

हमें चाहिए कि जिस क्षण जो विचार आए, उसे लिख डालें और फिर जब समय मिले उस विचार पर काम करें। दिव्य विचारों की प्राप्ति उन लोगों को ज्यादा और स्पष्ट होती है जिनका जीवन सात्त्विक होता है, मलीनता नहीं होती और नैतिक चरित्र से भरे-पूरे होते हैं। दुष्ट और भ्रष्ट लोगों तक इन विचारों की पहुँच कभी संभव नहीं हो पाती क्योंकि ये लोग षड़यंत्रों और निन्यानवे के फेर में ऐसे उलझे रहते हैं कि इनका चित्त कभी शांत हो ही नहीं पाती।

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