लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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नरेश भारतीय

आज गर्व और श्रद्धा के साथ भारत माता के उन तीन वीरों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के स्मरण का दिन है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए हँसते हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी थी. ८५ वर्ष पूर्व २३ मार्च १९३१ की संध्या की कल्पना करें जब लाहौर की जेल में अचानक भारत माता की जय और वन्दे मातरम के नारे गूँजने लगे थे. फांसी देने के लिए निर्धारित तिथि २४ मार्च से एक दिन पहले ही उन्हें फांसी दे दी गई थी. ब्रिटिश हुक्मरानों के दिल में यह भय समा गया था कि दिन के उजाले में उन्हें फांसी देने से देश में उनके शासन के विरुद्ध भारी जनरोष उमड़ सकता है. अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारियों के द्वारा उठाए गए हर कदम से देश भर में जिस तरह से उत्साह और बलिदान की भावना को बल मिलता था उसके दृष्टिगत उनकी यह सोच सही ही थी. उनका क्रांति मार्ग सुलह समझौतों की राजनीति की अपेक्षा जनता में कहीं अधिक जोश भर देने वाला सिद्ध हो रहा था. अपने आप में यह क्रांतिकारियों की ताकत का सबूत भी था. उनकी प्रखर देशभक्ति और भारतमाता के चरणों में अपने शीश न्यौछावर कर देने की उनकी तत्परता का प्रत्यक्ष प्रकटीकरण. तब देश के युवाओं के लिए एक संदेश जाता था कि ‘अपना सर उठा कर चलो, सर झुका कर नहीं’. आज भी उस हर किसी की ज़ुबान पर ‘इन्कलाब जिंदाबाद’, भारत माता की जय और वन्देमातरम के नारे बरबस आ जाते हैं जब कहीं होते अन्याय, शोषण और देशद्रोही कृत्य के विरुद्ध जन आह्वान करने की  आवश्यकता पड़ती है.

२३ वर्ष के आसपास थी इन तीनों महाबलिदानी वीरों की उम्र जब उन्होंने अपने यौवन को देश की स्वतंत्रता की बलिवेदी पर न्यौछावर करके विश्व के लिए अनुपम उदाहरण कायम कर दिया था. देश की कोटि कोटि जनता उनके अमरत्व को पलपल सलाम करती है. अपनी संतानों को उनके बलिदान की यशगाथा सुना कर प्रेरित करती आई है. रोंगटे खड़े होते हैं और खून उबलता है जब २३ मार्च की रात के उस भयानक अँधेरे को चीरता यह सत्य उजागर होता है कि तीनों शहीदों के शरीर के टुकड़े करके एक ट्रक से उनके शव लाहौर से फिरोजपुर लाए गए थे. सतलुज नदी के किनारे अग्नि की भेंट कर दिए गए. शहर के लोगों तक खबर पहुंचते ही कुछ लोग भागे गए और उस धरती की मिट्टी लेकर अपने मस्तक पर लगाने लगे. परिवार के लोग भी पहुँच गए जिन्हें फांसी के बाद शव सौंपे नहीं गए थे. भारत पाकिस्तान की सीमा के पास स्थित इस पवित्र स्थान पर उनका स्मारक बना है.

भगत सिंह के बलिदान के बाद देश की युवा शक्ति और अधिक साहस के साथ उठ खड़ी हुई. आज़ादी के लिए जारी संघर्ष को और बल मिला. अहिंसा मार्ग के अनुगामी और इस कारण भगतसिंह के क्रांतिमार्ग के आलोचक रहे गाँधी ने इरविन के साथ अपनी समझौता वार्ता में भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को दी जाने वाली फांसी को रद्द करवाने की कोशिश नहीं की थी. इसी कारण गाँधी के प्रति जनरोष उमड़ा था. उनके विरुद्ध स्थान स्थान पर काले झंडे दिखाने की चर्चा हाल में  उजागर हुए तथ्यों में मिलती है. क्रांतिकारियों के संगठन को कुछ ऐसे देशद्रोहियों ने बर्बाद कर दिया था जो अंग्रेजों के वादामाफ गवाह बन गए थे और उन्होंने उनके सब ठिकानों के रहस्य बता दिए थे. ‘हिन्दुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ के नाम से अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष को कारगर बनाने वाले बहादुर कमांडर-इन-चीफ चन्द्रशेखर आज़ाद के भी, किसी के धोखा देने से, शहीद हो जाने के बाद  युद्ध का यह मोर्चा बंद हो गया. यह है देशद्रोह का एक और प्रकरण. हमारा इतिहास, दुर्भाग्यवश, ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है जब एक तरफ देश को विदेशी दासता से बचाने के लिए अद्भुत शौर्यपूर्ण युद्ध लड़े गए हैं और दूसरी तरफ देशद्रोहियों ने देशभक्तों के बलिदानों को लांछित करके मां भारती का अपमान किया है.

इसी परिप्रेक्ष्य में, मुझे यह देख कर दुःख होता है कि लम्बे संघर्ष के बाद मिली आज़ादी के ६९ वर्षों के बाद आज भारत अबोध बच्चों की तरह देशभक्ति और देशद्रोहिता की परिभाषा को खोजता भटकता दिखाई देने लगा है. जब कोई कन्हैया ‘आज़ादी’ का नारा देकर देश के टुकड़े टुकड़े कर देने के नारे लगाने वालों के साथ जा खड़ा है. ऐसी भाषा बोलता है जिसमें देशद्रोह की गंध आती है. संविधान के प्रति निष्ठा की दुहाई देता है लेकिन अपने व्यवहार से भारत विरोध को ‘आवाज़’ देता है. वामपंथी मीडिया उसे शह देता है.  देश में जनमत को बांटने का क्रम शुरू हो जाता है. अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी के होते हुए भी बार बार इस हक को जतलाया जाता है. किसी के द्वारा कुछ भी कहने की छूट का दावा किया जाने लगता है. जिस तरह की बहस सुनी देखी है विश्वास नहीं होता कि हजारों वर्षों की दासता की यातनाएं भुगतने के बाद भी देश में ऐसे लोग हैं जो देश के टुकड़े टुकड़े करने वालों की सोच को समर्थन दे सकते हैं. ये लोग इन्कलाब जिंदाबाद के नारों के साथ शहीदेआजम भगत सिंह को अपने साथ जोड़ लेते हैं. उन्हें भारत की धरती पर पनपे राष्ट्रवाद से चिढ है लेकिन  विदेशी भूमि पर पनपे मार्क्सवाद पर गर्व है जो समय के तेज़ बहाव में डूब चुका है. अपने देशधर्म को पूर्ण समर्पण भाव के साथ निभाने वाले भगतसिंह भारत के जन जन के ह्रदय में यूं समाए हैं कि वे किसी एक वर्ग, धर्म, सम्प्रदाय और विचारधारा के बंधन में नहीं बंध सकते. देश के वीर शहीदों को बाँट कर देखने वाला समाज देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकता. जरा सोचें क्या भगत सिंह जो देश की आज़ादी के लिए कुर्बान हो गए आज उसी देश के फिर से टुकड़े टुकड़े कर देने का संकल्प लेने वालों का साथ देते? जेएनयू के इन छात्रों के द्वारा भगतसिंह को अपने कवच के रूप में इस्तेमाल करना उनके प्रति सम्मान को प्रदर्शित करता है?

देश में विरोध पक्ष के द्वारा इस समय राजनीति का जो बचकाना खेल खेला जा रहा है उसका दिलचस्प नमूना तब देखने को मिला जब कम्युनिस्ट, कांग्रेसी और आआपा इन सरफिरे छात्रों का साथ देने के लिए उनके साथ जा खड़े हुए. सत्तापक्ष भाजपा के द्वारा यह सवाल उठाए जाने के बाद कि इन छात्रों ने तो देश को तोड़ देने तक के नारे लगाए हैं विरोधी पक्ष को कोई उत्तर सूझा नहीं. लेकिन जब हाल ही में कांग्रेस के एक सुलझे समझे  नेता माने जाने वाले शशि थरूर ने भी अपनी एक टिप्पणी में कन्हैया को भगतसिंह के बराबर ला खड़ा किया तो मन की पीड़ा और गहरी हो गई. क्या राजनीति में देशभक्ति के स्थान पर वोटभक्ति हावी हो गई है? आज़ादी के पश्चात जिस तरह के राजनीतिक वातावरण का निर्माण देश में होता आया है उसमें सचमुच देशभक्ति की परिभाषा को स्पष्ट करना अब समय की आवश्यकता बन चुकी है. अरसे से स्वार्थपूति का साधन बनी राजनीति जनता के शोषण का साधन बनी रही है. दर्जनों घपले घोटाले, रिश्वत काण्ड, जमाखोरी और कालेधन के किस्सों से भरा इसका आज़ादी के बाद का रचा गया इतिहास है. निस्संदेह, इसे बदले जाने की आवश्यकता है. वर्तमान सरकार राष्ट्रवादी भाजपा की सरकार है अब तक जमा किए गए कूड़े कीचड़ को साफ़ करने का वादा जनता से करके पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई है. उसका काम विरोध पक्ष के द्वारा खड़ी की गईं अड़चनों के कारण रुकता है. छिछली राजनीति की धूल संसद में उड़ने लगती है. कहीं कोई ‘भारत माता की जय’ कहने से इन्कार करता है क्योंकि किसी राष्ट्रवादी संस्था ने इसका आग्रह किया है. कहीं किसी से यह दुहाई दी जाने लगती है कि भारतमाता की जय इसलिए भी नहीं बोली जा सकती क्योंकि उनका मज़हब इसकी अनुमति नहीं देता. उनके लिए मज़हब देश से ऊपर है.

जहाँ तक देशभक्ति की खोजी जा रही परिभाषा का प्रश्न है अंतरात्मा में झांकें. उत्तर विद्यमान है. आज़ादी से पूर्व के भारतीयों में देश को विदेशी दासता से मुक्त कराने की धुन सवार थी. उनमें देशभक्ति का ज्वार उस युग की ऐसी परिस्थितियों से उत्पन्न हुआ था जो विदेशी साम्राज्यवाद की देन थीं. विदेशी शासकों ने हर तरह से हमारा शोषण किया. कोई भी कौम इस तरह के शोषण और दासता को हमेशा के लिए स्वीकार नहीं करती. इसलिए विश्व भर में जहाँ कहीं साम्राज्यवादी शक्तियाँ हावी थीं उनके विरुद्ध संघर्ष हुआ. सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्रांतियों को जन्म मिला. बचपन से ही खोजी प्रवृति के भगत सिंह ने फ़्रांस और रूस की क्रांतियों का अध्ययन किया. मार्क्सवाद को भी समझा. अपने देश में साम्राज्यवादी अंग्रेजों को मात देने के लिए उन्होंने अपने इस अध्ययन का समुचित उपयोग जवाबी तर्कों के रूप में किया. उनका सर्वप्रथम लक्ष्य था विदेशियों से भारत को मुक्त करना और उसके बाद किसी भी प्रकार के शोषण से मुक्त समाज की रचना. उनका एक स्वप्न २३ मार्च १९३१ को उनके बलिदान के बाद के मात्र १६ वर्ष बाद १९४७ में पूरा तो हुआ लेकिन दुर्भाग्यवश भारत के टुकड़े होने के बाद. गाँधी और उनकी कांग्रेस ने मज़हबी आधार पर देश के बंटवारे को स्वीकार करके ऐसी ऐतिहासिक भूल कर दी जिसका दुष्फल आज भी भारतीय भूखंड भुगत रहा है. भगत सिंह होते तो देश के टुकड़े ने होने देते क्योंकि भारतमाता की खंडित प्रतिमा को वे कदापि स्वीकार न करते.

भगतसिंह नास्तिक थे क्योंकि उन्होंने स्वयं इसकी मीमांसा की है इस बात को वामपंथियों के द्वारा बढ़ चढ़ कर प्रचारित किया जाता है. मेरी मान्यता यह है कि वे तो भारतमाता की अखंड प्रतिमा के अनन्य उपासक थे. उन्हें इसके सिवा और किसी देवी देवता और भगवान की पूजा अर्चना करके की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई. उनका एक ही लक्ष्य था भारत की विदेशी दासता से मुक्ति और एक ऐसे समाज की रचना जिसमें किसी के द्वारा किसी के भी शोषण के लिए कोई स्थान न हो. इसे समाजवादी व्यवस्था कहा जाए अथवा साम्यवादी  उनकी इस सोच को मार्क्सवादी कह कर आयातित विदेशी विचारधारा को बल प्रदान करें लेकिन भगतसिंह की देशभक्ति अक्षुण्ण है. उनके साहसी एवं स्वार्थ से सर्वदा मुक्त बलिदान की भावना का सम्मान करते हुए उन्हें खेमों में बाँध कर रखने की प्रवृति को रोके जाने की आवश्यकता है. वे हर तरह से राष्ट्रवादी थे क्योंकि उनकी विचारदृष्टि सर्वदा राष्ट्रहितपरक थी. मैं उन्हें किसी और दृष्टि से देखने की सोच का समर्थन नहीं करता. आज उनके बलिदान दिवस पर यही अपेक्षा भारत के करोड़ों देशभक्तों से भी करता हूँ कि जन जन के ह्रदय में बसे इन महा बलिदानी वीरों की छवि को धूमिल न होने दें.

जिन्होंने लिख दी थी अपने खून से देशभक्ति की परिभाषा,कौन है अनजान जो यह पूछे कि देशभक्ति क्या है.

 

नरेश भारतीय

 

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