लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम

देश के संसदीय लोकतांत्रिक इतिहास में शुक्रवार का दिन एक ऐसे फैसले का गवाह बना जिसने कई ज्वलंत सवालों को जन्म दे दिया है| मध्यप्रदेश विधानसभा से निष्काषित २ विधायकों की सदस्यता विशेष सत्र आहूत कर बहाल करने के सत्तापक्ष के निर्णय ने एक अनुचित परिपाटी के चलन का मार्ग प्रशस्त किया है जिसके दुष्परिणाम भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था में स्पष्ट दृष्टिगत होंगे| गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में मानसून सत्र की कार्रवाई के दौरान भ्रष्टाचार के मामले पर बहस की मांग करते हुए विपक्षी सदस्यों ने १८ जुलाई को आसंदी पर कब्ज़ा कर सदन की मर्यादाओं को तार-तार कर दिया था| सदन में लगे कैमरों में ९ विधायकों के चित्रों के आधार पर सत्तापक्ष ने विधानसभा अध्यक्ष से कार्रवाई की अनुशंसा की थी| इन ९ विधायकों में २ सबसे मुखर विपक्षी विधायक; ) की सदस्यता को समाप्त करने का प्रस्ताव संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्रा की ओर से आया था जिस पर सत्तापक्ष ने सर्वसम्मति से मुहर लगा दी| पहले से ही अल्पमत विपक्ष इस पूरे मामले पर भी एकजुट नहीं हो सका| बाकी के ७ विपक्षी विधायकों पर कार्रवाई को लेकर उहापोह की स्थिति थी कि अचानक दोनों निलंबित विधायकों की ओर से विधानसभा अध्यक्ष को खेद प्रकट करने की खबर ने प्रदेश के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति को भी गर्मा दिया| सत्तापक्ष की ओर से इस पूरे मामले में जहां मंत्रियों के मुकाबले मुख्यमंत्री की कमजोर स्थिति उजागर हुई वहीं कांग्रेस आलाकमान ने प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया, नेताप्रतिपक्ष अजय सिंह समेत दोनों निलंबित विधायकों को दिल्ली तलब किया गया| दिल्ली में जहां १० जनपथ में इस पूरे मामले को संज्ञान में लिया जा रहा था वहीं प्रदेश में इसकी दूसरी ही स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी| संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्रा, उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी सहित मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान; राज्यपाल से मिलकर इस मसले को सुलझाने के संवैधानिक समाधान खोज रहे थे| आखिरकार भारी विरोध तथा ऊहापोह के बाद विधानसभा अध्यक्ष ने विशेष सत्र आहूत करने बाबत सूचना जारी की| हालांकि उन्होंने इसे संविधान सम्मत बताया व चुनाव आयोग से चर्चाउपरान्त किया गया फैसला बताया किन्तु हास्यास्पद स्थिति तब बनी जब राज्य निर्वाचन आयुक्त जयदीप गोविन्द ने मीडिया में पत्र जारी कर उनके दावों की पोल खोल दी| उन्होंने स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष ने दोनों निलंबित विधायकों की बहाली हेतु विशेष सत्र आहूत करने बाबत कोई चर्चा नहीं की| खैर, तमाम उतार-चढ़ावों के बाद शुक्रवार को मध्यप्रदेश विधानसभा में विशेष सत्र बुलाया गया जो मात्र ५ मिनट की कार्रवाई के बाद ही समाप्त कर दिया गया| इन ५ मिनटों में दोनों निलंबित विधायकों की विधायकी प्रारम्भिक स्तर पर तो बहाल कर दी गई किन्तु इस बहाली पर अंतिम निर्णय चुनाव आयोग को करना है| यहाँ एक बात गौर करने वाली है कि यह पूरा मामला मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में भी विचाराधीन है जिसपर फैसला आना बाकी है| यह तो हुई पूरे मामले की संछिप्त कहानी| अब इसके दूसरे पक्ष को देखें तो कई ऐसे पेंच दिखाई पड़ते हैं जिनसे भावी राजनीतिक तस्वीर अलहदा दिखलाई देती है| पूरे मामले पर ध्यानार्थ दृष्टि से देखें तो यह परंपरा एक गलत परिपाटी को जन्म देगी|

 

जब विधानसभा ने दोनों विपक्षी विधायकों की विधानसभा सदस्यता समाप्त कर दी थी और निर्वाचन आयोग भी उनके निर्वाचन को शून्य घूषित कर चुका था| यहाँ तक कि दोनों निलंबित विधायक २२ जुलाई को हुए राष्ट्रपति चुनाव में मतदान नहीं कर पाए थे, ऐसे में एक सामान्य नागरिक बन चुके इन निलंबित विधायकों को पुनः प्रारम्भिक चरण में बहाल करने का निर्णय कहीं से भी न्यायोजित नहीं ठहराया जा सकता| फिर यदि विधानसभा के पास इस प्रकार का विधायकी नवाजने का कोई अधिकार है तो क्या एक सामान्य नागरिक को माननीय सदन विधायकी देने की हिम्मत करेगा| हाल ही में प्रदेश सत्तापक्ष से जुड़े दो प्रमुख कारोबारियों पर पड़े आयकर छापों से पूरी सरकार बैकफुट पर थी| दोनों कारोबारियों के यहाँ बड़ी मात्रा में अवैध संपत्ति बरामद हुई थी और जांच के दौरान यह खुलासा भी हुआ था कि दोनों ही सत्तापक्ष के जुड़े होने का भरपूर सियासी लाभ उठा रहे हैं| विधानसभा के मानसून सत्र में इनके काले कारनामों की पोल खुलना तय थी जिससे सरकार की पेशानी पर बल पड़ रहे थे| ८ वर्षों से प्रदेश की सत्ता से महरूम कांग्रेस के लिए यह स्थिति संजीवनी का कार्य कर सकती थी किन्तु अतिउत्साह तथा बाद के घटनाक्रम ने पार्टी की खूब भद पिटवाई| निलंबन की कार्रवाई से सत्तापक्ष भी आशंकित था लिहाजा नियम विरुद्ध जाकर बहाली करवाना कहीं न कहीं दूषित राजनीति की शुरुआत है| इस बात की प्रबल संभावना जताई जा सकती है कि मध्यप्रदेश विधानसभा के निर्णय को नजीर मानते हुए अन्य राज्य विधानसभाएं भी निलंबन और बहाली की कार्रवाई को अंजाम देने लगें| इससे तो विपक्षी सदस्यों को आसंदी पर चढ़ने की मूक स्वतंत्रता सी मिल गई है| अब विपक्षी सदस्यों को निलंबन का कोई डर नहीं रहेगा और यदि निलंबन होता भी है तो अंदरखाने मामला सुलझा लिया जाएगा| हालांकि राज्य विधानसभा में पारित प्रस्ताव की सूचना अब चुनाव आयोग को भेजी जाएगी| विधानसभा के इस प्रस्ताव पर अब आयोग कानूनी राय लेगा कि रिक्त घोषित इन सीटों पर बहाली हो सकती है या नहीं| इस प्रक्रिया में समय लग सकता है| २०१३ में प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं| ऐसे में यह संभावना भी है कि चुनाव आयोग दोनों की बहाली पर कोई फैसला न लेते हुए चुनाव द्वारा ही रिक्त सीटों को भरने की अनुशंसा कर दे| वहीं न्यायालय का आदेश भी आना बाकी है| कुल मिलाकर पूरे प्रकरण को हड़बड़ी में निपटाया गया लगता है| यहाँ तक कि राज्य निर्वाचन आयोग के एतराज के बाद मुख्य निर्वाचन आयोग ने भी विधानसभा के विशेष सत्र को नियम विरुद्ध बताते हुए इसके औचित्य पर प्रश्न-चिन्ह लगाए हैं| वैसे अब गेंद निर्वाचन आयोग के पाले में हैं और अंतिम निर्णय ही इस मामले से पर्दा उठाएगा|

 

अपनी तरह के इस पहले मामले ने संवैधानिक कानूनों की तमाम वर्जनाओं को ध्वस्त किया है| ऐसी भी आशंका है कि इस प्रकरण से न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है| इसकी संभावना कम ही कम किन्तु संसदीय इतिहास के इस पहले मामले को लेकर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा| हालांकि न्यायपालिका ने इन मामलों में विधानसभा की सार्वभौमिकता का सदा सम्मान किया है| विधानसभा की संसदीय इतिहास में किसी भी अवमानना के दोषी निलंबित विधायी सदस्य की बहाली के प्रमाण नहीं मिलते हैं| मध्यप्रदेश विधानसभा में ही आसंदी का अपमान करने पर १९६८ में यशवंतराव मेघावाले और पंढरीनाथ कृदत्त को सदन से निष्काषित किया गया था| १९७८ में सुरेश सेठ भी इसी अवमानना का शिकार हुए थे| सेठ ने अपने निलंबन की कार्रवाई को न्यायालय में चुनौती दी थी जिसका निर्णय ३० वर्षों बाद आया था| १९९३-९४ में कांग्रेस विधायक सत्यव्रत चतुर्वेदी ने भी सदन की कार्रवाई के दौरान तैश में आकर अपना इस्तीफ़ा आसंदी को सौंप दिया था जिससे उनकी विधानसभा सदस्यता स्वतः समाप्त हो गई थी| बाद में उन्होंने इसकी बहाली हेतु प्रयास भी किए किन्तु उन्हें भी राहत नहीं मिल पाई थी| ऐसा ही एक बहुचर्चित मामला तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का है जिनकी सदस्यता बहाली को न्यायालय ने मानने से इंकार कर दिया था जिसके बाद उन्हें दोबारा निर्वाचित होकर सदन की सदस्यता प्राप्त हुई थी| जब संसदीय इतिहास में निलंबन व बहाली के प्रावधानों से जुड़े इतने उदाहरण हैं तो मध्यप्रदेश विधानसभा तथा सत्तापक्ष ने किस कानूनी आधार पर विशेष सत्र आहूत कर निलंबित विधायकों की बहाली सुनिश्चित करवाई? अब इस निर्णय के कानूनी प्रावधानों से लेकर लाभ-हानि के गुण-दोष निकाले जायेंगे किन्तु यह सत्य है कि मध्यप्रदेश विधानसभा ने संसदीय लोकतांत्रिक परम्पराओं को निजी स्वार्थों की वजह से दूषित किया है जिसका दुष्परिणाम देश को भुगतना पड़ेगा|

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