लेखक परिचय

अलकनंदा सिंह

अलकनंदा सिंह

मैं, अलकनंदा जो अभी सिर्फ शब्‍दनाम है, पिता का दिया ये नाम है स्वच्‍छता का...निर्मलता ...सहजता...सुन्दरता...प्रवाह...पवित्रता और गति की भावनाओं के संगम का।।। इन सात शब्‍दों के संगमों वाली यह सरिता मुझे निरंतरता बनाये रखने की हिदायत देती है वहीं पाकीज़गी से रिश्तों को बनाने और उसे निभाने की प्रेरणा भी देती है। बस यही है अलकनंदा...और ऐसी ही हूं मैं भी।

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1946 में लिखी बाबा नागार्जुन की ये कविता ईश्वर के प्रति आस्था की मांग के बजाय अनास्था मांगती है जो वैचारिक साहस था उनका। उस समय इस कविता को दो तरह की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा, एक तो आश्चर्य का भाव देतीं और दूसरी निंदा का। आपातकाल के पश्चात् प्रकाशित हुए अपने कविता संग्रह ‘हजार हजार बाहों वाली’ में कल्पनाजनित ईश्वर से कुछ यूं बतियाते हैं बाबा …

कल्पना के पुत्र हे भगवान।
चाहिए मुझको नहीं वरदान।।
दे सको तो दो मुझे अभिशाप।
प्रिय मुझे है जलन प्रिय संताप।।
चाहिए मुझको नहीं यह शान्ति।
चाहिए संदेह उलझन भ्रांति…।।

ईश्वर से अपने लिए अभि‍शाप, जलन, संताप, संदेह, उलझन भ्रांति मांगती यह कविता उस आमजन की कविता है जो आज के संदर्भ में एकदम फिट बैठती है कि जब इतना सब नकारने के साधन होंगे तो व्यक्त‍ि ना आलस्य करेगा और ना ही अहंकार की भावना उसमें आएगी। समस्याओं को नज़रंदाज कर देने से वे टलती नहीं,  बल्क‍ि और विशालतम रूप में सामने आती हैं। जब ईश्वर वरदान की जगह इतने  सारे कारण दे देगा चिंताओं के, तो निगाहें चौकस रहेंगी ही।
बाबा की कविता भाजपा के हार के कारणों पर सटीक बैठती है । दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जबर्दस्त जीत भारत के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक ‘निर्णायक मोड़’ और भारतीय जनता पार्टी जैसी बड़ी पार्टी के लिए भारी पराजय का सबब है। वो  अपनी पराजय के कारण तक नहीं ढूढ़ पा रहे।

दिल्ली की जनता ने लोकतंत्र की महानता को एक बार फिर साबित कर दिखाया। कुछ ऐसा ही  लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को भारी बहुमत से जिताकर जनता ने दिखाया था।
हालांकि आम आदमी पार्टी से लेकर ममता बनर्जी तक इस जीत का क्रेडिट ले रही हैं मगर ये इनकी विजय कम, उन मुद्दों की हार ज्यादा है जो जनता को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दिला पाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी प्रयासों को छोड़कर विदेश नीति पर अच्छे परिणाम आने का मतलब ये तो नहीं हो जाता कि पूरी सरकार अच्छा ही काम कर रही है।

दिल्ली के नगर निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार, जनता की बजाय बिजली कंपनियों के हित में लिए गये केंद्र सरकार के निर्णयों ने इस हार की नींव को और पक्का ही किया ।

दिल्ली में सुरक्षा की जिम्मेदारी तो केंद्र की ही थी, तो फिर आए दिन लड़कियों के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा।

डीजल, पेट्रोल के दाम उत्तरोत्तर कम होते गये मगर खाद्य वस्तुओं के दाम जस के तस हैं। प्रधानमंत्री का स्वच्छता मिशन उनके मंत्रियों और भाजपा के पार्टीजनों द्वारा ही सिर्फ ट्विटर तक समेट दि‍या गया।
नदियों के लिए कई कई मंत्रालय काम कर रहे हैं पर केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में ही यमुना का हाल किससे छुपा है। अकेला चना आख‍िर कब तलक भाड़ फोड़ेगा, कभी तो पार्टी को अपने बलबूते भी कुछ दिखाना होगा।
इसके अलावा भाजपा जिन युवाओं को अपना वोटबैंक बताती है ,उन्हीं के सामने लव जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जब आते हैं तो,  शाह जी ….! बच्चे अपना सच स्वयं खोजने लगते हैं कि आखिर कैसा विकास … किसका विकास … किस तरह होगा विकास … ।

आए दिन मंचों पर से जो आपकी पार्टी के होनहार नेता संप्रदायवादिता के ज़हरीले वाण चलाते हैं, क्या उसे आज की ये हाइटेक पीढ़ी देखती नहीं होगी। हिंदू वादिता के लिए पूरे देश में कटुवचन बोलने वालों का दुस्साहसी होना,  क्या ये युवा देख नहीं रहे ।

निश्चित ही दिल्ली विधानसभा में पहले कांग्रेस और अब की बार भारतीय जनता पार्टी का सफाया हो जाना, इन्हीं युवाओं और समस्याओं के मकड़जाल में घि‍रे मध्यम वर्ग के प्रति इग्नोरेंस ही तो है। वही मध्यम वर्ग जिसे सांझ होते ही डर सताने लगता है कि उसकी बेटी सुरक्षति घर पहुंच तो जाएगी या उसकी सारी कमाई घर के राशन, बिजली और पानी के बाद उसे ठेंगा दिखा देगी। अरविंद केजरीवाल ने जनता की यही दुखती नस तो पकड़ी थी।
बहरहाल,  बतौर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह हार जरूरी भी थी जो नरेंद्र मोदी का ही चेहरा आगे करके सारी समस्याओं पर पर्दा डालने की रणनीति पर काम कर रहे थे। अभी तो बिहार,  फिर उत्तर प्रदेश जैसे मील के पत्थर बाकी हैं  जहां पार्टी आंखें मूंदकर अब भी मोदी के भरोसे राज्य जीतने के ख्वाब देख रही है। संगठन से लेकर जनसमस्याओं तक को इस तरह देखा जा रहा है कि मानो इनसे कोई वास्ता ही ना हो।

जो भी हो दिल्ली ने ”आप”  को बहुमत देकर और आप को (अमित शाह) को आइना दिखाकर  यह  बता दिया है क‍ि शाह जी ये लोक का तंत्र है और अब तो खालिस उन युवाओं का तंत्र है जो राजनीति से परहेज नहीं करते बल्क‍ि उसे सुधारने के लिए जज़्बे के साथ जुट जाने का माद्दा रखते हैं …. सो खबरदार रहें सभी परंपरावादी राजनेता और उनकी पार्टियां …. दिल्ली के परिणाम आइना हैं उनके लिए ….
और अंत में ….

राजनीति की इसी तस्वीर के लिए बाबा नागार्जुन की ‘हजार हजार बाहों वाली’ इसी कविता संग्रह से कुछ पंक्तियां और …
‘सुख-सुविधा और ऐश-आराम के साधन।
डाल देते हैं दरार प्रखर नास्तिकता की भीत में।।
बड़ा ही मादक होता है, ‘यथास्थिति’ का शहद।
बड़ी ही मीठी होती है ‘गतानुगतिकता’ की संजीवनी’….।।

– अलकनंदा सिंह

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