लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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आम आदमी पाटी्रआम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित जीत ने राजनीति में प्रयोग और शुचिता की बहस को बढ़ा दिया है| ‘आप’ की जीत से सवाल तो उठता ही है कि वे क्या कारण रहे जिनसे कांग्रेस-भाजपा जैसे स्थापित राजनीतिक दलों से आम आदमी का मोह भंग हुआ? मोदी-राहुल जैसे स्थापित और आकर्षक राजनीतिज्ञों की राजनीति और अनुमान भी ‘आप’ की जीत को नहीं रोक सके? क्या ‘आप’ को प्रचंड वोट देकर दिल्ली के दिलवालों ने यह जताने की कोशिश की है कि यदि उन्हें राजनीति में सशक्त विकल्प मिला तो वे स्थापित राजनीतिक दलों से परहेज करते हुए उसे अपना सकते हैं? इसका जवाब मिलना हाल फिलहाल तो कठिन ही है| हां इतना अवश्य कहा जा सकता है कि देश में व्याप्त राजनीतिक अस्थिरता का फायदा ‘आप’ को मिला है| यह कांग्रेस या भाजपा से मोहभंग का मामला तो बिलकुल भी नहीं है| ‘आप’ को लेकर यह चर्चा बलवती है कि जितनी तेजी से इसका उदय हुआ है; उतनी ही तेजी से इसका सितारा भी डूबेगा| ऐसी चर्चाओं का वाजिब कारण भी है| चूंकि राजनीति अनिश्चितताओं से भरी है और ‘आप’ जैसे प्रयोग देश में पूर्व में हुए हैं किन्तु उनकी उम्र लम्बी नहीं रही है गोयाकि प्रयोगों से आम आदमी भी जल्द ही उकता गया है| १९७७ में आपातकाल के बाद इंदिरा कांग्रेस को नेस्तनाबूत कर जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत से सरकार तो बना ली किन्तु सत्ता के शीर्ष का सुख उसके नेताओं को अधिक पचा नहीं और जनता ने पुनः इंदिरा कांग्रेस का वरन किया; यह जानते हुए भी कि उन्हें एक बार फिर वही सब जिल्लत झेलनी पड़ सकती है जिसने बचने के लिए उन्होंने जनता पार्टी को जिताया था| फिर एक मौका और आया १९८९ में किन्तु उसका गुबार भी डेढ़ साल में निकल गया| दरअसल इस प्रसंग का यहां ज़िक्र करना इसलिए भी अवश्यम्भावी हो जाता है क्योंकि ‘आप’ के संस्थापक अरविन्द केजरीवाल वही गलतियां दोहरा रहे हैं जिन्हें आम जनता अक्सर नकार चुकी है| दलित राजनीति के बड़े चेहरे रामविलास पासवान ने भी जनादेश की इज्जत न कर खुद की सम्भावनाओं के द्वार बंद किए थे और अब एक बार फिर केजरीवाल इतिहास दोहरा कर उसका हिस्सा बनने की ऒर अग्रसर हैं| दिल्ली ने जनता ने ‘आप’ के लोकलुभावन वादों और दावों को एक मौका दिया और केजरीवाल हैं कि जनता के विश्वास को धूमिल करने में लगे हैं| विधानसभा की २८ सीटें जीतने और कांग्रेस द्वारा समर्थन देने की पहल को जिस तरह वे अस्वीकार कर रहे हैं वे जनता के साथ धोखा ही है| केजरीवाल के तर्क-वितर्क ऐसे हैं मानों कोई बच्चा अपनी मां से रूठा हो और मां उसे मनाने की कोशिश कर रही हो। जनाब यह राजनीति है| अर्थात राज करने की नीति| इसमें साम, दाम, दंड, भेद सभी की खुली छूट है और यदि आपको लगता है कि आप भावनात्मक और लच्छेदार भाषा से जनता को खुद की ऒर कर लेंगे तो माफ़ कीजिएगा, यह आपकी भूल होगी| जैसे भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता, उसी तरह राजनीति के मैदान में  जनता का भी कोई ईमान नहीं होता| जिस ईमानदारी की केजरीवाल कसमें खाते हैं उनकी प्रामाणिकता पर कई दफे सवालिया निशान लग चुके हैं| सरकारी नौकरी से राजनीति में आए जयप्रकाश नारायण और उनकी पार्टी लोकसत्ता की ईमानदारी पर किसे शक होगा किन्तु मीडिया से लेकर तमाम माध्यमों में उसकी चर्चा ही नहीं होती| चूंकि ‘आप’ ने राजनीति के मैदान को सर्कस में तब्दील कर दिया है लिहाजा उसकी चर्चा भी है और प्रसिद्धि भी| पर जैसे सर्कस के करतबों की उम्र होती है उसी तरह ‘आप’ भी अपनी जवानी देख पाए, इसमें संशय है। 

‘आप’ को दिल्ली में सरकार बनाने के जितने मौके मिल रहे हैं वह विरले ही होता है किन्तु केजरीवाल की ज़िद और सनक दिल्ली को एक और चुनाव की ऒर धकेल रही है| ‘जनता की पार्टी, जनता के लिए’ का तमगा लिए ‘आप’ जिस तरह जनता की राय का सर्वेक्षण करवा रही है, क्या वह मज़ाक नहीं है? आखिर जनता की राय में सही और गलत का निर्णय कौन करेगा? ‘आप’ को जितने भी मत सरकार गठन की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए मिलेंगे क्या सभी सही होंगे? मत सर्वेक्षण का पैमाना किस तरह निर्धारित होगा? दरअसल चुनाव पूर्व केजरीवाल ने जिस ‘आप’ के मार्फ़त दिल्ली के प्रत्येक वासी को रोज़ाना ७०० लीटर पानी और आधे बिजली के बिल देने का जो वादा किया था, उसे यथार्थ के धरातल पर उतारना असम्भव नहीं तो कठिन तो है ही| फिर राजनीतिक अनुभवहीनता भी घाघ राजनीतिज्ञों के बीच जाने से ‘आप’ का रास्ता रोक रही है| आखिर राजनीति भी काजल की कोठरी की तरह है| इसमें जितना भी सयाना जाए; उसके कालिख पर दाग तो लग ही जाते हैं| यदि ‘आप’ और केजरीवाल का यही डर है तो राजनीति में बदलाव की जिस शुरुआत का वे नारा देते हैं, उसे तत्काल बंद कर देना चाहिए| हालांकि यह कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि दिल्ली में ‘आप’ की जीत ने तमाम स्थापित राजनीतिक दलों को आईना तो दिखा ही दिया है जो जनता को हांकने की नीयत से देखते थे| साथ ही उन्हें नए सिरे से सोचने पर भी मजबूर किया है| पर ‘आप’ के ताजा पैंतरों से सबसे ज़यादा ख़ुशी भी उन्हें ही हो रही होगी| और हो भी क्यों न; जनता कई बार राजनीतिज्ञों द्वारा छली गई है तो एक बार और सही| यदि ‘आप’ दिल्ली में सरकार बना लेती है तो उसे राजनीति के दलदल में उतरकर जनता की अपेक्षाओं का बोझ उठाना होगा| ‘आप’ इसमें सफल होती है तो भारतीय राजनीति का चेहरा बदल सकता है वरना तो २०१३ भी १९७७ और १९८९ की परछाईं बन कर रह जाएगा| और तब ‘आप’ और केजरीवाल के भविष्य का निर्धारण आप और हम कर ही सकते हैं|

 

सिद्धार्थ शंकर गौतम 

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