लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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मैं अकेला दर्द इतना साथ लेकर क्या करूँ

आधा तुम ले लो जहां हो आधा तो कट जाएगा ।

जब पड़ी लानत की नजरें चुप हुए कुछ सोच कर

कुछ रहम का रूप है यह दिल बहल ही जाएगा ।

हम नहीं आँसू बहते और न पहरे रखे

आँख को तकलीफ होगी तो छलक ही जाएगा ।

छोड़ कर रस्मों रिवाजें कफ़स का दर खोल कर

जो जहां मगरूर बैठा पास मेरे आएगा ।

अब गुजारिश क्या करूँ कश्ती पर आ कर हूँ खड़ी

जिसको आना साथ मेरे आप ही आ जाएगा ।

कामिनी कामायनी

 

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