लेखक परिचय

शिशिर बडकुल

शिशिर बडकुल

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sanghशिशिर बड्कुल

‘सेवा का व्रत धारा-अर्पित जीवन सारा’ का भाव स्वयं में जीवंत अलंकरण किए हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य सिर्फ लगाना नही अपितु अपने वैदिक और शाश्वत संस्कारों को बदलते परिदृश्य में भी जीवित रखते हुए समाज का उन्नयन करना भी है |इस एकाकी भाव को दृष्टिगत रखते हुए नियमित प्रातः एकत्रित होना महज शाखा नही संस्कारों की पाठशाला है । भविष्य के भारत को देश के युवाओं को व्यक्ति निर्माण करते हुए राष्ट्र निर्माण के लिए सार्थक दिशा मिले ये उद्देश्य है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का । संघ के विविध आयामों को आज पूरा समाज अंगीकृत कर रहा है क्योंकि समाज के प्रत्येक वर्ग के अंतिम छोर से कार्य का सूत्रपात करने की चाह ह्रदय में लिए हजारों युवा समाज उत्थान में संकल्पित भाव से समाज को समोत्कर्षी दिशा में आगे बढा रहे हैं । आज विकास की ओर सतत् अग्रसर देश में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन में निहित संघ प्रेरणा ही है ।

सम्पूर्ण विश्व में आज सर्वाधिक युवा भारत में हैं और जाग्रत युवा होना देश की सबसे बडी ताकत है । संघ नेतृत्व ये भंलीभांति जानता है कि समयानुकूल परिवर्तन की क्षमता सिर्फ युवाओं में है । पर विषम परिस्थिति ये है कि आधुनिकता की दौड में ऐंसी क्या जरूरत आन पडी कि देश का युवा वर्ग वर्षों पुरानी वैदिक संस्कृति को भूल पाश्चात्य संस्कृति के दिखावे का चोला ओढ़ रहा है । जबकि वास्तविकता ये कि विश्व में जब देशों की बात होती है तो भारत को दर्शन का देश कहा जाता है तभी तो शाॅन हाॅपर जैंसा दार्शनिक जब उपनिषद् पढ ज्ञान अर्जित करता है तो उसे सर पर रखकर अपने देश तक नाचते हुए जाता है , यही तो कारण है हि हमारे अद्भुत पारिवारिक जीवन मूल्यों को दुनिया स्वीकार रही है । पर प्रश्नचिन्ह यहीं आ जाता है कि भारतीय युवा इससे परहेज करते हुए पश्चिमी चमक धमकी से आकर्षित हो रहें हैं । पं दीनदयाल उपाध्याय ने जी इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि – ‘पश्चिमी संस्कृति और पश्चिमी विज्ञान दो अलग अलग विषय हैं , जहां पश्चिमी विज्ञान सार्वभौमिक है और यदि हमे बढना है तोइसे अपनाना चाहिए वहीं पश्चिमी सभ्यता के बारे में से कदापि सत्य नही है ‘ । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी वैचारिक निरंतरता के साथ समाज की जागरूकता के लिए बहुआयामी रूप से कार्यशील है ।

हाल ही में आयोजित सिंहस्थ में हुआ विचार महाकुंभ भी इसी सोच की अवधारणा था कि विश्व पटल पर हम क्या प्रस्तुत करना चाहते हैं । इस विचार कुंभ में 51 मार्गदर्शी बिंदु बनाकर यह तय किया गया कि देश व दुनिया की समस्याओं से निपटने के लिए अपने अतीत व अध्यात्म का चिंतन करते हुए जीवन मूल्यों को स्वीकार करने की जरूरत है । यह भी विचारणीय है कि कुंभ होने के पीछे प्रायोजन क्या होता था , वसुधैव कुटुम्बकम का भाव सदैव हमारी सनातन संस्कृति के दिव्य संस्कारों में निहित रहा है । कुंभ के दौरान संत व समाज के बुद्धजीवी वर्ग चिंतन करते थे साथ ही कई विचारों – चिंतनों से निकले निष्कर्ष से नई विधाओं का अन्वेषण करते हुए कुंभ के माध्यम से आगामी 12 वर्षों के लिए समाज की दिशा एवं कार्य योजना तय करते थे । प्रत्येक 3 वर्ष में इसकी समीक्षा होती थी , एक अद्वितीय सामाजिक संरचना थी हमारा कुंभ से फिर से अध्यात्म से आधुनिकीकरण की व्यव्स्था के जीवंत रहने में प्रयास हुआ । साथ ही यह सार्वभौमिक संदेश दिया गया कि भारतीय मूल्यों और ज्ञान के आघार पर ही दुनिया सुरक्षित रह सकती है ॥

यही हमारा परिचय है कि संस्कृति ही हमारे राष्ट्र की आत्मा है , राष्ट्र भक्ति की भावना निर्माण करना और उसको साकार रूप देने का श्रेय राष्ट्र की संस्कृति को है और मुझे कहते हुए गर्व महसूस होता है कि भारत की इस अभूतपूर्व संस्कृति का झण्डा अगर किसी ने उठाए रखने का संकल्प धारण किया है तो सिर्फ राष्ट्र स्वयंसेवक संघ ने जिसके समर्पित स्वयंसेवक बहुआयामी शाखाओं में समाज – देश हित के कार्यों में संलग्न हैं । भारत का युवा आद विश्व में अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन कर रहा है वहीं दुर्भाग्य है कि वो अपने अतीत के गौरव से दूर हो रहा है और ये यह सत्यता है कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए अतीत से परिचय होना जरूरी है । विश्व में सिर्फ भारतीय संस्कृति ही है जो हमेशा से सम्पूर्ण जीवन-सम्पूर्ण सृष्टि का संकलित विचार करती आई है ,इसी एकात्मवादी सोच से संघ युवा भारत का परिचय कराना चाहता है । क्योंकि ये जानना जरूरी है कि बाह्य दृष्टि या भौतिक परिभाषा से भारत स्पष्ट नही होगा ,पूरी अध्यात्मिक यात्रा की जरूरत है भारत को स्पष्ट करने के लिए ॥

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