लेखक परिचय

लिमटी खरे

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हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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कांग्रेस में ‘प्रजातांत्रिक राजशाही‘ 

लिमटी खरे

कांग्रेस में भविष्यदृष्टा रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी को युवाओं की सदी घोषित किया था। उनका मानना था कि इक्कीसवीं सदी में युवाओं के मजबूत कांधों पर भारत गणराज्य उत्तरोत्तर प्रगति कर सकता है। आज सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र की बागडोर उनकी अर्धांग्नी श्रीमति सोनिया गांधी के हाथों में है। राजीव पुत्र राहुल भी चालीस को टच कर रहे हैं। इक्कीसवीं सदी का पहला दशक बीत चुका है, पर फिर भी युवा आज भी पार्श्व में ही रहने पर मजबूर हैं। कमोबेश यही आलम भाजपा सहित अन्य राजनैतिक दलों का है। भारत गणराज्य में प्रजातंत्र की सरेआम शवयात्रा निकाली जा रही है। आम जनता प्रजातंत्र के शव पर सर रखकर गगनभेदी करूण रूदन कर रहा है, किन्तु नीति निर्धारकों और विपक्ष में बैठे नेताओं को इसकी आवाज नहीं सुनाई दे रही है। कांग्रेस में युवाओं को आगे लाने के हिमायती सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने तो मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दो साल पहले ही अपने पुत्र जयवर्धन को राघोगढ़ से कांग्रेस का प्रत्याशी तय कर दिया है। अपने आप में यह ‘‘प्रजातांत्रिक राजशाही‘‘ का नायाब उदहारण माना जाएगा।

भारत देश दिनों दिन जवान होता जा रहा है, किन्तु आज भी सियासत की बागड़ोर उमरदराज नेताओं के हाथों में ही खेल रही है। यंगिस्तान की राह इन पुराने नेताओं के हाथों से होकर ही गुजर रही है, किन्तु साठ पार कर चुके नेता आज भी युवाओं को देश की बागडोर सौंपने आतुर नहीं दिख रहे हैं। मनमोहन सिंह के हालिया फेरबदल के बाद जो परिदृश्य उभरकर सामाने आया है उसके अनुसार कैबनेट मंत्रियों की उमर पैंसठ तो मंत्रीमण्डल की औसत आयु साठ साल है। वजीरे आजम सहित 14 मंत्रियों ने सत्तर से ज्यादा सावन देख लिए हैं। अधिकतर मंत्रियों का जन्म गुलाम भारत में हुआ था। सचिन पायलट, अगाथा संगमा और मिलिंद देवड़ा की आयु 35 से कम तो कुमारी सैलजा चालीस के पेटे में हैं।

पिछले कुछ महीनों में यंगिस्तान को तवज्जो मिलने की उम्मीदें बंधी थीं। युवाओं को यह भाव इसलिए नहीं मिला है, कि देश का उमरदराज नेतृत्व उन पर दांव लगाना चाह रहा है, इसके पीछे सीधा कारण दिखाई पड़ रहा है कि देश में 18 से 30 साल तक के करोड़ों मतदाताओं को लुभाने की गरज से साठ की उमर पार कर चुके नेताओं ने यह प्रयोग किया है कि युवाओं को आगे कर युवा मतदाताओं को अपने से जोड़ा जाए। जब लाल बत्ती की बात आती है तो कमान युवाओं के हाथों से खिसलकर फिर साठ की उमर के कांधों पर चली जाती है।

कहने को तो सभी सियासी पार्टियों द्वारा युवाओं को आगे लाने और उनके हाथ में कमान देने की बातें जोरदार तरीके से की जाती हैं, किन्तु विडम्बना ही कही जाएगी कि सियासी दल युवाओं को आगे लाने में कतराती ही हैं। कांग्रेस में नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी राहुल गांधी को आगे लाया जा रहा है, वह भी इसलिए कि उनके नाम को भुनाकर राजनेता सत्ता की मलाई काट सकें। वरना अन्य राजनैतिक दल तो इस मामले में लगभग मौन ही साधे हुए हैं।

जितने भी युवा चेहरे आज राजनैतिक परिदृश्य में दिखाई पड़ रहे हैं उनमें से अधिक को ‘अनुकंपा नियुक्ति‘ मिली हुई है। अपने पिता की सींची राजनैतिक जमीन को ‘सिंपेथी‘ वोट के जरिए ये युवा काट रहे हैं, वरना कम ही एसे युवा होंगे जिन पर पार्टी ने दांव लगाया हो और वे जीतकर संसद या विधानसभा पहुंचे हों। राजनीति में स्थापित ‘घरानांे‘ के वारिसान को ही पार्टी चुनाव में उतारती है और फिर आगे जाकर अपने पिताओं की उंगली पकड़कर ये देश की दशा और दिशा निर्धारित करते हैं। कांग्रेस में युवाओं को आगे लाने के हिमायती सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने तो मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दो साल पहले ही अपने पुत्र जयवर्धन को राघोगढ़ से कांग्रेस का प्रत्याशी तय कर दिया है। यह प्रजातांत्रिक राजशाही का नायाब उदहारण माना जाएगा।

कांग्रेस में सोनिया गांधी (65), मनमोहन सिंह (79), प्रणव मुखर्जी (77), ए.के.अंटोनी (71) के साथ पार्टी में नेताओं की औसत उमर 74 साल है। भाजपा भी इससे पीछे नहीं है अटल बिहारी बाजपेयी (87), एल.के.आड़वाणी (84), राजनाथ सिंह (60), एम.एम.जोशी (77) तो सुषमा स्वराज (59) के साथ यहां औसत उमर 73 दर्ज की गई है। वामदलों में सीपीआईएम में प्रकाश करात (64), सीताराम येचुरी (59), बुद्धदेव भट्टाचार्य (67), अच्युतानंदन (88) के साथ यहां राजनेताओं की औसत उमर 72 तो समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव (71), अमर सिंह (55), जनेश्वर मिश्र (77), रामगोपाल यादव (65) के साथ यह सबसे यंग पार्टी अर्थात यहां औसत उमर 61 है।

सियासी पार्टियों में एक बात और गौरतलब होगी कि जितने भी युवाओं को पार्टियों ने तरजीह दी है, वे सभी जमीनी नहीं कहे जा सकते हैं। ये सभी पार्टियों में पैदा होने के स्थान पर अवतरित हुए हैं। इनमें से हर नेता किसी न किसी का ‘केयर ऑफ‘ ही है, अर्थात यंगस्तान के नेताओं को उनके पहले वाली पीढ़ी के कारण ही जाना जाता है। ग्रास रूट लेबिल से उठकर कोई भी शीर्ष पर नहीं पहुंचा है।

पिछली बार संपन्न हुए आम चुनावों के पहले रायशुमारी के दौरान एक राजनेता ने जब अपने संसदीय क्षेत्र में अपने कार्यकर्ताओं के सामने युवाओं की हिमायत की तो एक प्रौढ़ कार्यकर्ता ने अपनी पीड़ा का इजहार करते हुए कहा कि जब मैं 29 साल पूर्व आपसे जुड़ा था तब युवा था, आज मेरा बच्चा 25 साल का हो गया है, वह पूछता है कि आप तब भी आम कार्यकर्ता थे, आज भी हैं, इन 29 सालों में आपको क्या मिला, आज मैं जवान हो गया हूं, तो किस आधार पर नेताजी युवाओं को आगे लाने की बात करते हैं।

दुनिया के चौधरी अमेरिका में युवाओं और बुजुर्गों के बीच अंतर की एक स्पष्ट फांक दिखाई पड़ती है। अमेरिका जैसे विकसित देश में जहां युवा पर्यावरण, जीवनशैली, रहन सहन और पारिवारिक मूल्यों के बारे में पुरानी पीढ़ी से अपने मत भिन्न रखती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक जीवनशैली के मामले में युवाओं द्वारा तेज गति से बदलाव चाहा जाता है। वैसे हमारी व्यक्तिगत राय में हर राजनैतिक दलों में युवाओं और बुजुर्गों के बीच संतुलन और तालमेल होना चाहिए। यह सच है कि उमर के साथ ही अनुभव का भंडार बढ़ता है, पर यह भी सच है कि उमर बढ़ने के साथ ही साथ कार्य करने की क्षमता में भी कमी होती जाती है। जिस गति से युवाओं द्वारा कार्य को अंजाम दिया जाता है उसी तरह मार्गदर्शन के मामले में बुजुर्ग अच्छी भूमिका निभा सकते हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि जिस ब्यूरोक्रेसी (अफसरशाही) की बैसाखी पर चलकर राजनेता देश को चलता है, उसकी सेवानिवृत्ति की उम्र साठ या बासठ साल निर्धारित है, किन्तु जब बात राजनेताओं की आती है तो चलने, बोलने, हाथ पांव हिलाने में अक्षम नेता भी संसद या विधानसभा में पहुंचने की तमन्ना रखते हैं, यह कहां तक उचित माना जा सकता है। राजनैतिक क्षेत्र में युवा को अलग तरीके से परिभाषित किया जाता है। अघोषित तौर पर कहा जाता है कि राजनीति में युवा अर्थात 45 से 65 साल। इस हिसाब से राहुल गांधी को अगर ‘अमूल बेबी‘ कहा जाता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए। विडम्बना तो देखिए सरकार में काम करने वालों की सेवानिवृत्ति की उम्र निर्धारित है, किन्तु सरकार चलाने वालों की नहीं!

हमारे विचार से महज कुछ चेहरों के आधार पर नहीं, वरन् विचारों के आधार पर युवाओं को व्यापक स्तर पर राजनीति में आने प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कब्र में पैर लटकाने वालों को अब राहुल गांधी से प्रेरणा लेना चाहिए। जब 41 बसंत देखने वाले राहुल गांधी कैबनेट में शामिल होने से खुद को दूर रखे हुए हैं तो फिर साठ पार कर चुके नेता आखिर लाल बत्ती के लिए जोड़तोड़ क्यों करते हैं। उन्हें भी चाहिए कि वे युवाओं को आगे लाने के हिमायती बनें पर राजा दिग्विजय सिंह जैसे नहीं जो खुद तो राजनीतिक मलाई चखने की कामना रखते हैं और अपने ही पुत्र को चुनाव में उतारने की घोषणा भी कर देते हैं, जबकि अभी न प्रत्याशी चुनाव के लिए समीति बनी है और न ही चुनावों की तारीखों की ही घोषणा हुई है। बुजुर्ग राजनैताओं का नैतिक दायित्व यह बनता है कि वे सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर अब मार्गदर्शक की भूमिका में आएं और युवाओं को ईमानदारी से जनसेवा का पाठ पढ़ाएं तभी गांधी के सपनों का भारत आकार ले सकेगा।

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