लेखक परिचय

कनिष्क कश्यप

कनिष्क कश्यप

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तेरे ग़म के पनाह में अर्से बिते

आरजू के गुनाह में अर्से बिते

i may be alone but never lonely

i may be alone but never lonely

अब तो तन्हाई है पैरहम दिल की

सपनों को दारगाह में अर्से बिते


कुछ तो बिते हुए वक्त का तकाज़ा है

कुछ तो राहों ने शौकया नवाजा है

जब से सपनों में तेरा आना छुटा

नींद से मुलाक़ात के अर्से बिते


बिते हुए लम्हों से शिकवा नहीं

मिल जाए थोड़ा चैन ये रवायत नही

मेरे टुकडो में अपनी खुशी ढूँढो ज़रा

बिखरे इन्हे फुटपाथ पे अर्से बिते …….

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2 Comments on "तेरे ग़म के पनाह में अर्से बिते"

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apurv
Guest

क्या बात है.! बहुत hee शानदार गजल , इसकी जितनी तारीफ की जाय कम है.

परमजीत बाली
Guest

बहुत बढिया रचना है।अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए है।बधाई।

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