लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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– विजय कुमार

एक बार राजा युद्धिष्ठिर के पास एक किसान का मामला आया। उसके खेत में चोरी करते हुए चार लोग पकड़े गये थे। उनमें से एक अध्यापक था, दूसरा पुलिसकर्मी, तीसरा व्यापारी और चौथा मजदूर। किसान ने युद्धिष्ठिर से उन्हें समुचित दंड देने को कहा।

युद्धिष्ठिर ने मजदूर को एक महीने, व्यापारी को एक साल, सैनिक को पांच साल और अध्यापक को दस साल सश्रम कारावास का दंड दिया। जब लोगों ने एक ही अपराध के लिए चारों को अलग-अलग दंड का रहस्य पूछा, तो युद्धिष्ठिर बहुत न्यायपूर्ण उत्तार दिया।

उन्होंने कहा कि मजदूर स्वयं निर्धन है, हो सकता है उसके घर में खाने को अन्न न हो। ऐसे में यदि उसने चोरी कर ली, तो इसे बहुत गंभीर अपराध नहीं माना जा सकता। इसलिए उसे एक महीने का कारावास पर्याप्त है।

व्यापारी का अपराध कुछ अधिक है। उसे किसान की फसल को उचित मूल्य पर खरीदने और बेचने का अधिकार तो है; पर चोरी का नहीं। इसलिए उसे एक साल का दंड दिया गया है।

पुलिसकर्मी राज्य की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का आधार है। यदि वह खुद ही चोरी करेगा, तो फिर चोरों को पकड़ेगा कौन; यदि जनता का देश की सुरक्षा व्यवस्था से विश्वास उठ गया, तो इस अराजकता से निबटना राज्य के लिए भी संभव नहीं है। इसलिए उसे पांच साल की सजा दी गयी है।

जहां तक अध्यापक की बात है, उसका कृत्य केवल अपराध ही नहीं, पाप भी है। उसका काम देश की नयी पीढ़ी को सुसंस्कारित करना है। यदि उसका आचरण गलत होगा, तो फिर वह नयी पीढ़ी को क्या सिखाएगा ? इसलिए उसका अपराध सबसे बड़ा है और उसे दस साल की सजा दी गयी है।

इस कसौटी पर उन पांच न्यायधीशों और तीन वकीलों की सजा के बारे में विचार करें, जो प्रोन्नति और वेतन वृद्धि के लिए काकातिया वि0वि0 वारंगल में दी जा रही एल.एल.एम की परीक्षा में नकल करते हुए पकड़े गये हैं।

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4 Comments on "युद्धिष्ठिर का न्याय"

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अनुज कुमार
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श्रीमान विजय कुमार जी को मेरा प्रणाम
आपने एक बहुत ही अच्छे मुद्दे पर अपना लेख लिखा है इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं परन्तु आपने जो उदाहरण जिस व्यक्ति युधिष्ठिर का दिया है उसे धर्मराज नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह व्यक्ति जुए में अपनी पत्नी को हार जाता है तो फिर कैसा धर्मराज. वैसे तिवारी जी ठीक कह रहे हैं पूरे कुए में भांग पड़ी है. मगर अब भांग का नशा जिनको लगा है उन्हें हम वर्तमान युधिष्ठिर जरूर कह सकते हैं

Anil Sehgal
Guest

युद्धिष्ठिर का न्याय – by – विजय कुमार

इन सभी न्यायधीशों और वकीलों को, जो प्रोन्नति और वेतन वृद्धि के लिए, दी जा रही एल.एल.एम की परीक्षा में नकल करते हुए पकड़े गये हैं, उनकी
(१) यह सजा, कम से कम, सुनिश्चित हो कि वह आयु पर्यंत, कभी भी किसी प्रकार से कैसी भी, न्याय परिक्रिया के आस पास भी न फटक सकें.

(२) न्याय के सभी काम के लिए अछूत घोषित कर दिया जाये.

(३) सभी की एल.एल.बी. डिग्री भी वापिस ले ली जाये.

thanthanpal
Guest

इस कसौटी पर उन स्वयं वेतन बढाने वाले सांसदों का भी न्याय किया तो राजा युद्धिष्ठिर उन्हें तो देहदंड की सजा दे दिया होता . क्यों की स्वयम राजा ही अपराधी था.
thanthanpal.blogspot.com

श्रीराम तिवारी
Guest

krupya kakateeya ko durust karen yatha -kaakateey .
sahi prshn uthya hai aapne .badhai .is smbandh men
hm kahna chahenge ki kuye men hi bhang padi hai .akele judicial sector ka hi rona thode hi hai .

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