तीसरा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस और योगदर्शन द्वारा ईश्वर साक्षात्कार

मनमोहन कुमार आर्य

आज 21 जून, 2017 को विश्व के अधिकांश भागों में तीसरा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। तीन वर्ष पूर्व भारत के यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सयुक्त राष्ट्र महासभा में योग को अन्तर्राष्ट्रीय दिवस घोषित करने का प्रस्ताव रखा था जिसे विश्व के 177 देशों का समर्थन प्राप्त हुआ था और प्रस्ताव की पुष्टि पर मोहर लग गई थी। योग की इस लोकप्रियता का कारण इससे स्वास्थ्य, मन, बुद्धि एवं आत्मा को होने वाले अनेकानेक लाभ हैं। भौतिकवाद ने मनुष्य को एक मशीन बना दिया है और उसके शरीर वा स्वास्थ्य तथा भीतरी अवयव मन, बुद्धि व आत्मा की उपेक्षा की है। योग मनुष्य के रोगों की रोकथाम एवं रोगी शरीर व आत्मा को निरोग व स्वस्थ बनाने की एक प्रक्रिया वा विधा है जो ईश्वर के वेद ज्ञान देने के साथ उसके बाद ऋषियों द्वारा उसे अपनाने और योग ऋषि पतंजलि द्वारा इस पर एक प्रमाणिक ग्रन्थ योग दर्शन लिखने के साथ आरम्भ हुई। महाभारत युद्ध के बाद देश व विश्व में आर्ष साहित्य विलुप्त होकर उसके स्थान पर अल्पज्ञ मनुष्यों के अविद्या एवं भ्रान्तियुक्त ग्रन्थों का प्रचार होने से योग कुछ धार्मिक विद्वानों व योगियों तक ही सीमित हो गया था। अनेक योगियों तक भी इसका यथार्थ स्वरूप नहीं पहुंच पाता था। सन् 1863 में स्वामी दयानन्द जी का धार्मिक व सामाजिक जगत में पदार्पण होता है और वह सन्ध्योपासना की पुस्तक लिख कर सहस्रों की संख्या में उसे प्रकाशित कराकर बांटते हैं। सन्ध्या क्या है, इसमें पूरा अष्टांग योग समाया हुआ है। सन्ध्या में ईश्वर का ध्यान करते हैं जिसके लिए ऋषि दयानन्द ने एक पूरी प्रक्रिया लिखी है। यह ध्यान तभी सिद्ध होता है जब कि ध्यान से पूर्व के योग के अन्य अंगों यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार व धारणा आदि को भी जाना जाये व उसका क्रियात्मक सफल अभ्यास किया जाये। ऋषि दयानन्द ने अपने सम्पूर्ण साहित्य में यम व नियमों के पालन का उल्लेख किया है व इसको ईश्वर के ध्यान व उपासना का अनिवार्य अंग बताया है। आज कल बहुत से लोग केवल आसनों को ही योग मान लेते हैं। ऐसा मानना व आसनों का ही प्रचार करना अधूरा योग कहा जा सकता है। योग का उद्देश्य व लक्ष्य तो आत्मा को स्वच्छ व निर्मल बनाकर कर तथा उसे ईश्वर व आत्मा के सत्य स्वरूप का ज्ञान कराकर ईश्वर का साक्षात्कार कराना ही है। यदि मनुष्य ईश्वर के साक्षात्कार से वंचित है तो वह योग की अधूरा लाभ ही प्राप्त करते हैं। आश्चर्य है कि आज कोई भी योगी योग के चरम लक्ष्य ‘योग से ईश्वर साक्षात्कार’ की चर्चा प्रायः नहीं करते। इसके पीछे एक कारण धर्म निरपेक्षता, लोगों का अंग्रेजी व अंग्रेजों की जीवन शैली के प्रति प्रेम है तथा दूसरा योग साधकों का योग से भाग जाना व दूर होना हो सकता प्रतीत होता है। जो भी हो विश्व में आसन, प्राणायाम व ध्यान तक जो यात्रा चल रही है वह स्तुत्य एवं प्रशंसनीय है और भावी समय में इससे विश्व में वर्तमान से बड़ी आध्यात्मिक क्रान्ति हो सकती है, ऐसा अनुमान होता है।

 

        ऋषि दयानन्द सच्चे व सिद्ध योगी थे। वह घंटों तक ध्यान व समाधि लगा सकते थे व अनुमानतः 18 घंटों की समाधि लगाने का भी उन्हें अभ्यास था। ईश्वर व जीवात्मा के सत्य स्वरूप व वेद मंत्रों की व्याख्या करते हुए उन्होंने अपनी लेखनी से जो वर्णन किया है तथा उनके जीवन की घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि वह ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए योगी थे। ऐसे योगियों का आज समाज में अभाव है। ऋषि दयानन्द की एक विशेषता यह भी थी कि वह ईश्वर व उसके वेद ज्ञान की बात ही स्वीकार करते थे। किसी भी प्रकार की अनावश्यक भौतिक आवश्यकताओं अर्थात् वित्तैषणा व लोकैषणा से वह ऊपर उठे हुए थे जिसका आज के सभी योगियों में, किसी में पूर्णतः व किसी में अंशतः, अभाव है। इसके साथ ही योग प्रचार की बात करें तो अन्य अनेकानेक योगियों सहित पंतजलि योगपीठ के स्वामी रामदेव जी का योग को भारत व विश्व में प्रचारित करने का सबसे अधिक योगदान है। उन्होंने विगत अनेक वर्षों में प्रायः प्रतिदिन देश व विदेश में जा जाकर प्रातः 5.00 बजे से ही लगभग दो घंटे योग सिखाया और उसका टीवी आदि से विश्व में प्रचार किया। शरीर के असाध्य कोटि के अनेकानेक रोगों को भी ठीक किया व रोगियों को निरोगी व स्वस्थ बनाकर उन्हें सुखी व वैलनेस wellness किया। अतः योग से जुड़े अब तक के सभी लोगों के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और स्वामी रामदेव जी का योग को विश्व में प्रचारित करने में मुख्य योगदान है। इसके लिए वह बधाई और प्रशंसा के पात्र हैं।

 

संसार में बहुत से परम्परावादी लोग आज भी पुरानी मान्यताओं में जकड़े हुए हैं। संसार में जब भी किसी नई चीज की खोज होती है तो पहले वह न नकुर करते हैं और बाद में उसे अपरिहार्य होने से अपना लेते हैं। संसार का नियम है कि सत्य चाहे नया हो या पुराना, उसे विवेक पर कस कर सभी को अपनाना चाहिये। मनुष्य के पुराने वस्त्र जीर्ण हो जाते हैं तो पुराने वस्त्रों का त्याग कर सभी नये वस्त्रों को अपनाते हैं। पुराना जर्जरित मकान छोड़कर नया मजबूत व आकर्षक सुविधाजनक निवास स्थान बनाते व खरीदतें हैं। ज्ञान विज्ञान में जो नई नई खोजें हुई हैं व हो रही हैं, उसे अपनाने के लिए भी वह मजबूर होते हैं और अपना लेते हैं परन्तु धर्म सम्बन्धी बातों में वह निर्णय लेने में संकोच व अपनी हानि देखते हैं और ऐसा करते हुए वह योग जैसी मानव मात्र की हितकारी जीवन शैली को भी स्वीकार नहीं कर पातें। स्वामी दयानन्द ने अपने जीवन में पुरानी असत्य व अविद्याजन्य परम्पराओं के प्रति विद्रोह किया था तथा सत्य परम्पराओें के आदि स्रोत ‘ईश्वरीय ज्ञान वेद’ को जानकर उन्होंने उसे स्वयं अपनाया और विश्व के लोगों को भी उनके निजी हित व कल्याण के लिए उसे अपनाने के लिए प्रेरणा वा आह्वान किया। उन्होंने आर्यसमाज का संगठन इसी कार्य के लिए बनाया था। आज विश्व में करोड़ों लोग योग सहित वेदों की एक एक बात को स्वीकार करते हैं व उसे अपनाते हैं। उपासना वा योग की सत्य विधि वेद में ही है जिसका महर्षि पतंजलि एवं अन्य योगाचार्यों ने देश व काल के अनुसार विस्तार किया है। योग की यह गाड़ी सही दिशा में जा रही है। हम आशा करते हैं कि भावी समय में जो कुछ लोग, मत-मतान्तरों के आचार्य व उनके अनुयायी किसी भी कारण से योग से दूरी बनाये हुए हैं, वह योग के निकट आकर योग से होने वाले लाभों को प्राप्त करेंगे। आगे चलकर योग केवल आसन व प्राणायाम अथवा अल्पकालिक ध्यान जिससे तनाव व विषाद दूर होता है, तक ही सीमित नहीं रहेगा अपितु यह ‘ईश्वर साक्षात्कार’ के लिए किया जाया करेगा, ऐसी हम आशा करते हैं।

 

योग द्वारा ईश्वर साक्षात्कार के लिए ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना का प्रमुख योगदान है। इसके बिना ईश्वर साक्षात्कार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में उपासना विषय को सरल व सुबोध बना दिया है। इसके लिए जहां सन्ध्या के मन्त्र व पूरी विधि उपयोगी है वहीं अग्निहोत्रों में पाठ किये जाने वाले ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना के आठ मन्त्रों सहित सम्पूर्ण आर्याभिविनय पुस्तक का भी अध्ययन आवश्यक है। योगाभ्यास करते हुए यदि इसे भी दिनचर्या में सम्मिलित कर लिया जाये तो इससे वर्तमान में किए जाने वाले सीमित येगाभ्यास से अधिक लाभ हो सकता है।

 

हम आज योग दिवस पर देशवासियों को शुभकामनायें एवं बधाई देते हैं और आशा करते हैं कि वह महर्षि पतंजलि के योगदर्शन का भाष्य पढ़े और उसे पूरा जान व समझ कर उससे लाभ उठायें व योग का प्रचार कर अन्यों को भी इसका लाभ पहुंचायें। योग दिवस पर हमने अपने कुछ विचार प्रस्तुत किये हैं। शायद किसी को अच्छे व उपयोगी प्रतीत हों। ओ३म् शम्।

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