“जन्म व मृत्यु शरीर के आदि व अन्तिम छोर हैं और अन्त्येष्टि संस्कार अन्तिम क्रिया है”

मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य के जन्म से जीवन का आरम्भ होता है और मृत्यु होने पर जीवन समाप्त हो जाता है। जन्म का अर्थ है कि एक चेतन, अल्पज्ञ, ससीम, सूक्ष्म और अनादि नित्य जीवात्मा का माता के गर्भ में शरीर का निर्माण जन्म तथा मृत्यु का अर्थ है कि शरीरस्थ जीवात्मा का देह त्याग। जीवात्मा के देहत्याग को ही मृत्यु कहा जाता है। मृत्यु के बाद जीवात्मा का जो शरीर होता है उसे शव संज्ञा दी जाती है। इस शव को प्रेत भी कहते हैं। जीवात्मा के शरीर को छोड़ने के साथ ही इसमें विकार उत्पन्न होने आरम्भ हो जाते हैं और इससे दुर्गन्ध व दूषित वायु का निर्माण होता है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त हानिकर होता है। समय के साथ वायु-विकार में वृद्धि होती है, अतः इस शरीर का शीघ्र अन्तिम संस्कार करना आवश्यक होता है। अन्तिम संस्कार का अर्थ है कि इस शरीर को इसके कारण तत्वों में विलीन कर दिया जाये। शरीर में आत्मा के न रहने पर यह जड़ शरीर सुख व दुःख की अनुभूति से सर्वथा मुक्त होता है। अग्नि में जलाने से ही यह शरीर अपने कारण तत्वों पृथिवी, अग्नि, जल, वायु और आकाश में विलीन होता है। अतः इसका शीघ्र दाह संस्कार करना आवश्यक होता है। दाह करने पर कुछ वायु प्रदुषण होता है जिसको रोकने के उपाय करने के लिए ही जलती हुई चिता में घृत, हवन सामग्री व सुगन्धित पदार्थों की आहुतियों का विधान किया गया है। मृत्यु के अवसर पर सभी निकटस्थ परिवार व इष्ट मित्रों के हृदय दुःख से भरे होते हैं, अतः इसके लिए ईश्वर की प्रार्थना के मन्त्रों का पाठ करने सहित शरीर के अंग प्रत्यंगों को अग्नि प्रज्जवलित कर यज्ञीय क्रिया द्वारा उसे पंच तत्वों में विलीन कर करते हैं, इसलिये वेदों के दाह संस्कार से सम्बन्धित मन्त्रों से आहुतियां दी जाती है। यह पूरी क्रिया शरीर को भस्म करने की आवश्यकता को ध्यान में रखकर ज्ञान-विज्ञान की रीति से की जाती है। इसमें अज्ञान व अन्धविश्वासों से युक्त अनावश्यक क्रियायें करना अनुचित है। अज्ञानी व्यक्ति का कार्य है कि वह विद्वानों की संगति से अपना अज्ञान दूर करें और सभी क्रियाओं को ज्ञानपूर्वक व शरीर को भस्म करने की आवश्यकता के अनुरुप सम्पादित करे। आजकल हम देखते हैं कि लोग वैदिक रीति से अपरिचित है। हमारे पौराणिक बन्धु मृत्यु के बाद जो जो क्रियायें करते हैं उनका औचीत्य न करवाने वाले और न करने वाले पुरोहितों को ही ज्ञात होता है। अनेक अनावश्यक खर्चीले कार्य भी किये जाते हैं जिन्हें रोका जाना चाहिये। यह जानना चाहिये कि मृत्यु होने के बाद शव को सम्मानपूर्वक श्मशान में ले जाकर वैदिक विधि जो तर्क, युक्ति, बुद्धिसंगत होने सहित वेद शास्त्र की रीति से युक्त हो व निर्भ्रान्त हो, उसी को करना चाहिये। अनावश्यक पिण्ड दान, अनावश्यक शाल आदि शव पर रखना तथा घड़े में जलभर कर शव की परिक्रमा आदि करना जैसे कृत्यों से बचना चाहिये। यदि कोई करने को कहे तो उन पुरोहित जी से इसे करने का औचीत्य, कारण व उपयोगिता को पूछना चाहिये। यदि वह आज के समय के अनुरूप उसका समाधान कर सकें, तभी उन क्रियाओं को करना चाहिये अन्यथा नहीं।

 

महर्षि दयानन्द वेद सहित समस्त ऋषि प्रणीत वैदिक साहित्य के उच्च कोटि के मूर्धन्य विद्वान वा आप्त पुरुष थे। उन्होंने संस्कार विधि ग्रन्थ में अन्त्येष्टि संस्कार विषयक सभी आवश्यक पहलुओं व शास्त्रीय व्यवस्थाओं को ध्यान में रखकर अन्त्येष्टि संस्कार का विधान किया है जो बुद्धिसंगत एवं उपयुक्त है। वह लिखते हैं कि अन्त्येष्टि शरीर के अन्त के संस्कार को कहते हैं। इसके बाद मृतक शरीर के लिए अन्य कोई भी संस्कार नहीं है। शास्त्रीय भाषा में अन्त्येष्टि संस्कार को ही नरमेध, पुरुषमेध, नरयाग या पुरुषयाग भी कहते हैं। यजुर्वेद में विधान है कि मनुष्य शरीर का अन्तिम संस्कार इसे भस्म करने पर्यन्त है। शरीर का अन्त उसे श्मशान ले जाकर मृतक कर्म अर्थात् दाह संस्कार करना है। ऋषि दयानन्द ने गरुड़ आदि पुराणों में दशगात्र, एकादशाह, द्वादशाह, सपिण्डी कर्म, मासिक, वार्षिक, गया श्राद्ध आदि क्रियाओं का करना मिथ्या बताया है। वह कहते हैं कि वेदों में इन कर्मों का विधान न होने से यह मिथ्या वा अकरणीय हैं। एक अति महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह कही है कि मृत्यु होने के क्षण से उस जीव का अपने पूर्व मृतक जीवित संबंधियों से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् मृत्यु होने पर मृतक जीव जीवित संबंधियों के आपस के सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। मृत्यु होने के बाद मृतक आत्मा अपने कर्मों के अनुसार जन्म पाता है। ऋषि दयानन्द ने यह भी बताया है कि मरने के बाद जीव यमालय, वाय्वालय अर्थात् अन्तरिक्ष (जो यह पोल है अर्थात् आकाश) में जाता व रहता है। ऋषि दयानन्द ने गरुड़ पुराण के यमलोक को मिथ्या बताया है, इसका कारण है वेदों में इसका उल्लेख होने से यह मिथ्या काल्पनिक है। वह यह भी कहते हैं कि अज्ञान के कारण वेदोपदेश होने के कारण लोग यमलोक आदि के होने की बातें मानते हैं जो कि मिथ्या हैं। उन्होंने लिखा है कि यम परमेश्वर सहित अग्नि, वायु, विद्युत, सूर्य आदि के नाम हैं।

 

मृत्यु होने के बाद परिवार व इष्ट मित्रजन मृतक शरीर सम्बन्धी क्या क्रियायें करें इसका विधान करते हुए वह कहते हैं कि जब कोई मर जावे तब यदि पुरुष हो तो पुरुष और स्त्री हो तो स्त्रियां उसे स्नान करावें। चन्दानादि सुगन्ध लेपन और नवीन वस्त्र धारण करावें। जितना उसके शरीर का भार हो उतना घृत, यदि अधिक सामर्थ्य हो तो अधिक लेवें और जो महादरिद्र, भिक्षुक हो कि जिसके पास कुछ भी नहीं है, उसे कोई श्रीमान् वा पंच बन के आध मन से कम घी देवे, और श्रीमान् लोग शरीर के बराबर तोल के चन्दन, सेर भर घी में एक रत्ती कस्तूरी, एक मासा केसर, एकएक मण घी के साथ सेरसेर भर अगरतगर और घृत में चन्दन का चूरा भी यथाशक्ति डाल कपूर, पलाश आदि के पूर्ण काष्ठ, शरीर के भार से दूनी सामग्री श्मशान में पहुंचावें। तत्पश्चात मृतक् को वहां श्मशान में लेजाएं।

 

यदि श्मशान में प्राचीन वेदी बनी हुई न हो तो नवीन वेदी भूमि में खोदे। वह श्मशान का स्थान बस्ती से दक्षिण तथा आग्नेय, अथवा नैऋर्त्य कोण में हो, वहां भूमि को खोदे। मृतक के पग दक्षिण, नैऋर्त्य, अथवा आग्नेय कोण में रहें। शिर उत्तरी, ईशान वा वायव्य कोण में रहे। मृतक के पग की ओर वेदी के तले में नीचा और शिर की ओर थोड़ा ऊंचा रहे। उस वेदी का परिमाण पुरुष खड़ा होकर ऊपर को हाथ उठावे उतनी लम्बी और दोनों हाथों को लम्बे उत्तर दक्षिण पार्श्व में करने से जितना परिमाण हो, अर्थात् मृतक् के साढ़े तीन हाथ, अथवा तीन हाथ ऊपर से चौड़ी होवे और छाती के बराबर गहरी होवे और नीचे आध हाथ अर्थात् बीता भर रहे। उस वेदी में थोड़ा-थोड़ा जल छिटकावें, यदि गोमय (गोबर) उपस्थित हो तो लेपन भी कर दें। उसमें नीचे से आधी वेदी तक लकड़ियां चिने जैसे कि भित्ती में ईंटें चिनी जाती हैं अर्थात् बराबर जमाकर लकड़ियां धरे। लकड़ियों के बीच में थोड़ा-थोड़ा कपूर थोड़ी-थोड़ी दूर पर रक्खे। उसके ऊपर मध्य में मृतक को रक्खे अर्थात् चारों ओर वेदी बराबर खाली रहे और पश्चात् चारों ओर ऊपर चन्दन तथा पलाश आदि के काष्ठ बराबर चिने। वेदी से ऊपर एक बीता भर लकड़ियां चिने।

 

जब तक यह क्रिया होवे तब तक अलग चूल्हा बना, अग्नि जला, घी तपा और छानकर पात्रों में रक्खे। उसमें कस्तूरी आदि सब पदार्थ मिलावे। लम्बी-लम्बी लकड़ियों में चार चमसों को चाहे वे लकड़ी के हों वा चांदी, सोने के अथवा लोहे के हों, जिस चमसा में एक छटांक भर से अधिक और आधी छटांक भर से न्यून घृत न आवे, खूब दृढ़ बन्धनों से डण्डों के साथ बांधे। पश्चात घृत का दीपक जला करके कपूर में लगाकर शिर से आरम्भ कर पादपर्यन्त मध्यमध्य में अग्नि प्रवेश करावें। इसके साथ ही घृत सामग्री से आहुतियां देने का क्रम आरम्भ होता है। आरम्भ में पांच आहुतियां दी जाती हैं। इसके बाद जब अग्नि भली प्रकार से प्रज्जवलित हो जाये तब चार पुरुष चिता के चारों ओर खड़े होकर घृत सामग्री की आहुति मन्त्र की समाप्ति पर स्वाहा बोल कर छोड़े। स्वामी जी ने आहुति देने के लिए कुल 121 मन्त्र लिखे हैं। वह कहते हैं कि इन से आहुतियां दें और सामग्री समाप्त होने तक मन्त्रों की पुनरावृत्ति कर आहुतियां देते रहें। आहुतियां तब तक देवें जब तक शरीर भस्म न हो जावें वा सामग्री बची हो। इसके साथ ही दाह संस्कार यहां सम्पन्न हो जाता है। वैदिक रीति में शव की कपाल क्रिया किये जाने का विधान नहीं है। इसका एक कारण हमें यह लगता कि चिता का जो उच्च तापक्रम होता है उसमें जीवात्मा व प्राण वायु का शरीर में विद्यमान रहना सम्भव ही नहीं होता। अग्नि क्रिया ऐसी है कि शरीर भस्म हो जाता है इसलिये अनावश्यक वेद विरुद्ध कपाल क्रिया आदि नहीं करनी चाहिये।

 

अन्त्येष्टि की विधि समाप्त हो जाने एवं शरीर भस्म हो जाने पर श्मशान में उपस्थित पारिवारिक व इष्ट मित्र आदि अपने वस्त्र प्रक्षालन, स्नान करके जिसके घर में मृत्यु हुआ हो उसके घर की मार्जन, लेपन, प्रक्षालनादि से शुद्धि करके, यज्ञ के स्वस्तिवाचन, र्शान्तकरण का पाठ करें और इसके बाद ईश्वरोपासना करके स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण के मन्त्रों से जहां मन्त्र पूरा हो वहां स्वाहा शब्द का उच्चारण करके सुगन्ध्यादि मिले हुए घृत की आहुति घर में देवें कि जिससे मृतक का वायु घर से निकल जाए और शुद्ध वायु घर में प्रवेश करे और सबका चित्त प्रसन्न रहे। यदि उस दिन रात्रि हो जाए तो थोड़ी-सी आहुति देकर दूसरे दिन प्रातःकाल उसी प्रकार स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण के मन्त्रों से आहुति देवें। इसके पश्चात जब तीसरा दिन हो तब मृतक का कोई सम्बन्धी श्मशान में जाकर चिता से अस्थि उठाके उसे श्मशान भूमि में कहीं पृथक् रख देवे। बस, इसके आगे मृतक के लिए कुछ भी कर्म कर्तव्य नहीं हैं क्योंकि (भस्मान्तं शरीरम्) यजुर्वेद के मन्त्र के प्रमाण से स्पष्ट हो चुका है कि दाहकर्म और अस्थि-संचयन से पृथक् मृतक के लिए दूसरा कोई भी कर्म-कर्तव्य नहीं है। हां, यदि सम्पन्न हों तो अपने जीते जी वा मरे पीछे उसके सम्बन्धी वेदविद्या, वेदोक्त-कर्म का प्रचार, अनाथपालन, वेदोक्त धर्मोपदेश की प्रवृत्ति के लिए चाहे जितना धन प्रदान करें, बहुत अच्छी बात है।

 

वेदों में अस्थियों के किसी नदी में प्रवाहित करने आदि का विधान नहीं है। ऐसा करना वेदविरुद्ध है। इसके बाद मृतक भोज आदि की क्रियायें भी वेद से पुष्ट न होने के कारण करणीय नहीं हैं। हां, लोकाचार के लिए यदि तीसरे या चौथे दिन एक श्रद्धांजलि सभा करते हैं, तो यह की जा सकती है। यही मृतक के देह की अन्त्येष्टि की वैदिक विधि है। इस विधि से ही सब वैदिक सनातन धमिर्यों को अपने परिवार जनों की अन्त्येष्टि क्रिया करनी चाहिये। हमारे पौराणिक बन्धुओं को भी अपनी पद्धति में सुधार कर उसे ऋषि दयानन्द प्रदत्त शुद्ध व उचित वैदिक रूप देना चाहिये। यदि ऐसा करेंगे तो आर्य जाति को संगठित कर उन्हें शक्तिशाली बनाने में सहायक होगा।

 

Leave a Reply

%d bloggers like this: