कैराना में भाजपा की हार का अर्थ विपक्ष की जीत से न जोड़ें

रमेश पाण्डेय

हाल ही में देश की 14 सीटों पर हुए उपचुनाव का परिणाम आने के बाद पूरे देश में प्रधानमंत्री मोदी के विरोधी खुशी से लबरेज हैं। उन्हें लगता है कि 2019 की सत्ता अब उनके हाथ में आने वाली है, पर ऐसा नहीं है। सबसे अधिक शोर उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव परिणाम को लेकर है जहां दिवंगत भाजपा सांसद चौधरी हुकुमदेव सिंह की बेटी मृगांका सिंह राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार चौधरी मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम हसन से चुनाव हार गयी हैं। यहां यह बताया जा रहा है कि विपक्ष की एकता के कारण भाजपा का चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। कमोवेश इससे लोग पूर्व में हुए फूलपुर और गोरखपुर संसदीय सीट के उपचुनाव परिणाम का भी उदाहरण जोड़ लेते हैं। हम जो बताना चाह रहे हैं उसका अर्थ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रसंशा करने से न लगाया जाये। मैं कुछ तथ्य आपके सामने रखना चाहता हूं जिसकी मीमांसा आप जरुर करें। यह सच है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से देश की युवा पीढ़ी ने जो उम्मीद की थी, उस पर वह लोक जरा सा भी खरा नहीं उतरे। आज देश के युवा पीढ़ी के हाथ में केवल और केवल रोजगार चाहिए। बेकार पड़े हाथों को काम चाहिए। स्वच्छता अभियान, गंगा सफाई अभियान, मुफ्त आवास बना देने, रसोईगैस बांट देने जैसी तमाम योजनाओं में अरबों रुपये का अपव्यय कर भारत बदलने का सपना दिखाने से युवा पीढ़ी हैरान है। इससे किसी के जीवन में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। सच में तो ऐसा लगता है कि इन नेताओं के पास युवा पीढ़ी के भविष्य को लेकर कोई विजन नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाषण पिलाते हुए पांच साल बिता दिये पर लोग यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि वे करना क्या चाहते हैं। नोटबंदी के बाद बड़े जोर-शोर से कहा था कि बस केवल 50 दिन का समय दीजिये देश को बदल कर रख देंगे, आंतक और नक्सलवाद की घटनाएं बंद हो जाएंगी, भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा। पर कहीं कुछ नहीं हुआ। भ्रष्टाचार तो और बढ़ गया। आप खुद अपने आसपास के भ्रष्ट लोगों पर नजर डालें और यह तय करें कि इस सरकार में क्या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है। आप पायेंगे कि कार्रवाई होेने के बजाय उनके भ्रष्टाचार की गतिविधि और बढ़ गयी है। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह कहना कि  मैं भ्रष्टाचार से लड़ रहा हूं, कोरा मजाक लगता है। इसी तरह आप मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तुलना करें तो आये दिन वह गोरखपुर का ही भ्रमण करते रहते हैं और अपराधियों के हौसले पस्त कर देने का दावा करते हैं। सच्चाई यह है कि आज भी उत्तर प्रदेश में हर रोज हत्या, बलात्कार, लूट जैसी जघन्य घटनाएं बदस्तूर जारी हैं। अब हम फूलपुर और कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव परिणाम की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करेंगे। बता दें कि यह दोनों सीटे कभी भी भाजपा की परंपरागत सीट नहीं रही। फूलपुर में तो मोदी लहर में पहली बार केशव प्रसाद मौर्य चुनाव जीत गये थे। भाजपा ने पहली गलती यह किया कि केशव प्रसाद को उप मुख्यमंत्री बनाकर लोकसभा सीट से इस्तीफा दिलाया, दूसरी गलती यह किया कि लोकसभा में किसी स्थानीय कार्यकर्ता को उम्मीदवार नहीं बनाया। नतीजा यह रहा कि कार्यकर्ताओं के गुस्से का शिकार भाजपा को बनना पड़ा। यहां के परिणाम को विपक्ष की जीत के संदेश से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। अब कैरान  की स्थिति देखें तो यह भी कभी भाजपा की परंपरागत सीट नहीं रही। मोदी लहर से पहले वर्ष 1998 में यहां से चौधरी वीरेन्द्र सिंह अटल लहर में चुनाव जीते थे। इसके बाद 2014 में मोदी लहर में चौधरी हुकुमदेव सिंह चुनाव जीते। कैराना हमेशा से चौधरी चरण सिंह का गढ़ रहा। यहां आज भी चौधरी अजीत सिंह और जयंत चौधरी की मजबूत पकड़ है। मोदी सरकार ने एक बड़ी गलती किया कि सरकार बनने के बाद दिल्ली में चौधरी अजीत सिंह को मिले सरकारी बंगले को वापस ले लिया गया। इससे चौधरी अजीत सिंह के समर्थक नाखुश हैं। कैरान के बड़े बुजुर्गों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कम से कम इतनी तो दरियादिली दिखानी चाहिए थी। दूसरा पहलू सबसे अहम यह रहा कि जयंत चौधरी ने गांव-गांव जाकर 184 सभाएं की। इससे लोग प्रभावित हुए। भाजपा की एक गलती और भी रहीं कि उन्होंने चौधरी हुकुम देव सिंह के राजनैतिक उत्तराधिकारी माने जा रहे अनिल सिंह को चुनाव में उतारने के बजाय उनकी बेटी मृगांका सिंह को उम्मीदवार बना दिया जो तबस्सुम हसन के मुकबाले काफी कमजोर रहीं। बड़े बुजुर्ग यह भी बताते हैं कि चौधरी मुनव्वर हसन और चौधरी हुकुमदेव सिंह दोनों एक ही गुर्जर परिवार से ताल्लुक रखते हैं। कालांतर में दोनों परिवार विभाजित हो गये और एक ने मुस्लिम धर्म अपना लिया और दूसरे ने हिन्दू धर्म अपनाया। पर इलाके आज भी लोगों में दोनों परिवार के प्रति एक जैसा ही प्यार है। ऐसे में चुनाव परिणाम को भाजपा की हार से व्यापक  पैमाने पर नहीं देखा जाना चाहिए। रही बात गोरखपुर की तो यह जरुर कह सकते हैं कि यह सीट भाजपा की परंपरागत सीट रही। इसके हार जाने का मंथन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जरुर करना चाहिए। भाजपा और विपक्ष को क्या करना चाहिए? उन्हें खुद अपनी राह बनाने के लिए  रणनीति तय करनी होगी।

2 thoughts on “कैराना में भाजपा की हार का अर्थ विपक्ष की जीत से न जोड़ें

  1. प्रवक्ता.कॉम पर पहले से प्रस्तुत लेख, “देश बदलना है तो देना होगा युवाओं को सम्मान” के पश्चात रमेश पांडेय जी का यह राजनीतिक निबंध भी भारतीय युवाओं को लेकर देश के वर्तमान अग्रणियों को चुनौती देते दिखाई देता है| आश्चर्य तो यह है कि “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाषण पिलाते हुए पांच साल बिता दिए पर लोग यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि वे करना क्या चाहते हैं” कह लेखक रमेश पांडेय स्वयं अपना धैर्य खो चुके हैं और उन्हें मालूम नहीं कि वे स्वयं करना क्या चाहते हैं! मैं समझता हूँ कि सत्तर वर्षीय “दलित” के साथ आज भारतीय युवा के भविष्य का उत्तरदायित्व राष्ट्रीय शासन पर लाद ये कल के “प्रोग्रेसिव राइटर्स” कांग्रेस और उनके समर्थक राजनैतिक दलों द्वारा देश में अधिकांश नागरिकों के लिए बनाई दयनीय स्थिति से उन्हें दोषमुक्त कर आगामी लोकसभा निर्वाचनों से पहले अराजकता फैलाना चाहते हैं| आज भारतीय युवा नागरिक युगपुरुष मोदी के साथ है और देश के प्रति सच्चरित्र उसे देश और स्वयं अपना भविष्य अपने आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास के आधार पर सृजन करना और उसे राष्ट्र की रक्षा के लिए तत्पर रहना है|

  2. यह आलेख मुझे स्थानीय और भौमिक जानकारी न रखनेवाला होते हुए भी, बहुत समीचीन लगता है.
    वैसे, इस विषय पर, मेरा अभिप्राय विशेष मह्त्व नहीं रखता.
    पर लेखक मुझे सही प्रतीत होता है.
    मैं अन्य जानकारों की, टिप्पणियों को अवश्य पढूंगा.
    रमेश पाण्डेय जी को आलेख के लिए धन्यवाद.

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