भाई के नाम पत्र

गंगानन्द झा

कल की डाक से तुम्हारा पत्र मिला। मैं प्रतीक्षा कर रहा था। पता नहीं क्यों देर हुई। पर खैरियत से पहुँच गया, ग़नीमत है।
तुम्हारा अवलोकन सही है कि मुझे जीवन के सम्बन्ध की उक्तियों वाले वाक्य खींचते रहे हैं। शायद तुम्हें याद हो तुमसे मैंने बतलाया था कि तुम्हारी एक उक्ति, जो तुमने मुझसे सन 1961 ईं में शेयर की थी, कैसे मेरे मन में गूँथ गई है। Commitment beyond capacity हो तो distortions की सम्भावना बढ़ती है। मेरी जीवन यात्रा में अकसर ऐसे हालात से मुकाबला होता रहा जब लगा कि अपनी क्षमता, capability बढ़ाई जानी चाहिए, पर ऐसा कर पाना मेरी क्षमता के बाहर था। प्रतिबद्धताओं का अपना ही खिंचाव था उनसे अलग होना सम्भव भी नहीं था, इसलिए distortions को अंगीकार करने का कोई विकल्प नहीं रहा। तुम्हारे अवलोकन के आलोक में अपने सफर को देखता हूँ तो cobweb से मुक्ति मिलती लगती है। आज जीवन की शाम को अकसर न चाहते हुए भी सफर का लेखाजोखा स्वतः अपने पास होता रहता है। तुम्हारा एक आलेख मैंने अपने कम्प्यूटर में सेव कर रखा हुआ है। आलेख का शीर्षक Philosophy है। उसका एक अंश उद्धृत कर रहा हूँ।
“ Happiness: —- is the ultimate aim of life. But how to achieve this goal ? It is attained by those who live with happiness, who know to remain satisfied, who believe in contentment. The goal of happiness is like a mirage—more you run after it, more distant it becomes. So the path itself is treated as the goal. And once you are on the track once you have started the journey you are supposed to have reached the goal. Happiness is not something material that is kept outside and you are going to catch it. It is something within you. And the search or the journey for happiness is not outside but it is yourself. ”
अब ये खयाल मेरे अन्दर समा गए हैं, assimilate हो गए हैं, यह कहना डींग मारना होगा। पर मेरे सिस्टम में सम्मिलित हैं, इतना तो जिम्मेदारी से कह सकता हूँ।
इण्टरनेट पर एक पत्रिका है— गर्भनाल। कभी कभार मैं भी उसपर अपनी रचना भेज देता हूँ अभी अगले सप्ताह एक आलेख उसमें आनेवाला है-जिसका विषय है– सुख और आनन्द- मैं तुम्हारे पास भेजूँगा। देखना तुम्हारी ये बातें उसमें शामिल हैं।
इस विजयादशमी के दिन श्री मुचकुन्द दूबे से औपचारिक नमस्कार का आदान प्रदान हुआ। मैंने सोचा कि मुचकुन्द और मेरे बीच समानता कहाँ है सिवाय इसके कि हाई स्कूल की पढ़ाई के चार साल हमने एक साथ साझा किया है। जवाब तलाशने पर कुछ बिन्दु उभड़े वे यह कि उस बैच में मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्णता पानेवाले पाँच लड़कों में हम थे और दूसरा यह कि हम पाँचो ही आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से थे। पढ़ाई ही हमारा एकमात्र आश्वासन और सम्बल हो सकती थी। अपना support system खुद ही विकसित करने की चुनौती हमारे सामने थी। मैंने मुचकुन्द से कहा था कि we started from zero. वह सहमत हुआ था । पर मैंने फिर भी सोचा कि क्या सचमुच हमने शून्य से शुरु किया था। तो अब जवाब मिल रहा है कि वह निष्कर्ष आंशिक रूप से ही सही था। क्योंकि आर्थिक विपन्नता के बावजूद हमें सामाजिक विपन्नता नहीं थी। हमारे पिता को सामाजिक स्वीकृति थी उनसे उपलब्ध प्रेरणा हमें हौसला देती थी।
जीवन की शाम को अपनी बातें करने में आदमी असहज क्यों हो जाता है,? मैं बराबर सोचता हूँ कि कितना अच्छा होता कि जिन्दगी के सफर में जमा हो गई अपनी कुण्ठाओं को हम सहजता से analyse and dispose off कर पाते जैसे domestic waste को किया जाता है। शायद जिन्दगी के रहस्यों में से यह पहेली भी एक है that make life interesting।
तुमसे बातें करना हमेशा से मेरे लिए काम्य रही है, रहेगी।

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