कारवां गुजर गया

विजय कुमार

छात्र जीवन से मेरी रुचि साहित्य में रही है। कविता मंचीय हो या पत्रिका में प्रकाशित, उनके प्रति विशेष आकर्षण था। इसी से कुछ तुकबंदी करने की भी आदत बन गयी। पश्चिमी उ.प्र. में खतौली का श्रावणी मेला, मुजफ्फरनगर की नुमाइश, मेरठ में नौचंदी मेला, सरधना में बूढ़े बाबू का मेला, दिल्ली में गणतंत्र दिवस और उसके अगले दिन गाजियाबाद में होने वाले कवि सम्मेलन सुनने के लिए कई साल तक लगातार मैं गया हूं।नीरज के निधन की खबर पढ़कर एक प्रसंग याद आ रहा है। खतौली में जन्माष्टमी से एक महीने का श्रावणी मेला होता है। कवि सम्मेलन भी उसका एक अनिवार्य कार्यक्रम है। बात लगभग 40 साल पुरानी है। कवि सम्मेलन में पहले और दूसरे चरण की कविता बोलकर रात में डेढ़ बजे नीरज जी सोने चले गये। जाते-जाते उन्होंने आयोजकों से कहा कि यदि मेरी जरूरत हो, तो बुला लेना।सुबह चार बजे जब कवि सम्मेलन लगभग पूरा हो गया, तो श्रोताओं ने नीरज-नीरज का शोर मचा दिया। इस पर आयोजकों ने उन्हें बुलवा लिया। नीरज जी ने आकर अपने स्वभाव के अनुसार दो गाव तकिये लगाये और उसके ऊपर बैठ गये। तब तक मुश्किल से सौ श्रोता ही बचे होंगे। उन्होंने सभी को मंच पर बुला लिया। सब उन्हें घेर कर बैठ गये। वे बोले कि ये कविता के असली रसिक हैं। मुझे ऐसे ही लोग चाहिए।इसके बाद दो घंटे तक वे कविता सुनाते रहे। जिस श्रोता ने जो कहा, वो उन्होंने सुनाया। क्या मजाल कि कोई श्रोता टस से मस हुआ हो। क्योंकि वे सब उन्हें सुनने के लिए ही रुके थे। यहां तक कि सुबह के छह बज गये। पूरब से सूर्य देवता दस्तक देने की तैयारी करने लगे। तब आयोजकों ने हाथ जोड़कर श्रोताओं से क्षमा मांगी। वरना न तो श्रोता और न ही नीरज वहां से हटने को तैयार थे।यों तो नीरज जी को कवि सम्मेलन में पचासों बार सुनने का अवसर मिला है; पर उस दिन का प्रसंग कभी नहीं भूल सकता। गीतों के उस राजकुमार को मेरी श्रद्धांजलि।

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