शिक्षा जगत में नकल के बदलते मायने

 

बी.आर.कौंडल

     

 

 

 

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शिक्षक बच्चों के लिए मार्गदर्शक होते है | पहले से यह परंपरा रही है कि बच्चों को नैतिक मार्ग पर ले जाने के लिए माता-पिता के बाद शिक्षक ही एकमात्र ऐसा स्तंभ है जिस पर बच्चों के भविष्य की नींव रखी जाती है | यही कारण है कि शिक्षकों पर बिना किसी संदेह के विश्वास किया जाता रहा है | परन्तु समय बदलता गया, गुरुकुल प्रथा सरकारी स्कूलों में परिवर्तित हुई तथा आज यह शिक्षा संस्थान व्यापार व अराजकता की दुकानों में बदल गये हैं | न तो गुरु शिष्य का बेमिसाल सम्बन्ध रहा है और न ही शिक्षा का नैतिक उद्देश्य |

कारण कोई भी हो लेकिन नैतिक मूल्यों में यह गिरावट भविष्य के लिए अच्छा संकेत नही है | पब्लिक स्कूल पैसा कमाने के स्त्रोत बन गये हैं तथा सरकारी स्कूल अनुशासनहीनता के केंद्र | न तो शिक्षकों में वो गुण रहे जो गुरुकुल के गुरुओं में होते थे और न ही शिष्यों में वह भाव जो अपने गुरुओं के प्रति सम्मान प्रकट करता हो | अत: समाज का निर्माण करने वाला यह स्तंभ ज़र-ज़र हालत में पहुँच चुका हैं | यदि समय रहते इसे गिरने से नही रोका गया तो सारा भवन धराशायी हो जायेगा |

शिक्षा जगत की कुछ ऐसी ही कहानी है | शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता को सुधारने की जगह साक्षरता दर को सुधारने का प्रयास सरकार करती रहती है जिससे लड़के-लड़कियां साक्षर तो बन रहे हैं परन्तु उनमें संस्कारों का अभाव होता जा रहा है | अच्छे शिक्षक अच्छी शिक्षा व दीक्षा प्रदान कर सकते हैं परन्तु आज के समय में अच्छे शिक्षकों की भी कमी अखर रही है | पहले जो पढ़ने में अच्छे बच्चे होते थे उनमें से ज्यादातर शिक्षक बनना अपना लक्ष्य बनाते थे लेकिन आज पैसा कमाने की होड़ में वे बच्चे निजी कंपनियों में काम करना पसंद करते हैं जिससे शिक्षा जगत में शिक्षकों की भारी कमी हो गयी है | सरकारी आंकड़ों के अनुसार आज की तारीख में 5.8 लाख प्राथमिक स्तर के शिक्षक व 3.5 लाख अप्पर प्राथमिक स्तर के शिक्षकों की कमी है | इसके अलावा पूरे देश में लगभग 5 लाख शिक्षक विश्वविद्यालयों के लिए वांछित है | ऊपर से सरकार शिक्षकों को पूरा वेतन व नौकरी की सुरक्षा देने के बजाय उन्हें भी कॉन्ट्रैक्ट पर रख रही है जिससे शिक्षा जगत में शिक्षक अपने करियर के प्रति असुरक्षित महसूस कर रहे हैं | यही कारण है कि आज अच्छे शिक्षक मिलना दुर्लभ हो गये हैं | ऐसी परिस्थिति में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार केवल एक सपना मात्र होगा |

सरकारी स्कूलों का स्तर निजी स्कूलों के बच्चों के बराबर लाने के लिए शिक्षा विभाग कई प्रकार के कदम उठा रहा है लेकिन जब तक शिक्षक खुद शिक्षा के स्तर को नही सुधारते तब तक विभाग के वे कदम निर्थक साबित होंगे | शिक्षकों को पहले यह समझना होगा कि वे समाज के निर्माता हैं | अत: उन्हें समाज को किस ओर ले जाना है इस पर विचार करना होगा | सरकारी स्कूलों का यह हाल है कि अधिकतर स्कूलों में शिक्षक स्वयं बच्चों को परीक्षा के दौरान नक़ल करवाते हैं तथा बच्चों के माता-पिता व स्कूल प्रबंधन समितियां इस कार्य के लिए उन्हें सहयोग देते हैं | इसका प्रमाण यदि विभाग को चाहिए तो जिन स्कूलों का रिजल्ट 90 प्रतिशत से ऊपर रहता है या स्कूल सड़क से बाहर स्थित है, में परीक्षा के दौरान अचानक जाकर देखें कि नक़ल का कैसा रूप वहाँ देखने को मिलता है | दुर्गम स्थाओं पर स्थित स्कूलों में तो परीक्षा एक ढोंग मात्र रह गया है | साल 1999 के दौरान स्कूल शिक्षा बोर्ड के अनुरोध पर बतौर एस.डी.एम. चौपाल मैंने स्वयं यह प्रयोग करके देखा तो शत-प्रतिशत रिजल्ट देने वाले 9 स्कूलों का रिजल्ट जीरो से दस प्रतिशत तक रहा जो शिक्षा विभाग की आँखे खोलने के लिए पर्याप्त है | ये वही स्कूल थे जिन्हें पिछले सालों अच्छा रिजल्ट देने के लिए शिक्षा विभाग पारितोषिक देता रहा था |

यदि नक़ल रोकनी है तो जिस स्कूल में मास कोप्यिंग पाई जाये उसके ड्यूटी पर तैनात सभी शिक्षकों के खिलाफ़ एंटी-कोप्यिंग एक्ट के तहत केस दर्ज किया जाना चाहिए तथा उस दिन की परीक्षा रद्द घोषित की जानी चाहिए | यह प्रयोग नकल रोकने के लिए कारगर साबित हुआ था | यह बात अलग है कि इस सारे अभियान को सफल बनाने की कीमत मुझे जानलेवा हमले से चुकानी पड़ी थी | देखना यह भी आवश्यक है कि औचक निरिक्षण करने वाले कितने शिक्षक व अधिकारी इस प्रकार का जोखिम उठाने के लिए तैयार है और जो ऐसा जोखिम उठा कर सराहनीय कार्य करते हैं उनके लिए सरकार के पास सुरक्षा एवं प्रोत्साहन हेतु क्या योजना है ? ऐसी सूरत में केवल शिक्षा निर्देशालय से फ़रमान ज़ारी करना पर्याप्त नही है अपितु धरातलीय स्थिति को समझते हुए शिक्षा में सुधार लाने होंगे | कार्यवाही बच्चों के खिलाफ़ ही नही अपितु शिक्षकों के खिलाफ भी होनी चाहिए | रद्द की गयी परीक्षा जिम्मेवार अधिकारी की निगरानी में करवानी चाहिए ताकि बच्चों को भी अपना चेहरा आईने में नज़र आ सके | इस सम्बंध में स्कूल शिक्षा बोर्ड द्वारा बनाये गये उड़नदस्ते केवल अपनी ड्यूटी निभाने तक सीमित रहते हैं | नक़ल कारगर तरीके से रोकना उनका धेय्य नही होता | उड़नदस्ते में शामिल कुछ सदस्य पहले ही सम्बंधित स्कूलों को आने की सूचना दे देते हैं या फिर सरेआम जा कर स्कूल में अपनी हाजिरी दिखा कर अपनी ड्यूटी पूरी कर देते हैं | क्या ऐसी व्यवस्था में नकल जैसी पनप रही बुराई को रोका जा सकता है ?

यह कहना भी सही नही कि सभी शिक्षक नक़ल करवाना चाहते हैं | परन्तु जो इस प्रथा के विपरीत चलते हैं उनको न तो स्थानीय लोगों का सहयोग मिलता है और न ही स्कूल के मुखिया का | इसलिए ऐसे अध्यापक कई बार परीक्षा ड्यूटी से अपना मुंह मोड़ना ही उचित समझते हैं | अत: आवश्यकता इस बात की है कि सभी स्कूलों में ऐसे शिक्षकों की पहचान की जाये, उन्हें उचित सुरक्षा प्रदान की जाये तथा सराहनीय कार्य करने के लिए सम्मानित किया जाये | ऐसे शिक्षकों के लिए सरकार या विभाग के पास क्या योजना है जो पढ़ाते भी ईमानदारी से हैं और नक़ल जैसी सामाजिक बुराई को न पनपने देने के आरोप में स्कूल प्रबन्धन समितियों के प्रतिनिधियों के कोप के भाजन भी बनते हैं ? सम्मान उन शिक्षकों को मिले जो धरातल पर अच्छा काम करते हैं न की उनको जो विभिन्न स्तरों से प्रमाण पत्र इकट्ठे करके अवार्ड के लिए अपनी झोली फैलाकर सरकार के पास आते हैं | इस बात की भी आवश्यकता है कि शिक्षकों को कॉन्ट्रैक्ट के बजाय रेगुलर नौकरी पर रखा जाये ताकि वे लग्न से कार्य करें |

यह भी देखा गया है कि शिक्षकों पर समय-समय पर दूसरे विभाग जैसे – चुनाव, जन-गणना आदि का काम भी सौंपा जाता है जिससे बच्चों की पढ़ाई पर विपरीत असर पड़ता है | अत: इस प्रकार के कार्य शिक्षकों को न सौंपे जायें | शिक्षकों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट रिजल्ट प्रतिशत के आधार पर नही अलबत्ता बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर लिखी जानी चाहिए तभी भवन के इस ज़र-ज़र हुए स्तंभ को टूटने से बचाया जा सकता है | निर्देशालय से शिक्षकों को ताजा दायित्व यह मिला है कि उन्हें देश-विदेश के घटनाक्रम के सम्बन्ध में प्रश्न बच्चों से तैयार कराने होंगे | निर्देशों में यह भी है कि स्कूलों के औचक निरिक्षण के दौरान उप-निदेशक विद्यार्धियों से सवाल पूछेंगे | विभाग की यह पहल तो अच्छी है लेकिन स्कूलों की बुनियादी जरूरतों व खामियों की तरफ भी ध्यान देना होगा अन्यथा निर्देश केवल हवाई आदेश बनकर ही रह जायेंगे |

 

1 thought on “शिक्षा जगत में नकल के बदलते मायने

  1. कौण्डलजी। आप प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं ,और आपका शिक्षा से लगाव है यह जानकर मुझे प्रसन्नता होती है. नकल रोकने के उपाय आप कितने भी कर लें यह केवल बहरी मल्लम लगाने जैसा होगा। मूल में जो नकल के विषाणु हैं वे नासूर की तरह गुणीत क्रम में बढ़ेंगे. माध्यमिक शिक्षा मंडल यदि इन बिन्दुओं पर गौर करे तो मेरा दावा है की ९०%नकल को रोक जा सकता है। (१)गणित,भौतिकी,रसायन विषयों में आरक्षित वर्ग के पद रिक्त हैं. कई उच्चतर माध्यमिक शालाएं ऐसी हैं जहाँ इन आरक्षित पदों पर प्रत्यशी के न मिलन से पदपूर्ति हुई ही नही. प्रदेश स्तर पर ऐसी एक दो शालएं नहीं हैं बल्कि इनकी संख्या प्रतीक जिले में १०-१५ हैऽब इन विषयों को दूसरा कोई शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहता. अब इन बच्चों का भविष्य क्या होगा/सिवाय नकल के ये उत्तीर्ण होने की कल्पना नहीं कर सकते. अतः इन पदों की पूर्ति सामान्य वर्ग से की जावे,और जब आरक्षी वर्ग का प्रत्याशी मिल जाय तो उस सामान्य वर्ग के रत्याशी को हटा दिया जाय। उसे बोनस अंक भविष्य में होनेवाली भर्ती के लिए दे दिए जाय.(२) जिन परीक्षा केन्द्रों से हजारों की संख्या में आवदेन अग्रषित होते हैं ,उसके कारण खोजे जाएं. उदहारण के लिए कौण्डलजी मैं बताऊं नेताओं की रतलामऔर देवास जिले (मप्र) में कुछ केंद्र ऐसे हैं जहाँ प्रविष्ट होने वाले परीक्षार्थिओं की संख्या हजारों में हैं और ये दूरस्थ जिलों के हैं. (३)कई सहलाये ऐसी हैं की जहाँ एक कक्ष में आदिक से अधिक ५०-६० विधार्थी बैठ सकते हैं ,किन्तु भर्ती किये गए छात्रों की संख्या ९०-१०० है. यह संभव कैसे है/इसकी जाँच शिक्षा ,मंडल और विभाग कर सकते हैं ऐसे कई कदम हैं जो नकल को रोक सकते हैं

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