मीडिया का बदलता रूप एवं प्रभाव

हिन्दी शब्द ‘माध्यम’ से अंग्रेजी में ‘मीडियम’ और मीडिया बना। एक जगह की बात या घटना को दूसरी जगह पहुंचाने में जो व्यक्ति या उपकरण माध्यम बनता है, वही मीडिया है। सृष्टि के जन्मकाल से ही किसी न किसी रूप में मीडिया का अस्तित्व रहा है और आगे भी रहेगा। इस सृष्टि में नारद जी पहले पत्रकार हैं। इसीलिए उनकी जयंती (ज्येष्ठ कृष्ण 2) वास्तविक ‘पत्रकारिता दिवस’ है। 30 मई को देश भर में ‘हिन्दी पत्रकारिता दिवस’ मनाया जाता है। चूंकि 1826 में इस दिन श्री जुगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से हिन्दी का पहला साप्ताहिक अखबार ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ शुरू किया था। उस दिन नारद जयंती ही थी। यद्यपि अर्थाभाव में यह 11 दिसम्बर 1827 को बंद हो गया; पर पत्रकारिता के इतिहास में नारद जयंती को पुनर्जीवित कर गया।

कहते हैं कि नारद जी की पहुंच देव, गंधर्व, नाग आदि लोकों से लेकर आकाश और पाताल तक थी। वे अपनी वीणा लेकर ‘नारायण-नारायण’ करते हुए हर उस जगह पहंुच जाते थे, जहां उनकी जरूरत होती थी। दुर्भाग्य से हमारी फिल्मों और दूरदर्शन ने उनकी छवि एक जोकर और यहां-वहां आग लगाने वाले व्यक्ति की बनायी है। जबकि वे लोकहितकारी पत्रकार थे। उनके सामने जनता का हित सर्वोपरि रहता था।

श्रीकृष्ण के जन्म का ही उदाहरण लें। अपनी बहिन देवकी को ससुराल छोड़ने जाते समय हुई भविष्यवाणी से चिंतित होकर कंस ने देवकी ओर वसुदेव को जेल में बंद कर दिया। इसके बाद वह देवकी की आठवीं संतान की प्रतीक्षा करने लगा। नारद जी जानते थे कि जब तक कंस के पाप का घड़ा नहीं भरेगा, तब तक जनता में विद्रोह नहीं होगा। इसलिए वे आठ पंखुड़ी वाला कमल लेकर कंस के पास गये और उसकी आठवीं पंखुड़ी पहचानने को कहा। इससे कंस भ्रमित हो गया। उसने अपनी दुष्ट मंडली से पूछा, तो सबने देवकी के सभी बच्चों को मारने की सलाह दी। कंस ने ऐसा ही किया।

लेकिन इससे लोगों में आक्रोश बढ़ता गया और सबने तय कर लिया कि चाहे जो हो, पर आठवीं संतान को बचाना ही है। इसलिए श्रीकृष्ण के जन्म लेते ही जेल के पहरेदार, लुहार आदि ने उनके निकलने का प्रबंध कर दिया। नाव वालों ने ऐसी मजबूत नाव बनायी, जो दूर से शेषनाग जैसी दिखती थी और उससे श्रीकृष्ण को उफनती यमुना पार करा दी गयी। फिर इसी तरह गोकुल से देवकी की नवजात कन्या को ले भी आये। इसके बाद कंस को सूचना दी गयी। यह कथा नारद जी की बुद्धिमत्ता और योजकता को बताती है।

कोई कह सकता है कि नारद जी हर युग और काल में कैसे हो सकते हैं ? वस्तुतः नारद जी कोई व्यक्ति न होकर एक संस्था या उसके पदाधिकारी थे, जैसे आजकल प्राचार्य, अध्यक्ष या मुख्यमंत्री आदि होते हैं। इसलिए नारद जी आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। सत् और त्रेता के बाद द्वापर युग आता है। तब विज्ञान बहुत उन्नत था। इसीलिए कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत का आंखों देखा हाल संजय ने हस्तिनापुर में बैठे धृतराष्ट्र को सुनाया था। अर्थात तब भी दूरदर्शन जैसा कोई उपकरण अवश्य रहा होगा। महाभारत के युद्ध में विज्ञान की समूची प्रगति दांव पर लग गयी थी। इससे विश्व की अधिकांश जनसंख्या और विज्ञान भी नष्ट हो गया।

लेकिन मीडिया की जरूरत फिर भी बनी रही। कभी कबूतर, घोड़े या ऊंट सवारों से संदेशवाहकों का काम लिया जाता था। पर्वत और वनों में ढोल की थाप से संदेश पहुंचाए जाते थे। ‘ढोल सागर’ नामक गं्रथ में इसकी जानकारी मिलती है, यद्यपि अब उसका बहुत कम भाग ही उपलब्ध है।

अंग्रेजों ने भारत में 1850 में टेलिफोन की तारें लगायीं। इससे कहीं भी हुए सैन्य विद्रोह की सूचना तुरंत देश भर में पहुंच जाती थी। 1857 में कोलकता की बैरकपुर छावनी और फिर कुछ दिन बाद मेरठ छावनी में विद्रोह हुआ। टेलिफोन से इसकी सूचना सब छावनियों में पहुंच गयी और वहां कार्यरत भारतीय सैनिकों से हथियार ले लिये गये। यह कमाल टेलिफोन का ही था। इसीलिए भारतीय स्वाधीनता सेनानी हर जगह सबसे पहले टेलिफोन की तारें काटते थे।

इन तारों से टेलिग्राम भी होते थे। 1854 में इसकी व्यावसायिक सेवाएं शुरू हुईं। 1902 में ये वायरलैस हो गया; पर एक समय पत्रकार इसी से समाचार अखबारों को भेजते थे। पुरानी पड़ जाने से 2013 में यह सेवा बंद कर दी गयी। इसी में से फिर टेलिप्रिंटर का जन्म हुआ, जो अखबारों के लिए अनिवार्य चीज थी। हर समाचार एजेंसी के अपने टेलिप्रिंटर होते थे। पहले केवल अंग्रेजी टेलिप्रिंटर ही थे; पर फिर हिन्दुस्थान समाचार ने हिन्दी टेलिप्रिंटर बना लिया। इसके बाद फैक्स मशीन आ गयी। कम्प्यूटर, मोबाइल और ई.मेल के दौर में अब वह भी पुरानी हो गयी है।

एक समय केवल प्रिंट मीडिया ही था; पर फिर टी.वी. आ गया। चूंकि दृश्य सदा लिखित सामग्री से अधिक प्रभावी होता है। कबीर दास जी ने भी ‘आंखों देखी’ को ‘कागद की लेखी’ से अधिक महत्व दिया है। अब घर के टी.वी. से आगे मोबाइल टी.वी. और सोशल मीडिया आ गया है। इसके आगे क्या होगा, कहना कठिन है। हो सकता है पोलियो की तरह बच्चों को मीडिया का भी टीका लगा दिया जाएगा। फिर न टी.वी. की जरूरत होगी और न मोबाइल या इंटरनेट की। विज्ञान जो न कराए वह थोड़ा ही है।

कहते हैं कि विज्ञान का हर नया उपकरण पुराने को बाहर कर देता है; लेकिन इसके बावजूद एक चीज कभी बाहर नहीं हुई और होगी भी नहीं। वह है पत्रकार। क्योंकि मशीन कितनी भी उन्नत हो जाए; पर उसे चलाता आदमी ही है। इसलिए पत्रकार का ठीक रहना जरूरी है। उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता चाहे जो हो; पर समाचार के साथ विचार का घालमेल ठीक नहीं है। एक ही सभा की रिपोर्ट करते समय एक संवाददाता फोटो में खाली कुर्सियों वाला क्षेत्र दिखाता है, तो दूसरा भरी हुई। कई संवाददाता किसी से सुनकर समाचार छाप देते हैं या जानबूझ कर विवाद खड़ा कर देते हैं। इससे पत्रकार और अखबार दोनों की छवि खराब होती है। इससे बचना ही उचित है। चंूकि विश्वसनीयता सबसे बड़ी चीज है।

किसी समय पत्रकारिता का अर्थ समाचार संकलन ही होता था; पर अब खेल, सिनेमा, फोटो, साहित्य, थाना, कोर्ट, राजनीतिक व सामाजिक संस्थाओं के लिए भी अलग-अलग संवाददाता होते हैं। विधा चाहे जो हो, पर पत्रकार के लिए खूब पढ़ना और भाषा पर अधिकार जरूरी है। गलत तथ्य देना अपराध ही नहीं, पाप भी है। ऐसा कहते हैं कि किसी समय मीडिया मिशन था; पर अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी गिरावट आयी है। अतः वह कमीशन से होते हुए सेंसेशन तक पहुंच गया है; लेकिन हजारों पत्रकार आज भी निष्ठा से काम कर रहे हैं। इसीलिए बदलते समय के साथ मीडिया का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

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