चीन-भारत-अमेरिका: बनते बिगड़ते समीकरण

दुलीचन्द रमन
वुहान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अनौपचारिक वार्ता के निष्कर्ष सार्वजनिक तौर पर सांझा नही किये गये। लेकिन पहले उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग द्वारा चीन की गुप-चुप यात्रा और उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी से मंत्रणा से विश्व को बदलते वैश्विक समीकरणों की पदचाप सुनाई दे रही है।
प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की इस मुलाकात में डोकलाम विवाद के काले बादलों को छितराने का काम किया है। जिसमें 73 दिनों तक दोनों देशों की सेनायें आमने-सामने आ गई थी तथा यह मुद्दा कभी सैन्य तो कभी राजनीतिक स्तर पर गरमा जाता था। बात चाहे ‘सीपैक’ की हो, मालद्वीव व नेपाल से चीन के संबंध, एन.एस.जी. की सदस्यता, आंतकवादी मौलाना मसूद अजहर का मामला या फिर दक्षिण चीन सागर में चीनी दादागिरी, ये कुछ ऐसे मसले है जिनसे चीन-भारत के बीच अविश्वास की खाई बहुत ज्यादा बढ़ गई थी।
चीन की इस पहल के पीछे स्पष्ट रूप से अमेरिकी-चीनी व्यापार-युद्व का घटनाक्रम है। अमेरिका एक के बाद एक ऐसे कदम उठा रहा है जिससे वह अपना व्यापार घाटा कम कर सके तथा इसका सीधा असर चीन के निर्यात पर होना तय है। चीन अब विश्व की फैक्ट्री बन चुका है। इस माल को ‘वन बेल्ट-वन रोड’ के माध्यम से विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाने के लिए वह सड़कों , रेलवे, बदंरगाहों पर आसीमित धन खर्च कर रहा है। जाहिर है कि चीन का बहुत कुछ दाव पर लगा है। अगर इसी प्रकार की सरंक्षणवादी प्रतिक्रिया विश्व के अन्य देशों से भी आने लगे तो चीनी अर्थव्यवस्था व रोजगार गंभीर संकट में फंस सकता है। चीन को दूसरा खतरा भारत के सहयोग से हिन्द-प्रंशात क्षेत्र में बन रहे नये ‘शक्ति पुंज’ का भी था जिसमें अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत की सैन्य शक्तियाँ मिलकर युद्वाभ्यास के द्वारा एक संदेश भेजने में कामयाब रही जिनसे चीनी ड्रेगन की फुफकार को शांत करने का काम किया है।
मोदी जिनपिंग वार्ता के नतीजें भी आने शुरू हो गये है। चीन ने 1 मई से भारत की 28 दवाईयों से आयात शुल्क हटा लिया है। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-चीन के बीच बढ़ते व्यापार घाटे का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था तथा इसे संतुलित करने के लिए भारतीय चीनी, दवाईयाँ तथा नान-बासमती चावल के निर्यात की मंशा प्रकट की थी। इस दौरान क्षेत्रिय सहयोग के लिए ठब्प्ड (बंगलादेश-चीन-भारत-म्ंयामार) नामक ग्रुप के क्रियान्वयन पर भी वार्ता कुछ आगे बढ़ी है। भारत और चीन संयुक्त रूप से अफगानिस्तान में कुछ परियोजनाओं में सहयोग करने हेतु तैयार हुए है। अमेरिका के पेरिस जलवायु समझौते से हटने के बाद की परिस्थितियों पर भी दोनों शीर्ष नेताओं ने आगामी कार्यनीति तैयार की है।
अमेरिका अभी तक उत्तर कोरिया पर कोई कार्यवाही इसलिए नहीं कर सका क्योंकि उसे पता है कि उसके पीछे चीन खड़ा है। चीनी नेताओं से मिलकर किम जोंग के बदले बोलों के पीछे भी चीनी मिठास है। इस समय चीन भी विश्व में अपनी चैधराहरट चाहता है। तथा ऐसा कोई भी संदेश नहीं देना चाहता ताकि इसकी कोई भी नकारात्मक छवि बने। आर्थिक प्रतिबंधो से उत्तर कोरिया की कमर भी टूट चुकी हे। वैसे उसने अपने आणविक व मिसाईल लक्ष्य हासिल कर लिए है। अब वह इन प्रतिबंधों को शिथिल करवाने के लिए छटपटा रहा है। किम जोंग ने दक्षिण कोरिया से भी अपने संबंधों में सुधार की कोशिश तेज कर दी है। यह चीन को भी पता है कि अगर उत्तर कोरिया में किसी प्रकार का विद्रोह या संघर्ष हुआ तो चीन में कोरियाई शरणार्थियों की बाढ़ सी आ जायेगी जो चीन कभी नही चाहेगा। इसलिए वह भी बातचीत के पक्ष में है। डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा किम जोंग के साथ 12 जून को होने वाली सिगांपुर वार्ता से कदम खीचने के बाद विश्वस्तर पर अमेरिका की आलोचना हो रही थी। इस बीच उत्तर कोरिया ने अंतराष्ट्रीय पत्रकारों के समक्ष अपने परमाणु परीक्षण स्थल भी नष्ट कर दिये और उसे रूस का भी सहयोग मिल गया। अपनी बाजी को पलटते देख अमेरिका को भी वार्ता की पुनः सहमति देनी पड़ी।
भारत के लिए अमेरिका की तरफ से भी सुहानी हवायें नही चल रही है। डोनाल्ड ट्रम्प ने निर्वाचित होते ही वीजा संबंधी अवरोध उत्पन्न करने शुरू कर दिये थे बाद के दिनों में अपनी संरक्षणवादी कदमों से भारतीय साॅफ्टवेयर उद्योग की राह में कई अड़चने खड़ी की गई। अमेरिका अब विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से खाद्य सुरक्षा संबंधी भण्डारण तथा समर्थन मूल्य के नाम पर भारत के घेरने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका ने भारत को उन देशों की श्रेणी में रखा है जो अपनी मुद्रा में हेर-फेर करते है जिससे डालर के मुकाबले रुपया कमज़ोर होने से अमेरिकी निर्यात घटता है। जिससे अमेरिका का व्यापार घाटा बढ़ जाता है। इस प्रकार के कदमों से परस्पर विश्वास में कमी आयी है।
अमेरिका व रूस सीरिया के मुद्दे पर परस्पर भिड़ रहे है। रूस असद की सरकार को समर्थन कर रहा है तो अमेरिका कुर्द विद्रोहियों के पक्ष में है। अमेरिकी प्रशासन ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये है। जाहिर है इसका भारत की रक्षा तैयारियों पर भी असर पड़ेगा क्योंकि भारत रूस से अपने सैन्य साजो-सामान का 60 प्रतिशत खरीदता है। अमेरिका के इन प्रतिबंधों की छाया वर्तमान में वायु रक्षा रोधी एस-400 प्रणाली की खरीद पर भी पड़ने की संभावना है।
अब ट्रम्प ने ईरान के साथ परमाणु समझौता त्याग दिया तथा ईरान पर पहले से भी अधिक आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। अमेरिकी कानून में ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर भी प्रतिबन्ध का प्रावधान है। भारत की ऊर्जा जरूरतों को ज्यादातर ईरान ही पूरा करता है तथा भारत और ईरान संयुक्त रूप से चाहबार बंदरगाह के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। जाहिर है कि चाहबार परियोजना भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जिससे वह अफगानिस्तान तथा मध्य-पूर्व के देशों में अपनी उपस्थिति सदृृढ़ कर सकता है। भारत और ईरान यूरो मुद्रा में लेन-देन करते है। तथा इस बार यूरोपियन यूनियन भी प्रतिबंधों के पक्ष में नही है। इस मुद््दे पर भी अमेरिका के साथ भारत के हितों का टकराव तय है।
भारत के जो कदम अमेरिका की तरफ बढ़ रहे है वे फिलहाल ठहर से गये है। क्योंकि विश्वस्तर पर अमेरिकी प्रशासन के प्रति अविश्वसनीयता बढ़ी है। इसके अलावा चीन व रूस भी भारत को अमेरिकी पाले में जाने से रोकने के भरसक प्रयास कर रहे है। भारत अपने अतंराष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर फुंक-फूंक कर कदम रख रहा है। विदेश नीति का तकाजा है कि हमेशा कुछ पत्ते हाथ में भी रहने चाहिए ताकि विपरित परिस्थितियों में भी बाजी को अपने हक में किया जा सके।

 

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