चिंतन-सृजन (1) : एक भारतीय कम्युनिस्ट की आत्मकथा

निर्मल वर्मा 

हिंदी में विचार-पत्रिकाओं की संख्‍या बहुत कम हैं। जो हैं भी, उनमें से अधिकांश अराष्‍ट्रीय विचारों से प्रेरित हैं। लेकिन इन विडंबनाओं के बीच कुछ पत्रिकाएं अभी भी ज्ञान-आलोक दीप प्रज्‍वलित कर रही है, इन्‍हीं में से प्रमुख है : त्रैमासिक पत्रिका ‘चिंतन-सृजन’। इसके संपादक श्री बी.बी. कुमार एवं सह संपादक श्री शंकर शरण  ‘भारतीय आस्‍था’ को प्रवाहमान बनाने में उल्‍लेखनीय भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। हमने जब श्री कुमार से पत्रिका में प्रकाशित विचारशील आलेखों को ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ पर प्रस्‍तुत करने के संबंध में बात की तो उन्‍होंने सहर्ष अनुमति दी, उनके प्रति हार्दिक आभार। प्रस्‍तुत है वामपंथी बुद्धिजीवी मोहित सेन की पुस्तक ‘एक भारतीय कम्युनिस्ट की जीवनी: एक राह, एक यात्री’ की सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार व विचारक श्री निर्मल वर्मा द्वारा लिखित विचारशील समीक्षा (सं)

किसी पुस्तक को पढ़ते हुए लगता है, हम सहसा इतिहास के ऐसे ‘चौराहे’ पर चले आए हैं, जहाँ से हमारी जिन्दगी के कुछ वर्ष बीते थे। हम भी उन्हीं घटनाओं के झाड़ झखाड़ के भीतर से गुजरे थे, जिनका दृष्टा पुस्तक का लेखक था। जिन झंझावातों के थपेड़ों ने उसके जीवन को झिंझोड़ा था, उनके असहाय भोक्ता हम भी थे। एक ही रास्ते के दो पथिक जो अलग-अलग दिशाओं से होते हुए सहसा पुस्तक के पन्नों पर एक दूसरे से मुलाकात कर लेते हैं। लेखक की आत्मकथा में स्वयं पाठक उसका एक पात्र बना दिखायी देता है। मोहित सेन की पुस्तक ‘एक भारतीय कम्युनिस्ट की जीवनी: एक राह, एक यात्री’ पढ़ते हुए मुझे कई बार कुछ ऐसा ही विचित्र अनुभव होता था।

यह सचमुच अचरज की बात है कि आज भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का कोई वस्तुपरक, निष्पक्ष-रूप से लिखा ‘इतिहास’ नहीं है, इतिहास जैसा हुआ है वैसा, वैसा नहीं जैसा पार्टी अपने को देखती है। अनेक महत्वपूर्ण तथ्य आज भी रहस्य की कुहेलिका में डूबे हैं; पार्टी की बदलती हुई नीतियों के पीछे कोई स्पष्ट तर्क-रेखा नहीं, अराजक उच्छृंखलता दिखायी देती है। इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है, कि जो पार्टी हर दूसरी सांस में ‘इतिहास’ का नाम जपती है, उसका स्वयं अपना कोई तर्कसंगत, विश्वसनीय इतिहास नहीं। इस दृष्टि से मोहित सेन की पुस्तक, आत्मपरक होने के बावजूद या शायद इसी के कारण, एक भारी कमी को पूरा करती जान पड़ती है। वैसे भी एक कम्युनिस्ट का व्यक्तिगत जीवन, एक सीमा के बाद, उसके पार्टी के इतिहास में इतना घुलमिल जाता है, कि दोनों को अलग कर पाना असंभव जान पड़ता है। यह बात बरसों पहले अमरीकी पत्रकार ऐडग्र स्नो ने अपनी पुस्तक ‘रैड स्टार ओवर चाईना’ में माओत्से तुंग से इन्टरव्यू करते समय महसूस की थी। यदि मोहित सेन की ‘आत्मकथा’ अन्य कम्युनिस्ट नेताओं से कुछ अलग है, तो इसलिए कि उसमें उनका व्यक्तिगत जीवन उनके सार्वजनिक परदे के पीछे तिरोहित नहीं हो पाता, बल्कि उनके पीड़ित अन्तर्द्वन्द्वों, आत्म-शंकाओं और पार्टी के भीतर रहते हुए भी पार्टीको बाहर से देखने की उन्मुक्त आलोचनात्मक चेतना को उभारता हुआ उनकी जीवन-कथा को एक गहन मानवीय गरिमा प्रदान करता है। उनकी पुस्तक पार्टी नीतियों का औचित्य स्थापित करने के लिए नही लिखी गयी, इसके ठीक विपरीत अपने जीवन, अनुभवों की कसौटी पर निर्भीक आकलन करने के लिए लिखी गयी है। अक्सर कम्युनिस्ट पार्टी ‘आत्मालोचना’ का यंत्र दूसरों की आलोचना करने में ही इस्तेमाल करती है, मोहित सेन पहली बार उसका परीक्षण अपने जीवन की प्रयोगशाला में करते हैं। उनकी पुस्तक में एक तरह का बौद्धिक खुलापन है, जो कम्युनिस्ट हठधर्मिता से अलग एक सुशिक्षित पाश्चात्य ‘लिबरल’ बुद्धिजीवी की याद दिलाता है।

यह संयोग नहीं कि कलकता के ब्रह्म समाज में मोहित सेन का परिवार पाश्चात्य संस्कृति में इतना रंगा-ढला था कि भाई-बहिन सब एक दूसरे से अंग्रेजी में बात करते थे। स्वयं मोहित सेन बडे़ होने पर भी बंगला में बातचीत करने में हिचकिचाते थे। अपने पिता ए.एन. सेन से, जो कलकता हाईकोर्ट के सुविख्यात जज थे, मोहित सेन ने न्याय और सत्य की विवेक-चेतना को पहचाना था, जो अंग्रेजी राज के काले पक्षों कीआलोचना करते हुए भी उसके लोकतांत्रिक आदर्शों को अपनाती थी। अपने युवावस्था के दिनों में – और बाद में इंगलैंड जाने पर केम्ब्रिज युनिवर्सिटी के बौद्धिक परिवेश में मोहित सेन मार्क्‍सवाद के प्रति आकृष्ट हुए। हमारी पीढ़ी के अनेक बुद्धिजीवियों की ही तरह चीनी क्रान्ति ने मोहित सेन को भी वामपक्षीय विचार धारा की ओर मोड़ दिया। केम्ब्रिज में मौरिस डॉब जैसे मार्क्‍सवादी अर्थशास्त्री और एरिक हॉब्सबॉम और क्रिस्टोफर हिल जैसे इतिहासकारों के प्रभाव से भी वे उत्तरोत्तर कम्युनिस्ट पार्टी के निकट आते गये। बहुत वर्षों बाद मोहित सेन जब अपने कम्युनिस्ट दिनों को याद करते हैं, तो भारतीय मार्क्‍सवादी पंरपरा के बारे में एक बहुत ही मार्मिक टिप्पणी करते हैं, जो बाद के वर्षों में कम्युनिस्ट पार्टी के विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन गयी। वह लिखते हैं ”यहाँ यह कह देना जरूरी है कि उन दिनों किसी कम्युनिस्ट नेता ने हमारी युवा मानसिकता को स्वयं भारत की महान परंपराओं और बौद्धिक योगदान की ओर ध्‍यान नहीं दिलाया जो हमारे देश के क्रान्तिकारी आन्दोलन और मार्क्‍सवाद के विकास के लिए इतना उपयोगी सिद्ध हो सकता था…हम कम्युनिस्ट अधिक थे भारतीय कम।”

पी.सी. जोशी अवश्य इसका अपवाद थे। यह संयोग नहीं कि उनके नेतृत्व तले कम्युनिस्ट पार्टी पहली बार सिद्धान्तों से उठ कर हाड़-माँस की जनता के बीच आयी जिसके कारण उसकी लोक चेतना इतनी प्रशस्त हुई। उन्ही दिनों प्रगतिशील लेखक संघ, नाटय संस्था ‘ईप्टा’ और किसान सभाओं ने जनता के विभिन्न वर्गों को एक सुनिश्चित दिशा में अग्रसर होने के लिए संगठित किया। आश्चर्य नहीं, मोहित सेन बार-बार इस बात पर शोक प्रकट करते हैं, कि पचास के दशक में रणदिवे की घोर संकीर्ण नीतियों के कारण कम्युनिस्ट पार्टी ने उस विराट जन-मोर्चे को नष्ट हो जाने दिया, जिसे जोशी ने इतनी सूझबूझ के साथ निर्मित किया था। परिणाम यह हुआ कि बाद के वर्षों में कम्युनिस्ट पार्टी देश की मुख्य राष्ट्रीय धारा से कटती गयी और उसका प्रभाव सिर्फ इक्के-दुक्के प्रान्तों में सिमट कर रह गया। क्या इससे अधिक कोई आत्मघाती दृष्टि हो सकती थी कि स्वतंत्रता मिलने के वर्षों बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी एकमात्र ऐसी संस्था थी जो देश की आजादी को ”झूठी” और गांधी और नेहरू जैसे राष्ट्रीय नेताओं को ‘साम्राज्यवादी शक्तियों का एजेन्ट’ साबित करने मे एड़ी चोटी का पसीना एक करती रही! मोहित सेन बहुत पीड़ा से इस बात पर आश्चर्य प्रकट करते हैं, कि पार्टी स्वयं अपने देश के सत्तारूढ़ वर्ग के चरित्र के बारे में बरसों तक कोई स्पष्ट धारणा नहीं बना सकी थी। इसके कारण अपनी नीतियों में वह कभी घोर दक्षिणपंथी, कभी कट्टर संकीर्ण क्रान्तिकारी हो जाती थी। मोहित सेन के लिए यह बहुत प्रीतिकर अनुभव था, जब कुछ कम्युनिस्ट नेताओं ने जो वियतनामी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हो चि मिन्ह से मिल कर आए थे – उन्हें बताया कि हो चि मिन्ह ने उनसे गांधी और नेहरू की बहुत प्रशंसा करते हुए उन्हें बताया कि कैसे वियतनामी कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय मुक्तिसंग्राम के दौरान भारत के राष्ट्रीय नेताओं से प्रेरणा प्राप्त करती रही है।

लगता है अगस्त सन बयालीस के ‘भारत छोड़ो’ राष्ट्रीय आन्दोलन के औचित्य के बारे में मोहित सेन कुछ असमंजस में जान पड़ते हैं। यह सर्वविदित है कि सोवियत संघ पर जर्मन आक्रमण होने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के लिए युद्ध का चरित्र बदल गया था। जिसे पार्र्टी अभी तक ‘साम्राज्यवादी युद्ध’ कह कर कड़ा विरोध करती आयी थी, वही युद्ध रातों रात ‘जन युद्ध’ में परिणत हो गया था। मोहित सेन जहाँ पार्टी की राष्ट्रीय -विरोधी नीति के बारे में शंका प्रगट करते हैं, वहाँ दूसरी ओर एक महत्चपूर्ण प्रश्न भी उठाते हैं: क्या गांधीजी और कांग्रेसी नेताओं के जेल जाने के बाद देश में एक शून्य-भरी हताशा नही फैल गयी थी, जिसका दुरूपयोग अंग्रेजी सरकार ने मुस्लिम लीग के साथ मिल कर किया? अंग्रेजी सरकार का प्रश्रय पा कर अब मुस्लिम सांप्रदायिकता को खुल्लम खुल्ला भड़काया जा सकता था, ताकि कालान्तर में देश विभाजन के अलावा कोई दूसरा विकल्प न बचा रहे। क्या ऐसी विकट, नाजुक स्थिति में देश की राजनीति में कांग्रेस की निष्क्रियता देश के हितों के लिए घातक साबित नहीं होती थी?

इसके साथ ही मोहित सेन बहुत आश्चर्य और दु:ख के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तत्कालीन पाकिस्तान-समर्थक नीतियों की भर्त्सना भी करते हैं। धर्म के आधार पर देश के राष्ट्रीय-विभाजन का समर्थन मार्क्‍सवादी सिध्दान्तों के प्रतिकूल तो था ही, वह उन मुस्लिम राष्ट्रीय भावनाओं को भी गहरी ठेस पहुँचाता था, जो आज तक काँग्रेस और अन्य प्रगतिशील शक्तियों के साथ मिल कर मुस्लिम लीग की अलगाववादी नीतियों का विरोध करते आ रहे थे। मालूम नहीं, अपने को ‘सेक्यूलर’ की दुहाई देने वाली दोनो कम्युनिस्ट पार्टियां आज अपने विगत इतिहास के इस अंधेरे अध्याय के बारे क्या सोचती हैं, किन्तु जो बात निश्चित रूप से कही जा सकती है, वह यह कि आज तक वे अपने अतीत की इन अक्षम्य, देशद्रोही नीतियों का आकलन करने से कतराती हैं। आश्चर्य नहीं, कि अपनी पार्टी के इतिहास को झेलना पार्टी के लिए कितना यातनादायी रहा होगा, उसे लिखकर दर्ज करना तो बहुत दूर की बात है। मोहित सेन की पुस्तक यदि इतनी असाधारण और विशिष्ट जान पड़ती है, तो इसलिए कि उन्होने बिना किसी कर्कश कटुता के, किन्तु बिना किसी लाग-लपेट के भी अपनी पार्टी के विगत के काले पन्नों को खोलने का दुस्साहस किया है, जिसे यदि कोई और करता, तो मुझे संदेह नहीं, पार्टी उसे ‘साम्राज्यवादी प्रोपेगेण्डा’ कह कर अपनी ऑंखों पर पट्टी बाँधे रखना ज्यादा सुविधाजनक समझती; यह वही पार्टी है, जो मार्क्‍स की क्रिटिकल चेतना को बरसों से ‘क्षद्म चेतना’ (false consciousness) में परिणत करने के हस्तकौशल में इतना दक्ष हो चुकी है, कि आज स्वयं उसके लिए छद्म को ‘असली’ से अलग करना असंभव हो गया है।

जिन दो घटनाओं ने मोहित सेन के लिबरल-मार्क्‍सवादी विश्वासों को एक झटके से हिला दिया वे भारतीय पूर्व सीमा पर चीनी सेनाओं का आक्रमण और कालान्तर में चेकोस्लोवाकिया के समाजवादी देश पर सोवियत संघ और वार्सा देशों की सेनाओं का हिंसात्मक हस्तक्षेप थे। दोनों का लक्ष्य ही पाशविक शक्ति द्वारा समस्त अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों का खंडन करके स्वयं मार्क्‍स के मानव मुक्ति के आदर्श को

कुचलना था। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का चीन के आक्रमण को एक ‘प्रगतिशील कदम’ मानना वह निर्णायक क्षण था, जब पार्टी के बीच फूट अनिवार्य हो गयी। यह वह समय था जब अर्से से पार्टी के भीतर पकते फोड़े फूट कर ऊपर आ गये। कौन जानता था, कि जो पार्टी देश-विभाजन की भूमिका में इतना आगे रही थी, उसकी अदूरदर्शी अवसरवादिता एक दिन स्वयं उसे छोटे-छोटे दलों में विभाजित कर देगी। जो पार्टी बरसों से अपने ‘बाहरी दुश्मन’ का चेहरा न पहचान पायी, उसे क्या मालूम था, कि वह घुन की तरह उसके भीतर बैठा था, उसे इस हद तक खोखला बनाता हुआ कि जहाँ उसे नेहरू अपना वर्ग शत्रु जान पड़ता था, वहाँ ‘चेयरमैन माओ अपना चेयरमैन’ दिखायी देते थे!

मोहित सेन जैसे संवेदनशील व्यक्ति पार्टी की इन उलटवांसियों से अवश्य विक्षुब्ध होते थे, किन्तु इसका कारण कुछ नेताओं की गलतियों में ढँढ़ कर छुट्टी पा लेते थे। उन्होंने कभी गहरे में जा कर इसका कारण पार्टी के लेनिनवादी तानाशाही ढाँचे में नहीं खोजा जहाँ हर स्वाधीन आवाज को दबा दिया जाता था। न ही उन्होंने कभी पार्टी की चरम बौद्धिक दासता और सिद्धान्तहीन दिशाहीनता का निर्भीक आलोचनात्मक विश्लेषण किया जो उसे उत्तरोतर भारत की जन-चेतना से उन्मूलित करती गयी और अन्तत: उसे एक हाशिए की पार्टी बनाकर छोड़ गयी। क्या यह इतिहास की क्रूर विडम्बना नहीं थी कि जो पार्टी अपने को ‘किसान-मजदूर वर्गों’ का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी घोषित करती आयी थी, वह इस हद तक सैद्धान्तिक दिवालिएपन का शिकार हो गयी, कि संकट की हर निर्णायक घड़ी में वह कभी ब्रिटेन, कभी सोवियत संघ, कभी चीन की पार्टियों से मार्ग-निर्देशन पाने के लिए मुंह जोहने लगी। मोहित सेन का कम्युनिस्ट पार्टी से मोहभंग अवश्य हुआ, किन्तु कोई वे ऐसा वैकल्पिक रास्ता नहीं ढूंढ़ सके जो पार्टी के बाहर एक व्यापक जनवादी राष्ट्रीय मोर्चे का निर्माण करने में योगदान कर सके। यह करने के बजाय जो रास्ता मोहित सेन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने चुना, वह काँग्रेस से हाथ मिला कर पीछे मुड़ने का रास्ता था, जो अन्धी गली में जाता था। मोहित सेन भूल गये कि इन्दिरा की काँग्रेस वह नहीं है, जो कभी नेहरू और गांधी के लोकतांत्रिक आदर्शों को मूर्तिमान करती थी। यह एक विचित्र विरोधाभास था कि जब कम्युनिस्ट पार्टी नेहरू का साथ दे कर भारत की राष्ट्रीय चेतना को अधिक परिपक्व और व्यापक कर सकती थी, तब वह उसका विरोध कर रही थी और अब ऐसी घड़ी में जब काँग्रेस इन्दिरा गांधी के हाथ की कठपुतली बन चुकी थी, तब वह उसका जोर-शोर से समर्थन कर रही थी। आपात-काल के भीषण दिनों में यह विरोधाभास कितना तीखा और भयावह बन गया, मोहित सेन इसका वर्णन तो करते हैं, किन्तु इतनी कठोर परीक्षा के बाद भी इन्दिराजी के प्रति उनका सम्मोहन कम नहीं होता।

हम कितना अपने अतीत की गलतियों से सीखते हैं कहना मुश्किल है। शायद जीवन के हर चरण में नयी परिस्थितियों के बीच हम अपनी गलतियों को पुन: दुहराने के लिए अभिशप्त हैं। मोहित सेन की आत्मकथा से यह तो पता चलता है, कि सारी ऊंच-नीच के बावजूद मार्क्‍सवाद में उनकी आस्था अटूट बनी रहती है, किन्तु दुनिया का कम्युनिस्ट आन्दोलन मानव-मुक्ति के मार्क्‍सवादी आदर्श के लिए कितना घातक सिद्ध हुआ है, इसके बारे में वह कुछ नहीं कहते। समाजवाद के मानवीय आदर्शों को सोवियत संघ की स्तालिनवादी नीतियों और उसके नेतृत्व में चलनेवाली कम्युनिस्ट पार्टियों ने कितना विकृत और कलुषित किया है, मोहित सेन इस बारे में भी चुप रहते हैं। हम सिर्फ आशा कर सकते है, कि मोहित सेन ने अपनी आत्मकथा में जो रिक्त स्थान छोडे हैं, उन्हें कभी कोई कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी भविष्य में भर सकने का साहस और विवेक जुटा पाएगा।

A Traveller and the Road –

The Journey of an Indian Communist – Mohit Sen

(त्रैमासिक पत्रिका चिंतन-सृजन से साभार)

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