गौरा देवी
गौरा देवी

26 मार्च 1974 की सर्द सुबह…सूरज पहाड़ पर चढ़ रहा था…चमोली जिले के रैणी गांव में भले ही सूरज की तपिश कम थी लेकिन यहा के जंगलों एक क्रांति धधकने को तैयार थी…रैणी गांव में उस वक्त पुरुष अपने कामकाजड के लिए घरो से निकल चुके थे..घरो में बची थी तो बस महिलाएं…वो भी किसी आंदोलन की आहट से बिल्कुल बेखबर थी…इसी दौरान पेड़ों के कटान के लिए मजदूर और वन विभाग के कर्मचारी जोशीमठ से रैणी गांव की तरफ बढ़ रहे थे… रैणी से पहले ही सब उतर गये और चुपचाप ऋषिगंगा के किनारे-किनारे फर, सुरई तथा देवदारु आदि के जंगल की तरफ बढ़ने लगे..सुबह के समय रैणी गांव की एक लड़की ने यह हलचल देखी और पूरी बात महिला मंगल दल की अध्यक्ष गौरा देवी को बताई…गौरा ने आनन फानन में गांव की 27 महिलाओं को इकट्ठा किया और वनों को बचाने के लिए जंगल की तरफ चल पड़ी…तब तक मजदूर पेड़ों के पास पहुंच चुके थे…कटान के लिए हथियारों को पैना कर रहे थे…इतनी महिलाओं को एक साथ  देखकर मजदूर सकपका गए…वन विभाग के कर्मचारी और ठेकेदार मजदूरों के साथ खड़े हो गए…और महिलाओं को वहां से जाने के लिए कहने लगे…महिलाएं नहीं झुकी…ठेकेदारों ने महिलाओं को धमकाना शुरू कर दिया…लेकिन महिलाएं नहीं मानी…डेढ़-दो घंटे बाद भी जब हालात नही बदले तो मजदूरों को पेडों पर कुल्हाड़ी चलाने  के आदेश मिल गए…ऐसे में फौरन गौरा देवी और उनकी साथी महिलाओं ने मजदूरों से कहा कि- ‘यह जंगल भाइयो, हमारा मायका है.. इससे हमें जड़ी-बूटी, सब्जी, फल, लकड़ी मिलती है। जंगल काटोगे तो बाढ़ आयेगी। हमारे बगड़ बह जायेंगे। खेती नष्ट हो जायेगी.. खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो…जब हमारे मर्द आ जायेंगे तो फैसला होगा…’मजदूर असमंजस में थे.. लेकिन ठेकेदार और जंगलात के कारिंदे उन्हें डराने-धमकाने लगे…महिलाओं को गिरफ्तार करने और कानूनी पचड़े में उंसने की धमकी देने लगे…यहा तक कि महिलाओं को डराने के लिए बंदूक भी निकाल दी गई…लेकिन इन हरकतों से महिलाओं में डर फैलने की बजाए उनका आत्मविश्वास और ज्यादा बढ़ गया…डरन की बजाए गौरा देवी गरजने लगी…और बंदूक के आगे खुद को खड़ा कर लिया…. बंदूक अपने सीने पर रखकर गौरा ने कहा-‘‘मारो गोली और काट लो हमारा मायका’’…गौरा की गरजती आवाज सुनकर मजदूरों में भगदड़ मच गई…देखते ही देखते सभी महिलाएं आस पास के पेडों पर चिपक गई और मजदूरों को उन पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने के लिए ललकारने लगी…महिलाओं का साहस देखकर मजदूर पीछे हटने लगे..कुछ मजदूर नीचे की तरफ भागने लगे…वन विभाग के कर्मचारियों और ठेकेदारों में हड़कंप मच गया…मजदूरों की दूसरी टोली को गांव में और जंगल की तरफ आने से रोक दिया गया…ऋषिगंगा नदी पर बना पुल महिलाओं ने तोड़ दिया गया ताकि मजदूर जंगल की तरफ न आ सकें…गौरा देवी अपनी साथी महिलाओं के साथ उसी साहस से वन मे डटी रही जब तक कि थक हारकर वन विभाग के कारिंदे और ठेकेदार सभी जंगल से वापस नहीं लौटे…इस तरह गौरा देवी सके साहस से रैणी की महिलाओं का मायका बच गया और प्रतिरोध की सौम्यता और गरिमा दुनियाभर में मिसाल बन गई…इसे चिपको आंदोलन नाम दिया गया…चिपको आंदोलन उत्तराखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर देश दुनिया में सुर्खियों में आ गया…

 

रैणी के जंगलों में की जो चिनगारी सुलगी थी उससे पर्यावरण बचाने के लिए एक नया इतिहास रचा जा चुका था..हर तरफ गौरा और उनके चिपको आंदोलन तकी चर्चा थी…चिपको शब्द आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है…लेकिन उस साल यानि 1974 में चिपको आंदोलन के पीछे तेजी से कुछ घटनाएं हुई थी…जनवरी 1974 में रैंणी जंगल के 2451 पेड़ों की नीलामी की बोली देहरादून में लगने वाली थी..लेकिन पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट के विरोध के चलते वनों के कटान का कड़ा प्रतिरोध हुआ… जोशीमठ से लेकर गोपेश्वर तक रैंणी जंगल के कटान के खिलाफ प्रदर्शन हुए….आन्दोलनकारी गाँव-गाँव घूमे, जगह-जगह सभाएँ हुईं…बावजूद इसके प्रशासन, वन विभाग और ठेकेदार की मिलीभगत से अन्ततः जंगल काटने आये मजदूर रैणी पहुँच गये…लेकिन उस दिन 1962 में सड़क बनने से कट गए खेतों का मुआवजा लेने गांव के सारे पुरुष चमोली चले गए…लेकिन कोई नही जानता थ कि रैणी की महिलाएं पेड़ों के साथ अपने फर्ज और रिश्ते को निभाएंगी और जान का बाजी लगाकर अपने जंगलों को बचा लेंगी….26 मार्च की साहसिक घटना के बाद रैणी की महिलाओं की जीत हुई..उनका मायका यानि रैणी का जंगल बच गया….इस घटना के बाद अगले कई दिन तक प्रदर्शन हुए…बारी बारी से जंगल की निगरानी की गई…डीएफओ से वार्ता हुई…7 अप्रैल और 11 अप्रैल को राज्यव्यापी प्रदर्शन हुए…रैणी की गौरा की गूंज राज्यभर में सुनाई दे रही थी..राज्य सरकार को फैसला लेना पड़ा कि राज्य के जंगल बचाए जाएंगे…

 

शायद यह  गौरा देवी के आंदोलन का ही नतीजा है कि वनों के संरक्षण के प्रति उत्तराखंड मे नई चेतना भर गई…चंडी प्रसाद भट्ट, सुंदरलाल बहुगुणा जैसे पर्यावरणविदों ने गौरा देवी के शुरू किए आंदोलन को राज्य ही नहीं देश के कोने कोने तक पहुंचाया…..आज उत्तराखण्ड वन बहुल राज्य है ..राज्य का 45 फीसदी भूभाग वनों से आच्छादित है..हिमालयी चोटियों को मिला दें तो कुल भौगौलिक क्षेत्रफल का 65 प्रतिशत भाग वन भूमि है….फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 24240 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है… राज्य में 2,089 वन पंचायतें वन क्षेत्र का प्रबंधन कर रही हैं..और अगर आज हम वन संपदा को उतच्तराखंड की धनसंपदा मानकर चलते है तो इसके पीछे गौरा देवी का सराहनीय प्रयास एक बड़ा कारण है..

1 thought on “चिपको आंदोलन के 46 साल

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