चिराग पासवान इन दिनोे काफी उद्धगिन मालुम पड़ रहे

वीरेन्द्र सिंह परिहार

केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान और उनके सांसद बेटे चिराग पासवान इन दिनोे काफी उद्धगिन मालुम पड़ रहे है । नतीजा यह है कि वह केन्द्र सरकार के बिरूद्ध पूरी तरह बिद्रोही मुद्रा में दिखाई पड़ रहे हैं । चिराग पासवान को केन्द्र सरकार को यह चेतवनी भी दे चुके है कि सर्वोच्य  न्यायालय के रिटायर्ड जस्टिस आदर्श  कुमार गोयल जिन्हे एनजीटी का अध्यक्ष बनाया गया है उन्हें  तत्काल हटाया जायें । उसकी वजह यह बताई जा रही है कि अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम 1989 को जिस फैसले के द्वारा बदलाव किया गया उस बेंच मे श्री गोयल भी शामिल थे। शायद पासवान जैसे लोगों  का यह मानना हो कि इस तरह का फैसला देकर आदर्श  कुमार गोयल और दूसरे जस्टिसों ने अपने आप को अनुसूचित जाति – जनजाति विरोधी सिद्ध कर दिया है,इस लिए उन्हे किसी भी संबैधानिक पद पर बैठने का अधिकार नही है। जबकि असलियत मे उस फैसले का निहितार्थ मात्र यह था कि उपरोक्त अधिनियम (एस.टी.एस.सी.) के माध्यम से भारतीय संबिधान की मूल अवधारणा समानता के सिद्धान्त का हनन हो रहा था । सबसे बडी बात कि इससे प्राकृतिक न्याय का हनन हो रहा था। यानि की मात्र सही-झूठी कैसी भी शिकायत कर दिये जाने पर इस अधिनियम मे बगैर किसी जाॅच-पड़ताल के ही एस.सी.-एस.टी. से इतर जातियों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता था । बिडम्बना यह कि इसमें अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं था। वस्तुतः कई सर्वेक्षण और उदाहरण यह बताने को पर्याप्त थे कि इस ऐक्ट का कुछ एैसा ही दुरूपयोग हो रहा था जैसे स्त्रियों के मामले मे दहेज उत्पीड़न से संबंधित कानून का हो रहा था । दहेज- उत्पीड़न के कानून को लेकर जब सर्वोच्च ने दखलनन्दाजी करते हुए उसे सम्यक और न्यायपूर्ण बनाया तो देश  की स्त्रियां  कही भी उसके खिलाफ सड़को मे नही आई, क्योकि वह सर्वथा एक सही कदम था। पर वही रवैया एस.सी-एस.टी. ऐक्ट के बारें मे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जब न्यायपूर्ण एवं औचिंत्य पूर्ण बनाया गया तो पासवान जैसे नेताओं के पहल के चलतें एस.सी-एस.टी. वर्ग के लोग सड़को मे आ गयें -जिसके चलते व्यापक पैमाने पर तोड़-फोड़ और हिंसा हुई। पर रामविलास पासवान और उनके बेटे चाहते है यदि इस ऐक्ट को मूल रूप मे नहीं लाया जाता तो एक  विशेष  समुदाय के लोग पूरे देश  में आराजक्ता की स्थिति लाते हुए कहर बरपा दें और आदर्श  कुमार गोयल जैसे न्यायधीशों को फाॅसी पर लटका दिया जायें । रामविलास पासवान केन्द्रीय, मंत्रीमंडल मे है, उन्होंने  ने संविधान की शपथ ली है,कि वह सबके प्रति, समान दृष्टिकोण रखेंगे,संविधान का आदर करेंगे । परन्तु एैसा लगता है कि पासवान जैसे लोग मात्र एक वर्ग के उचित-अनुचित हितो का ध्यान रखने के लिए कटिबंद्ध हैं । उनकी न्यायपालिका के प्रति भी कोई निष्ठा नहीं है । उनके अनुसार न्यायपालिका को उनकी सोच के अनुसार चलना चाहिए और उनका वोट बैंक सुरिक्षित रखने कें लिए देश  में विभेदकारी कानूनों केा प्रश्रय देना चाहिए । यही कारण है कि आयें दिन सामाजिक ताना-वाना नष्ट हो रहा है । आरक्षण के मुद्दे पर कई प्रभावशाली और ताकतवर जातिया अब यथास्थिति को मानने को तैयार नहीं हैं। वह भी आरक्षण की मलाई खाने को कटिबद्ध दिखाई देती है । चाहे वह हरियाणा में जाट हों ,राजस्थान में गूजर हों,आन्ध्रप्रदेश  में कापू हों,गुजरात में पार्टीदार हों,या महाराष्ट्र मे मराठा हों । लाख टके की बात यह कि जब रामविलास पासवान जैसे सक्षम और विशेशाधिकार सम्पन्न लोग आरक्षण का लाभ लें रहें हो,तो प्रभावशाली जातियां आरक्षण में हिस्सेदारी  क्यों न  मांगे ? एैसी स्थिति मे यदि कहा जायें कि आरक्षण का पैमाना आर्थिक स्थिति हों, क्योकि सामाजिक पैमाने का अब कोई बहुत मतलब नही रह गया है तो रामविलास पासवान जैसे लोग सिर मे आसमान उठा लेंगे कि यह संविधान विरोधी कदम होगा । जबकि बाबा साहब अम्बेडकर ने इसका प्रावधान मात्र दस वर्षो के लिए किया था। रामविलास पासवान जैसे  लोगों  को यह भी पता होना चाहिए कि वह मात्र एक वर्ग के वोटों  के आधार पर संसद मे चुनकर नहीं आतें और अन्य जातिया यदि उनके विरोध में  खड़ी हो गईं तो वह सड़कों पर आ जायेंगे । इसलिए उनके लिए यही बेहतर होगा कि वर्ग विशेष  को भड़काने के बजाय ‘‘सर्वजन सुखाय,सर्वजन हिताय’’ की राजनीति करें ।

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