दरवेश का चोला पहनने से डाकू- संत नहीं हो जाते…

लगता है कि आदरणीय मुकेश धीरूभाई अम्बानी को बोधत्व प्राप्त हो गया है. देश के सबसे बड़े रईस और रिलायंस इंडस्ट्रीज के सर्वेसर्वा श्री मुकेश अम्बानी ने गत मंगलवार {१ मार्च-२०११}को नई दिल्ली में फिक्की {फेडेरशन ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज} के ८३ वें अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए जो आप्त वाक्य कहे वे उन्हें भारतीय इतिहास में अमरत्व प्रदान करने के लिए काफी हैं. उपस्थित तमाम दिग्गज पूंज ीपतियों को सम्बोधित करते हुए मुकेश भाई ने कहा कि ’अब वक्त आ गया है कि हम पूंजीपति लोग – सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वहन को अपने एजेंडे में शामिल करें’ उन्होंने व्यवसाय, काराबोर और कार्पोरेट सेक्टर को जन-सरोकारों से जोड़ने कि बात कहकर न केवल उद्द्योग जगत बल्कि देश और दुनिया के वामपंथी विचारकों को भी आश्चर्य चकित कर दिया है.

मुकेश अम्बानी ने अमीर भारत और गरीब भारत के बीच की बढ़ती जाती खाई की ओर उपस्थित उद्योगपतियों का ध्यानाकर्षण करते हुए आह्वान किया कि वे इन दोनों -शाइनिंग इंडिया और निर्धन भारत को जोड़ने के लिए काम करें . उन्होंने कहा- ’कारोबार का एकमात्र उद्देश्य मुनाफा ही नहीं होना चाहिए’ मुकेश भाई ने कहा -सिर्फ कार्पोरेट सामाजिक जबाबदेही{सी एस आर} कि जगह अब सतत सामाजिक सरोकार {continuous socail business }के म� �डल को अपनाया जाना चाहिए. सामाजिक जबाबदेही के साथ वित्तीय जबाबदेही भी जरुरी है. किसी कारोबार का एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना ही नहीं होना चाहिए. जब तक लाखों लोगों के जीवन को बदलने वाले व्यापक उद्देश्य के साथ कारोबार नहीं किया जायेगा- कोई भी कारोबार सतत नहीं चल पायेगा.

उन्होंने देश के दो पहलुओं पर रोशनी डालते हुए कहा -एक तरफ तो उद्द्योग जगत को भारी लाभ हो रहा है और दूसरी ओर ऐसे करोड़ों लोग हैं जो मूल भूत सुविधाओं -स्वच्छता ,पीने का पानी ,स्वास्थ सेवाओं से महरूम हैं.

मुकेश भाई ने कहा” कि देश कि प्रति-व्यक्ति आय १००० डालर से कम है, जो कि चीन के एक तिहाई से भी कम है. उन्होंने भारतीय मध्यम वर्ग को विराट संभावनाओं का कारक बताते हुए कहा कि यदि एक अरब से ज्यादा विपन्न लोग असंतुष्ट हैं, तो बाकि के संपन्न लोग खुशहाल कैसे रह सकते हैं? भारत कि विकास गाथा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक देश के करोड़ों लोगों को प्रगति में भागीदार नहीं बनाया जाता.”

जहां तक मुकेश अम्बानी का इंडिया और भारत के बीच खाई पाटने कि सद- इच्छा का सवाल है तो उसका हमें सम्मान करना चाहिए. किन्तु एक अज्ञात भय भी है कि उस कुत्सित विचार का क्या होगा? जो सुनील मित्तल भारती ने इसी फोरम में ,वर्ष -२००८ में व्यक्त किया था . तब माननीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंग जी के समक्ष उनके इस आग्रह पर कि उद्योग जगत को देश के गरीबों का भी ध्यान रखना चाहिए ,निजी क्षेत्र मे उच्च पदों पर ज्यादा आकर्षक वेतन देने से सरकारी क्षेत्र पर दवाव पड़ता है, आप सी ई ओ लोगों को भारी भरकम वेतन नहीं लेना चाहिए ,वगेरह -वगेरह .सुनील मित्तल भारती ने तब तपाक से उत्तर दिया ”कि हम यहाँ व्यापार के माध्यम से मुनाफा कमाने आये हैं जन सरोकारों या जनता कि परेशानियों से हमें कोई लेना-देना नहीं” सुनील मित्तल भारती के इस कटु वक्तव्य से तब मुझे बहुत बुरा लगा था तत्काल एक आलेख  उनके अमर्यादित व्यवसायिक सरोकारों पर मैनें लिखा था -जिसका तात्पर्य यह था कि भारतीय लोकतंत्र पर पूंजीपतियों का कब्जा कराने में सिद्धहस्त श्री मनमोहन सिंग जी को एक नव-धनाड्य पूंजीपति के आगे इस तरह असम्मानित होना स्वीकार नहीं करना चाहिए .लोकतंत्र के लिए यह उचित सन्देश नहीं है.लगता है कि सुनील मित्तल भारती ने माल्थस ,एडम स्मिथ और कीन्स को पढ़े बिना ही कार्पोरेट जगत में कुछ उसी � ��रह से अवसरों को भुना लिया जैसे कि युद्धकाल में वेइमान बनिया कमाता है.

आज श्री मुकेश अम्बानी और श्री सुनील मित्तल भारती दोनों ही भारत के दिग्गज पूंजीपति हैं. दोनों ने खूब धन कमाया. दोनों का राजनीती और समाज पर अपनी-अपनी हैसियत का प्रभाव है ,किन्तु दोनों के विचारों में दो विपरीत ध्रुवों जैसा अंतर क्या दर्शाता है? मित्तल का दर्शन है ”मुनाफा और केवल मुनाफा” उसका परिणाम होगा शोषित आवाम का विद्रोह या जन-क्रांति .

मुकेश अम्बानी ने जो जन-कल्याणकारी कार्पोरेट कल्चर कि पैरवी की है वो नयी नहीं है .विगत कुछ महीनों पहले अमेरिकी पूंजीपति बिल गेट्स ने ,वारेन बफेट ने अपनी सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा जन सरोकारों में लगाने का ऐलान किया था .उनका कहना था कि जो जहां से लिया वो वहां वापिस तो नहीं किया जा सकता किन्तु उसका आंशिक तो लौटाया ही जा सकता है. भारत के अजीम प्रेमजी भी इस विषय में पहल कर चुके हैं .इससे पह ले भारत के स्थापित पूंजीपतियों -बिडला ,टाटा और अन्य पूंजीपतियों ने भी ”दान” और ’लोक- कल्याण ’ कि परम्परा में सदियों से अपनी भागीदारी जारी रखी थी.

जिस देश में इतने दूरदर्शी और घाघ पूंजीपति होंगे वहां जनता का जनाक्रोश समय-समय पर दान -दक्षिणा के नाम पर निसृत होते रहने से किसी तरह कि बगावत या क्रांति कि संभावना नहीं रहेगी . .भारत और अमेरिका में इसी वजह से क्रांति कि संभावनाएं वैसी नहीं वन पा रही हैं जैसी कि सोवियत संघ ,चीन ,क्यूबा ,वियेतनाम या कोरिया में बनी थीं .आज अरब राष्ट्रों में क्रांति के नाम पर जो बबाल मच रहा है उसका करण भी वही व्यवस्था जनित आक्रोश है .चूँकि वहां के पूंजीपति और शासक वर्ग सुनील मित्तल भारती कि तरह जनता के सरोकारों को अपने व्यापारिक और प्रबंधकीय सरोकारों से अपडेट नहीं कर पाए अतः वे जनता के हाथों पिट रहे हैं ,देश कि सत्ता और लूटी गई सम्पदा का अधिकार भी उनसे छीना जा रहा है. भारत में जब तक मुकेश अम्बानी जैसे लोग अथाह पैसा कमाते हुए गरीब जनता का मुंह बंद करने के लिए तथाकथित जनकल्णकारी सरोकारों कि पैरवी करते रहेंगे तब तक जनाक्रोश सघन नहीं हो पायेगा , जब तक जनाक्रोश सघन नहीं होगा तब तक आर्थिक-सामाजिक और राजनैतिक क्रांति कि संभावनाएं भी क्षीण रहेंगी . अस्तु! मुकेश अम्बानी के वक्तब्य को एक घाघ पूंजीपति की वर्तमान वैश्विक परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में भारत कि निर्धन जनता को निरंतर कष्ट उठाते रहने , शांति बनाये रखने ,क्रांति से दूर रहने, इंडिया बनाम भारत म मेल -मिलाप बनाये रखने , और पूंजीपतियों को राज्य सत्ता का कृपा- भाजन बनाये रखने में देखा जाना चाहिए.

9 thoughts on “दरवेश का चोला पहनने से डाकू- संत नहीं हो जाते…

  1. श्रीराम तिवारी अपने आलेख को प्रमुखता से तत्काल प्रकाशित होते देख फुले नहीं समाये| अब उन्हें प्रवक्ता.कॉम पर विकास कुमार द्वारा प्रस्तुत लेख, ईंट भट्ठों की तपिश में मजबूर होते मजदूर भी पढ़ लेना चाहिए| जनवादी साहित्यकार एवं ट्रेड यूनियन संगठक समझ जायेंगे कि डाकू भी भांति भांति के होते हैं| जब उनमें दया और देशप्रेम जागता है तो कभी कभी उनकी सोयी आत्मा भी जाग जाती है| अब समस्या यह है कि सभी में दिखावे के दया और देशप्रेम हैं लेकिन मालुम नहीं उनकी आत्मा कब जागेगी| भारत में समाजवाद के शुरू से ही ट्रेड यूनियन का बोलबाला रहा है| यदि स्वतंत्रता की चौंसठ वर्षों पश्चात विकास कुमार के मज़दूर मजबूर हैं तो कुछ हद तक ट्रेड यूनियन भी दोषी है|

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  2. वैसे तो मैं सदैव व्यक्तिगत रूप से ऐसे लेख के पीछे छिपे व्यवहार के विरुद्ध रहा हूँ लेकिन यहाँ उल्लिखित दरवेश के बारे में मेरी जिज्ञासा ने मेरा इस ओर ध्यान बांटा है| व्यवसाय से डाकू हो या संत फेडेरशन ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के ८३ वें अधिवेशन में कहे वक्तव्य और उनका समर्थन पूंजीपतियों को एक नई श्रेणी में ला खड़ा करते हैं और मैं उनका सह्रदय स्वागत करता हूँ| जब कोई कार्य समाज और राष्ट्र के हित में होता है तो उसका लाभ अप्रतक्ष्य रूप से जनता को ही प्राप्त होता है| संभवत: आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रधर्म ने भारतीय पूंजीपतियों में एक अनूठी जागृति विद्यमान की है| अब समय आ गया है कि पूंजीपतियों और उद्योग संगठनों में ईट-कुत्ते का व्यवहार समाप्त हो और राष्ट्रसेवा-धर्म-प्रधान दोनों देश के हित का सोचें|i

  3. भाई संजीव जी और प्रवक्ता टीम को मेरे इस आलेख को प्रमुखता से तत्काल प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद .आलेख के साथ मेरे नाम का उल्लेख नहीं हो सका है कृपया इसे दुरुस्त करें ……श्रीराम तिवारी
    जनवादी साहित्यकार एवं ट्रेड यूनियन संगठक
    १४- डी /एस-४ स्कीम -७८
    { अरण्य}विजयनगर .इंदौर ,एम् पी.

  4. कम से कम सुनील भारती मित्तल को ईमानदार इसलिए कहा जा सकता है की उन्होंने एक व्यापारी की सच्ची भावनाओं से सभी को अवगत करा दिया, यह सच है की अतीत में कुछ जाने माने व्यापारी (उद्योगपति) मंदिर बनवाते रहे दान धर्म करते रहे लेकिन कदाचित उनका उद्देश्य भी दान दक्षिणा के द्वारा अभावग्रस्त जनता को शांत रखना ही रहा होगा, इस घाघ रवैये के कारण ही आज तक भारत की जनता चुप रही है, वाकई में यह पूंजीपतियों का शानदार कारनामा कहा जा सकता है.

  5. इस खोज परख आलेख से वर्तमान दौर के पूंजीवादी चरित्र का खुलासा होता है, फिर भी यदि मुकेश अंबानी भारतीय समाज के पूंजीपति और सर्वहारा वर्ग की खाई को पाटना चाहते हैं तो इसमे क्या बुराई है.

  6. MUKESH JI KO KAHTAI HUA SHARAM NAHI ATI, INKA GHAR KA BIJLI KA BILL HI 70LAKH RS MAHINA HAI………………….

    MUKESH JI, BILL GETS-अजीज प्रेम JI साईं कुछ सीखो……………………………………

  7. क्या कहने अम्बानी साहब ! आप को भी सामाजिक सरोकार याद आ ही गए चलो अच्छा है लेकिन कुछ करना तो शुरू करो , हम सुन तो कब से रहे है |

  8. सुख का मुल धर्म है. धर्म का अर्थ, और अर्थ का राज्य. जब तक राजनीति ठीक नही होगी, जब तक शाषक तथा जब तक आम जन-मानस व्यवसायी नीजि क्षेत्र को सम्मान की नजरो से नही देखता, तब तक फिर वही पुरानी व्यवस्था जिसमे व्यवसायी अपनी कमाई मे समाज का भी हिस्सा निकालता था, उसका पुनर्जागरण नही हो सकता. इस दिशा मे अम्बानी ने सही पहल की है. लेकिन इस बात को पश्चिम के CSR की नकल की बजाय परम्परागत धार्मिक ढंग से उठाया जाय तो ज्यादा कारगर सिद्ध होगा.

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