किसी जमाने में एक शायर हुआ करते थे अकबर इलाहबादी। पेशे से तो वे न्यायाधीश थे; पर उनकी प्रसिद्धि उनकी चुटीली शायरी से अधिक हुई। उनका एक प्रसिद्ध शेर है –

जूता बाटा ने बनाया, मैंने इक मजमूं लिखा

मेरा मजमूं चल न पाया और जूता चल गया।।

अब प्रश्न उठता है कि आज जूते जैसी नामुराद चीज को याद करने का कारण क्या है ? जूता और उसके बिरादर सैंडल, चप्पल, स्लीपर या खड़ाऊं आदि ऐसी चीज हैं, जिसे भले लोग घर से बाहर ही रखना पसंद करते थे; पर अब आधुनिक समय में जूते ने घर के बिल्कुल अंदर तक जगह बना ली है। शौचालय से लेकर भोजनालय तक एक ही चप्पल काम दे जाती है। साम्यवाद का इससे अच्छा उदाहरण मिलना असंभव है।

जूते को सबसे अधिक प्रतिष्ठा त्रेतायुग में भरत जी ने दिलाई थी। राम जी के वन जाने पर वे भी उनके पीछे-पीछे वहां पहुंच गये। जब उनके बहुत आग्रह पर भी राम जी ने लौटने से मना कर दिया, तो भरत जी ने उनसे खड़ाऊं ही मांग ली। राम जी ने इसके लिए मना नहीं किया और भरत जी ने उन्हें सिर पर धारण कर लिया। तुलसी बाबा ने लिखा है –

प्रभु कर कृपा पांवरी दीन्ही, सादर भरत सीस धरि लीन्ही।।

आज भी भाइयों के बीच के प्रेम के लिए राम और भरत का नाम लिया जाता है। निःसंदेह इसमें उन खड़ाऊं की भी बड़ी भूमिका थी।

सतयुग और द्वापरयुग में जूते की चर्चा नहीं मिलती। यद्यपि कुछ जूताप्रिय कवियों ने इधर-उधर से खोजकर कुछ पंक्तियां लिखी हैं। धर्मवीर ‘सबरस’ अपने दुमदार दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। द्रोणाचार्य और एकलव्य के प्रसंग में वे चप्पलों को भी ले आये –

दक्षिणा में निज शिष्य से लिया अंगूठा मांग

गलती की गुरु द्रोण ने लेते दोनों टांग।

साथ में चप्पल मिलती।।

कलियुग का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। फिर भी शुरू के पांच हजार साल इस बारे में मौन हैं; लेकिन पिछले कुछ सालों में बड़े-बड़े नेताओं पर जूते फेंके गये हैं। इससे उन नेताओं के साथ जूते को काफी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। बराक ओबामा, जार्ज बुश, टोनी ब्लेयर, जॉन हावर्ड, वेन जियाबाओ, आसिफ अली जरदारी, परवेश मुशर्रफ से लेकर भारत में पी.चिदंबरम्, उमर अब्दुल्ला, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, मणिशंकर अय्यर, मनमोहन सिंह आदि इसी श्रेणी के नेता हैं। सुना है जब ऐसी घटनाएं बहुत बढ़ गयीं, तो किसी खरदिमाग ने एक जूता-नेता क्लब बनाने का प्रस्ताव रखा था। उसका कहना था कि किसी समय जेल जाने से नेता जी को प्रसिद्धि मिलती थी। अब यह काम जूते के जिम्मे आ गया है; पर दुर्भाग्यवश उसकी यह अनुपम योजना सिरे नहीं चढ़ सकी।

हमारे प्रिय शर्मा जी इस मामले में बड़े व्यावहारिक आदमी हैं। एक बार उन्हें भी चुनाव लड़ने का भूत सवार हुआ था; लेकिन पहली ही सभा में उन पर जूता फेंक दिया गया। शर्मा जी इससे घबराये नहीं। उन्होंने अपने सभी पर्चों में इस आग्रह के साथ अपने पैर का नाप भी छपवा दिया कि जिसे फेंकना हो, वह दोनों पैरों के लिए चप्पल या जूता फेंके; पर उनकी अपील बेकार गयी। लोगों ने न उन्हें वोट दिया और न ही जूते-चप्पल। महीने भर उन्होंने गली-गली घूम कर जो जूते घिसे, वे भी बेकार गये।

लेकिन अब ताजी खबर ये है कि पाकिस्तान में बंद कुलभूषण जाधव की मां और पत्नी को जब उनसे मिलवाने का नाटक किया गया, तब उनके जूते उतरवा लिये गये। उन्हें संदेह था कि उसमें कोई जासूसी उपकरण छिपा हो सकता है। वापस आते समय जूते वापस भी नहीं किये गये। सुना है कि कई बड़े पाकिस्तानी वैज्ञानिक उन जूतों में घुसे हुए हैं; पर अब तक उन्हें कुछ नहीं मिला।

मैंने शर्मा जी से पूछा, तो वे इसी बात पर बहस करने लगे कि कुलभूषण की मां और पत्नी ने जूते पहने था या जूती ? मैंने कहा कि कमीज, पैंट, कुर्ता, पजामा आदि सैकड़ों चीजें हैं, जिन्हें दोनों प्रयोग करते हैं। इसलिए पुरुष पहने तो पुल्लिंग और स्त्री पहने तो स्त्रीलिंग; पर शर्मा जी की समझ में ये नहीं आया।

इस बात को कई दिन हो गये; पर शर्मा जी को इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला। उन्होंने कई शब्दकोश देख डाले हैं। सुना है अब वे पुरानी किताबों के बाजार में ‘जूताकोश’ की तलाश में है।

अकबर इलाहबादी ने जूता चलने की बात लिखी थी; पर मुझे लगता है कि हमारे शर्मा जी का तो दिमाग ही चल गया है। वह कब तक और कहां तक चलेगा, ये उन्हें पता होगा या ‘जूता जासूस’ की खोज में लगे पाकिस्तान वालों को।

– विजय कुमार

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