ऐलौपैथी चिकित्सा-शिक्षा का नया संकट

प्रमोद भार्गव
जब मैंने इंजीनियरिंग और एमबीए कॉलेजों में सीटों के खाली रहने और फिर कई कॉलेजों के बंद होने की खबरें पढ़ी थीं, तो सच कहूं मुझे सुकून मिला था। इंजीनियर और एमबीए की उपाधि लेकर विद्यार्थी चपरासी लिपिक और सिपाही बनने के लिए अर्जियां दें, तो ऐसी दीर्घकालिक और महंगी शिक्षा का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इधर थोड़ी बेचैन करने वाली खबर मेडिकल चिकित्सा क्षेत्र से आई है, जो चौंकाने वाली है। चिकित्सकों को उपचार की विशेषज्ञता  हासिल कराने वाले स्नातकोत्तर पाठयक्रमों में कई सैकड़ा सीटें खाली रह गई हैं। निचले स्तर पर डिग्रीधारियों के लिए नौकरियों में कमी की बात तो समझ में आती है, कोई एमबीबीएस चिकित्सक बेरोजगार हो, यह जानकारी भी नहीं मिलती ! फिर क्या पीजी पाठ्यक्रमों में पदों का रिक्त रह जाना, निपुण छात्रों का टोटा है, या फिर छात्र स्वयं गंभीर पाठ्यक्रमों से दूर भाग रहे हैं। या फिर चिकित्सकों के सम्मान में जो कमी आई है और अस्पतालों में उन पर इलाज में लापरवाही का लगाकर हमले हो रहे हैं, उस भय की वजह से छात्र पीछे हट रहे हैं। अथवा भारतीय चिकित्सा  परिषद के विधान में संसोधन कर वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े चिकित्सकों को एक सेतु-पाठ्यक्रम के जरिए ऐलौपैथी चिकित्सा करने की जो छूट दिए जाने की कवायद चल रही है, उसकी वजह, सीटों का रिक्त रह जाना है।
जब कोई एक प्रचलित व्यवस्था संकट में आती है, तो कई संदेहास्पद सवालों का उठना लाजिमी है। क्योंकि मेडिकल चिकित्सा के पीजी पाठ्यक्रमों में खाली सीटें रह जाने के जो आंकड़े आए हैं, वे चिंताजनक हैं। इस साल सल्य चिकित्सक हृदय (कॉर्डियक) में 104, हृदयरोग विशेषज्ञ  55, बालरोग विशेषज्ञ  87, प्लास्टिक सर्जरी 58, स्नायु-तंत्र विशेषज्ञ (न्यूरोलॉजिस्ट)-48 और स्नायुतंत्र सल्यक्रिया विशेषज्ञों की भी 48 सीटें रिक्त रह गईं। फिलहाल इस कमी के दो कारण गिनाए जा रहे हैं। एक तो यह कि इन पाठ्यक्रमों की प्रवेष परीक्षा के लिए योग्य अभ्यर्थी पर्याप्त संख्या में नहीं मिले ? दूसरे, पीजी के लिए जो योग्य विद्यार्थी मिले भी, उन्होंने इन पाठ्यक्रमों में पढ़ने से मना कर दिया।
ऐलौपैथी चिकित्सा का मानना है कि आज के विद्यार्थी उन पाठ्यक्रमों में अध्ययन करना नहीं चाहते, जिनमें विशेषज्ञता  प्राप्त करने में लंबा समय लगता है। इसके उलट वे ऐसे पाठ्यक्रमों में दक्षता हासिल करना चाहते हैं, जहां जल्दी ही विशेषज्ञता  की उपाधि प्राप्त कर धन कमाने के अवसर मिल जाते हैं। गुर्दा, नाक, कान, दांत, गला रोग एवं विभिन्न तकनीकी जांच विशेषज्ञ  35 साल की उम्र पर पहुंचने के बाद सल्यक्रिया शूरू कर देते हैं, जबकि हृदय और तांत्रिका-तंत्र का  यह अवसर 40-45 साल की उम्र बीत जाने के बाद मिलता है। साफ है, दिल और दिमाग का मामला बेहद नाजुक है, इसलिए इनमें लंबा अनुभव भी जरूरी है। लेकिन कल को यह समस्या बनी रही तो भविष्य  में इन रोगों के उपचार से जुड़े चिकित्सकों की कमी आना तय है। इस व्यवस्था में कमी कहां है, इसे ढूंढना और फिर उसका निराकरण करना तो सरकार और ऐलौपैथी शिक्षा से जुड़े लोगों का काम है, लेकिन फिलहाल इसके कारणों की प्रष्टभूमि  में भारतीय चिकित्सा परिषद् को खारिज कर ‘राष्टीय  लगातार मंहगे होते जाना तो नहीं ?
2016 में एमएमसी अस्तित्व में लाने का निर्णय नरेंद्र मोदी सरकार ने लिया है। आरंभ में इसका मकसद चिकित्सा  शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारना, इस पेशे  को भ्रष्टाचार  मुक्त बनाना और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों के अनैतिक गठजोड़ को तोड़ता था। लेकिन जब एनएमसी विधेयक का प्रारूप तैयार हुआ और उसका विशेषज्ञों ने मुल्याकंन किया तो आभास हुआ कि कालांतर में यह विधेयक कानूनी रूप ले लेता है तो आधुनिक ऐलौपैथी विकित्सा ध्वस्त हो जाएगी। इसकी खामियों को देखते हुए ही सभी एमबीबीएस चिकित्सक इसके विरोध में खड़े हो गए। विरोध का प्रदर्शन  दिल्ली में जुलूस निकालकर और सभा करके किया गया। इस विधेयक का सबसे प्रमुख लोच है कि आयुर्वेद, हैम्योपैथी और यूनानी चिकित्सक भी सरकारी स्तर पर (ब्रिज कोर्स) करके वैधानिक रूप से ऐलौपेथी चिकित्सा करने के हकदार हो जाएंगे। हालांकि अभी भी इनमें से ज्यादातर चिकित्सक बेखटके एलौपैथी की दवाएं लिखते हैं, किंतु यह व्यवस्था अभी गैर-कानूनी है और जिले के सरकारी स्वास्थ्य विभाग के कदाचरण पर चलती है। संभव है, इस विरोधाभास को खत्म करने और गैर-कानूनी इलाज को कानूनी बना देने के नजरिए से ही सरकार एनएमसी विधेयक में सेतु-पाठ्यक्रम का प्रावधान कर इसे वैधता प्रदान करने की मंशा  रख रही हो ?
लेकिन क्या किसी साधारण ऑटो-टैक्सी लायसेंसधारी चालक को आप कुछ समय प्रशिक्षण  देकर हवाई जहाज चलाने की अनुमति दे सकते हैं ? दरअसल उपचार की हर एक  पद्धति एक वैज्ञानिक पद्धति है और सैंकड़ों साल के प्रयोग व प्रशिक्षण  से वह परिपूर्ण हुई हैं। सबकी पढ़ाई भिन्न हैं। रोग के लक्षणों को जानने के तरीके भिन्न हैं, और दवाएं भी भिन्न हैं। ऐसे में चार-छह माह की एकदम से भिन्न पढ़ाई करके कोई भी वैकल्पिक चिकित्सक ऐलौपैथी का मास्टर नहीं हो सकता ? यदि यह विधेयक लागू हो जाता है तो तय है, ऐलौपैथी चिकित्सा तो नष्ट होगी ही, आयुर्वेद्व, होम्योपेथी, और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों का भी भट्ठा बैठ जाएगा। क्योंकि ऐलौपैथी में कमाई बेहिसाब है और इसके इलाज से तत्काल राहत भी मिलती है, ऐसे में वैकल्पिक चिकित्सक अपनी मूल पद्धति से उपचार क्यों करेंगे ? इससे अच्छा है, सरकार आयुर्वेद चिकित्सा को बढ़ावा दे। इसमें नए अनुसंधान हों और उन जड़ी-बूटियों को खोजा जाए, जो आयुर्वेद-ग्रंथों में उल्लेखित हैं। ऐसा होता है तो यह पद्धति अपने शूद्धतम रूप में निखरेगी और इससे जटिल बिमारियों का उपचार संभव होगा। किंतु इन वैध-विषारदों को यदि ऐलौपैथी उपचार की कानूनी छूट दी गई तो रही-सही आयुर्वेद चिकित्सा ध्वस्त हो जाएगी। गौरतलब है जब सभी ऐरे-गैरे ऐलौपैथी चिकित्सक बन जाएंगे, तो मेधावी छात्र अपना समय व प्रज्ञा क्यों जटिल बीमारियों का उपचार सीखने में खर्च करेंगे ?
वैसे भी एमबीबीएस और इससे जुड़े विषयों  में पीजी में प्रवेश  बहुत कठिन परीक्षा है। एमबीबीबीएस में कुल 67,218 सीटें हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन 1000 की आबादी पर एक डॉक्टर की मौजदूगी अनिवार्य मानता है, लेकिन हमारे यह अनुपात 0.62.1000 है। 2015 में राज्यसभा को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने बताया था कि 14 लाख ऐलौपैथी चिकित्सकों की कमी है। किंतु अब यह कमी 20 लाख हो गई हैं। इसी तरह 40 लाख नर्सों की कमी है।
बाबजूद एमबीबीबीएस  शिक्षा के साथ कई तरह के खिलवाड़ हो रहे हैं। कायदे से उन्हीं छात्रों के मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लना चाहिए, जो सीटों की संख्या के अनुसार नीट परीक्षा से चयनित हुए हैं। लेकिन आलम है कि जो छात्र दो लाख से भी ऊपर की रैंक में है, उसे भी धन के बूते प्रवेश  मिल जाता है। यह स्थिति इसलिए बनी हुई है, दरअसल जो मेधावी छात्र निजी कॉलेज की शूल्क अदा करने में सक्षम नहीं हैं, वह मजबूरी वश अपनी सीट छोड़ देते हैं। बाद में इसी सीट को निचली श्रेणी में स्थान प्राप्त छात्र खरीदकर प्रवेश  पा जाते हैं। इस सीट की कीमत 60 लाख से एक करोड़ तक होती है। गोया जो छात्र एमबीबीबीएस में प्रवेश  की पात्रता नहीं रखते हैं, वे अपने अभिभावकों की अनैतिक कमाई के बूते इस पवित्र और जिम्मेबार पेशे  के  पात्र बन जाते हैं। ऐसे में इनकी अपने दायित्व के प्रति कोई नैतिक प्रतिबद्धता नहीं होती है। पैसा कमाना ही इनका एकमात्र लक्ष्य रह जाता है। अपने बच्चों को हरहाल में मेडिकल और आईटी कॉलेजों में प्रवेश  की यह महत्वाकांक्षा रखने वाले पालक यही तरीका अपनाते हैं। देश  के सरकारी कॉलेजों की एक साल की शुल्क महज 4 लाख है, जबकि निजी  विश्व -विद्यालय और महाविद्यालयों में यही शुल्क  64 लाख है। यही धांधली एनआरआई और अल्पसंख्यक कोटे के छात्रों के साथ बरती जा रही है। एमडी में प्रवेश  के लिए निजी संस्थानों में जो प्रबंधन के अधिकार क्षेत्र और अनुदान आधारित सीटें हैं, उनमें प्रवेश  शुल्क  की राशि  2 करोड़ से 5 करोड़ है। इसके बावजूद सामान्य प्रतिभाशाली छात्र के लिए एमएमबीबीएस परीक्षा कठिन बनी हुई है।
एनएमसी के प्रस्तावित विधेयक में इस संस्था को न्यायालय की तरह विवेकाधीन अधिकार भी दिए गए हैं। इसे ये अधिकार भी हैं कि यह चाहे तो उन चिकित्सकों को भी मेडिसन और शल्यक्रिया की अनुमति दे सकती है, जिन्होंने लाइसेंशिएट परीक्षा पास नहीं की है। जबकि एमबीबीबीएस पास छात्रों को भी प्रेक्टिस शूरू करने से पहले यह परीक्षा पास करनी होती है। जो विधार्थी विदेश  से ऐलौपैथी चिकित्सा की डिग्री लेकर भारत में प्रेक्टिस करना चाहते हैं तो यह एनएमसी के विवेक पर निर्भर होगा कि उसे प्रेक्टिस करने की अनुमति दे अथवा नहीं ? यही वे झोल है, जो भ्रष्टाचार  को पनपने के छेद खोलते हैं।
एक ओर तो हम आरक्षण के नाम पर जाति आधारित योग्यता व अयोग्यता का ढिंढोरा पीटते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस विधेयक में निजी महाविद्यालयों में 60 प्रतिशत सीटें प्रबंधन को अपनी मनमर्जी से भरने की छूट दे दी है। अब केवल 40 फीसदी सीटें ही प्रतियोगी परीक्षा के माध्ययम से भरी जाएंगी। साफ है, प्रबंधन उसके अधिकार क्षेत्र में आई 60 प्रतिशत सीटों की खुल्लम-खुल्ला नीलामी करेगा ? प्रवेश  के लिए यह राशि  किन आंकड़ों को छुएगी, फिलहाल कहना मुश्किल  है। इसीलिए इस विधेयक के पारित होने से पहले ही इसका असर पीजी सीटें खाली रह जाने के रूप में दिखने लगा है। यह स्थिति देश  की भावी स्वास्थ्य सेवा को संकट में डालने के स्पष्ट  संकेत दे रही है। विधेयक लाना ही था तो इसमें चिकित्सा शिक्षा में ऐसे सुधार दिखने चाहिए थे, जो इसमें धन से प्रवेश  के रास्तों को बंद करते। श्रीलाल शूक्ल अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘राग दरबारी‘ में बहुत पहले लिख गए हैं कि भारतीय  शिक्षा प्रणाली आम रास्ते पर पड़ी बीमार कुतिया है, जिसे सब लतियाते हैं, परंतु इलाज कोई नहीं करता।

 

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