लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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आपात्काल की ३७वीं बरसी पर विशेष

विपिन किशोर सिन्हा

उस समय महानगरों को छोड़ दूरदर्शन की सुविधा कहीं थी नहीं। समाचारों के लिए आकाशवाणी और अखबारों पर ही निर्भरता थी। २५ जून, १९७५ की काली रात! आकाशवाणी ने रात के अपने समाचार बुलेटिन में यह समाचार प्रसारित किया कि अनियंत्रित आन्तरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपात्काल (Emergency) की घोषणा कर दी है। इस दौरान जनता के मौलिक अधिकार स्थगित रहेंगे और सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। समाचार पत्र विशेष आचार संहिता का पालन करेंगे जिसके तहत प्रकाशन के पूर्व सभी समाचारों और लेखों को सरकारी सेन्सर से गुजरना होगा। मुझे याद है – जनसत्ता के प्रथम पृष्ठ पर कोई समाचार नहीं छपा। पूरा पृष्ठ ही काली स्याही से पुता था।

सचमुच लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए काला दिन ही था २५, जून १९७५। इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा श्रीमती इन्दिरा गांधी के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव को अवैध ठहराने तथा उन्हें छः साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के बाद किसी अनहोनी की अपेक्षा तो सभी कर रहे थे, लेकिन ऐसा अधिनायकवादी कदम वे इतना शीघ्र उठा लेंगी, इसकी उम्मीद नहीं थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय के बाद, नैतिकता के आधार पर इन्दिरा गांधी के इस्तीफ़े की उम्मीद थी, लेकिन सत्ता लोलुपता आड़े आ गई। उन्होंने इस्तीफ़ा देने के बदले लोकतंत्र का गला घोंटना ही उचित समझा। लोकबंधु जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन अपने चरम पर था। कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से तंग आकर जनता ने भूराजस्व भी देना बंद कर दिया था। बिहार में प्रत्येक कस्बे, तहसील, जिला और राजधानी में भी जनता सरकारों का गठन हो चुका था। जनता ने अवैध सरकार के आदेशों कि अवहेलना शुरु कर दी थी। जनता सरकार के प्रतिनिधियों की बात मानने के लिए ज़िला प्रशासन भी विवश था। पूरे देश में इन्दिरा सरकार इतनी अलोकप्रिय हो चुकी थी कि चारो ओर से बस एक ही आवाज़ आ रही थी – इन्दिरा गद्दी छोड़ो। लेकिन इन्दिरा जी भला गद्दी क्योंकर छोड़तीं। उन्होंने सत्ता छोड़ने के बदले देश को तानाशाही की अंधी गलियों में धकेल दिया। ऐसा करने की सलाह उन्हें क्रेमलिन (सोवियत रूस) से प्राप्त हुई थी। रात में इमर्जेन्सी की घोषणा हुई और पौ फटने के पूर्व सभी विरोधी दलों (सी.पी.आई.को छोड़कर) के नेता जेलों में ठूंस दिए गए। न उम्र का लिहाज़ रखा गया न स्वास्थ्य का। लोकबंधु जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, लाल कृष्ण अडवानी, जार्ज फर्नाण्डिस, पीलू मोदी आदि राष्ट्रीय स्तर के नेता आतंकवादियों की तरह रात के अंधेरे में घर से उठा लिए गए और मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के तहत अनजाने स्थान पर कैद कर किए गए। मीसा वह काला कानून था जिसके तहत बन्दी को कोर्ट में पेश करना आवश्यक नहीं था। इसमें ज़मानत का भी प्राविधान नहीं था। सरकार ने जिनपर थोड़ी रियायत की उन्हें डी.आई.आर. (Defence of India Rule) के तहत गिरफ़्तार किया गया। यह थोड़ा नरम कानून था। इसके तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश किया जाता था।

मैं उनदिनों काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र था। विद्यार्थी परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सक्रिय कार्यकर्त्ता भी था। बी.एच.यू. के छात्र संघ पर विद्यार्थी परिषद का कब्जा था। अध्यक्ष पद पर मेरे ही कालेज के श्री दुर्ग सिंह चौहान (इस समय उत्तराखंड टेक्निकल युनिवर्सिटी के कुलपति), उपाध्यक्ष पद पर केदार नाथ सिंह ( संप्रति वाराणसी ग्रेजुएट कन्स्टीच्येन्सी से भाजपा के एम.एल.सी) और महासचिव के पद पर आद्या प्रसाद त्रिपाठी (वर्तमान में हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर) निर्वाचित हुए थे। तीनों विश्वविद्यालय परिसर के छात्रावास में ही रहते थे। एक झटके में तीनों को गिरफ़्तार कर लिया गया और मीसा के तहत अज्ञात जेल में भेज दिया गया। जेल में पहुंचते ही दुर्ग सिंह चौहान को तनहाई में डाल दिया गया। ज्ञात हो कि तनहाई एक सेल होता है जिसमें अत्यन्त गंभीर अपराध के अपराधी और खूंखार कैदी को रखा जाता है। सेल के कैदी को किसी से बात करने की इज़ाज़त नहीं होती। अधिक दिनों तक सेल में रखने पर कैदी के पागल हो जाने की संभावना होती है। कुलपति कालू लाल श्रीमाली चौहान जी से व्यक्तिगत खुन्नस रखते थे। उन्हें तनहाई में रखने का आदेश डी.एम. ने कुलपति की सलाह पर दी थी। छात्र संघ का अध्यक्ष, प्रथम श्रेणी में आनर्स के साथ एलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग मे बी.टेक. डिग्रीधारी इन्जीनियर एक ही रात में कुलपति, कालू लाल श्रीमाली की निगाह में खूंखार अपराधी बन गया था। उस समय चौहान जी एम.टेक. के विद्यार्थी थे। पहली रात को मेरे दो घनिष्ठ मित्रों, सिविल इन्जीनियरिंग के ओम प्रकाश पूर्वे और एलेक्ट्रानिक्स के प्रदीप तत्त्ववादी को पुलिस ने हास्टल से उठा लिया। पूर्वे मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार) का रहने वाला था और तत्त्ववादी नासिक का। पूर्वे का अपराध था कि उसने पिछले छात्र संघ के चुनाव में विद्यार्थी परिषद का जमकर प्रचार किया था और प्रदीप तत्त्ववादी का सबसे बड़ा अपराध था कि उसके चाचा, प्रोफ़ेसर शंकर विनायक तत्त्ववादी संघ के प्रान्त बैद्धिक प्रमुख और इन्जीनियरिंग कालेज में प्रोफ़ेसर थे।

हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने आर.एस.एस. को ला कालेज के परिसर में दो कमरों का एक भवन कार्यालय के लिए दिया था। कालू लाल श्रीमाली ने उसे एक ही रात में बुलडोज़र लगा कर ध्वस्त कर दिया और कबाड़ को विश्वनाथ मन्दिर से साइंस कालेज की ओर जाने वाली सड़क के किनारे डाल दिया। इस सड़क के दोनों किनारे पर जो फ़ूटपाथ बाद में बने, उसकी नींव में संघ कार्यालय की ही ईंटें हैं। मुझे इस बात का संतोष आज भी रहता है, और मैं कालू लाल श्रीमाली का आभार व्यक्त करता हूं कि उन ईंटों का इस्तेमाल उसने शौचालय के फ़र्श के निर्माण में नहीं किया। बाबर और औरंगज़ेब के कृत्यों से कम घृणित यह कृत्य नहीं था। सत्ता प्राप्त होने के बाद याद दिलाने के बावज़ूद भी न जनता पार्टी की सरकार ने कुछ किया और न भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने। महामना द्वारा प्रदत्त हमारा संघ कार्यालय इमर्जेन्सी मंन मिट्टी में मिला दिया गया, यह हूक आजीवन रहेगी।

छात्रों में भयंकर असंतोष भड़का। गुप्त बैठकें हुईं। यह तय किया गया कि अगले दिन रात के आठ बजे सभी छात्रावासों से मशाल जुलूस निकाला जाएगा और प्रत्येक समीपवर्ती चौराहे पए इन्दिरा गांधी का पुतला फूंका जाएगा। अगले दिन नियत समय पर यह कार्यक्रम संपन्न किया गया। इंजीनियरिंग कालेज के छात्रों ने राजपुताना चौराहे पर इन्दिरा गांधी का पुतला फूंका। मशाल जुलूस का निकलना तथा पुतला फूंका जाना उपकुलपति कालू लाल श्रीमाली के मुंह पर एक करारा तमाचा था जिसने पूरे विश्वविद्यालय को एक सैनिक छावनी में बदल दिया। कुछ ही मिनटों में सिंहद्वार से छात्रावास वाली सड़क पर पी.ए.सी. की गाड़ियां दौड़ने लगीं। हमलोगों ने अनजाने चेहरों को हास्टल लौट जाने का निर्देश दिया तथा सक्रिय कार्यकर्ताओं को नूतन विश्वनाथ मन्दिर के सामने फैकल्टी रोड पर खड़े पेड़ों पर च्ढ़कर छुप जाने का निर्देश दिया। रात अंधेरी थी बूंदाबांदी भी शुरु हो गई। मैं अपने साथियों के साथ मन्दिर से थोड़ा आगे एक पेड़ पर छुप के बैठ गया। विश्वविद्यालय से बाहर जाना असंभव था। सिंहद्वार समेत सारे निकास द्वार बंद कर दिए गए। हास्टल में कांबिंग आपरेशन चलाया गया। जिस भी छात्र के कमरे में सरकार विरोधी या आर.एस.एस./विद्यार्थी परिषद/समाजवादी युवजन सभा का कोई पत्रक या साहित्य बरामद हुआ, उसे गिरफ़्तार कर लिया गया। जिनके कमरे बंद मिले, उन छात्रों पर विशेष नज़र रखने की हिदायत वार्डेन को दी गई। मैं और मेरे साथी रात भर पेड़ पर टंगे रहे। नीचे पुलिस की पेट्रोलिंग होती रही। सवेरा होने पर पेट्रोलिंग बंद हुई और हमलोग अपने-अपने हास्टल गए। हास्टल में पुलिस द्वारा मचाए गए ताण्डव की सूचना विस्तार से मित्रों ने दी। छात्रों का पक्ष ले रहे वार्डेन को भी उन्होंने गालियां दीं। मेरे कमरे पर पुलिस बार-बार जा रही थी लेकिन ताला बंद देख लौट आ रही थी। पुलिस के वांछितों की सूची में संभवतः मेरा नाम काफी ऊपर था। सैकड़ों छात्र गिरफ़्तार किए गए उस काली रात को।

क्रमशः 

5 Responses to “आपात्काल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और स्मृतियां – भाग-१”

  1. अजय मित्तल

    1975 में ‘जनसत्ता’ अस्तित्व में ही नहीं आया था मेरे भाई .

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    विपिन जी प्रेरणा दायी इतिहास दर्शन कराने के लिए शतशः धन्यवाद। कहते हैं ट्रूथ इज़ स्ट्रेन्जर दॅन फ़िक्शन। सच्चाई उपन्यास से भी अधिक विस्मय कारक हुआ करती है।

    यहां, यु एस ए में, आपात्काल के समय अन्य मेरे सहपाठी छात्र, जिन्हें संघ की कार्य पद्धति का ग्यान नहीं था, बहुत ही हताश हो गए थे। जब मिलते चिन्तित ही हुआ करते थे।

    अब भारत का क्या होगा, यह प्रश्न उन्हें सताया करता था। जब मैं उन्हें कुछ संघ के बारे में कहता, तो प्रश्न पूछते कि संघ के पास कौनसी शासन की कुरसी है? कितना पैसा है? निर्धन संघ क्या कर पाएगा?

    मैं कहता, सर संघ चालक जिस कुरसी पर बैठते हैं, उस कुरसी की शक्ति बढ जाती है। इन्दिरा यदि कुरसी से उतर जाए, तो सारे चूहे भाग जाएंगे। जब तक कुरसी पर है, तभी तक पॉवर है।

    पर संघ चालक जिस कुरसी पर बैठते हैं, उसमें पॉवर आ जाती है।
    नानासाहब गोरे भी हम लोगों से प्रभावित थे। कहा करते थे, समानता की जो बात समाजवादी पार्टी करती है, वह समानता तो संघ में दिखायी देती है। और आप लोग तो समानता की बात भी नहीं करते।
    संघम्‌ शरणम्‌ गच्छामि।

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  3. SHIVESH

    आपातकाल की स्मृतियों को जिस प्रकार से विपिन जी ने यहाँ पर खीचा है …..वह अत्यंत ही भावनात्मक और सजीव कर देने वाली हैं …….यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की श्री विपिन जी ने कुछ लोगों की चर्चा कर के जिस तरह से उनके त्याग और सेवा का विवरण दिया है ….यही उनके त्याग की आदरांजलि है |

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  4. Dr. Dhanakar Thakur

    मैंने आपलोगों की तरह यातनाएं नहीं सही पर नुकशान जरूर झेला और शायद संयोगवश जेल जाने से बच गया क्योंकि मैं अपने चचेरे भाई के विवाह में गया था -मेरा कमरा सील हो गया (वह संघ कार्यालय का भाग था) -मैं छोटा था २० वर्ष का पर कुछ अनुभव मैंने अपनी आत्मकथामे लिखे हैं( अंगरेजी में है क्षमा करेंगे) –
    इंदिरा गाँधी की निरंकुशता और झूठे दावाओं की और इशारा इसमें मिलेगा और १९७७ में लोगों के निर्भय होने जका राज भी वह जनसंघर्ष ही था( पर दुःख की उसमे लगे नेतामे अधिकांश आगे भ्रस्त हो गए -उन्होंने जनता को ठगा -इसलिए ही कांग्रेस आयी और अभी तक चल रही है वल्कि सरे दलों का कांग्रसीकरण हो गया)
    CHAPTER V

    BLACK DAYS OF THE NATIONAL EMERGENCY (1975-77)

    On 12th June 1975, the Allahabad High Court nullified the election of Indira Gandhi as an M. P. on the petition of Raj Narayan. The implication of this verdict has no parallel in the contemporary Indian History. The opposition was demanding resignation from the P. M. but she misused the Constitution for her own benefit resulting in the declaration of the National Emergency on June 26th 1975, which is a memorable date now for all of us.
    I am neither a politician nor an expert of law, yet I think, had Mrs. Gandhi proceeded as per the law of the land, gone to the Supreme Court, making someone else the P. M. for the period till the verdict had favoured her or in the worst case till her invalidity period for an electoral post of six years had elapsed, the reverence for Mrs. Gandhi would have been really like that of Devi Durga as she was called after the 1971 war, instead of clamping the Emergency and amending the Constitution suitably in her favour, putting in jails thousands of people under the MISA, banning the organizations like the RSS, putting all important opposition leaders in jails, which included Loknayak J. P. All these went against her and finally she as well as her party was defeated miserably in the elections for the Parliament in 1977.
    However, one truth came up on the surface that you cannot befool all people for long. People became fearless in public life and began to criticize the government freely.
    The assassination of Mrs. Gandhi by terrorists though made her revered but the scars of the Emergency on the minds of the public will ever remain.
    No doubt, later on, the failure of the Janata Govt. made her succeed in becoming the P. M. once again but she was not the same autocratic, dictator Indira, who dared to censor all the civil liberties guaranteed to the people by the founding fathers of the Indian Constitution. Thus, she herself had condemned her imposition of the Emergency.
    There are classics available on those aspects. I have only to share my own experiences.
    The day the Emergency was clamped, I listened to it on the radio in the Old Hostel of the DMC. The Students’ agitation of 1974 had already made the students and the public politically conscious. We were having more faith in the BBC than in the AIR. So we listened to the details from the BBC.
    The BBC was popular till the Janata rule came. It had asked the listeners to comment on its news. I had sent a postcard writing, “When all the four pillars of democracy were demolished during the Emergency, I saw people waiting till 8 p.m. in the remote villages of the country, sitting around fire in the chilly winter.” I do not know whether this letter was broadcast actually or not, but the BBC sent, for many years, its calendar annually and programme-sheet half-yearly to my old address of the DMC.
    Next day, I went to my room in the Sangh Karyalaya and asked the front door neighbour (wife of an ophthalmologist, Dr. A. K. Roy) to keep my luggage safely in her custody. Auntie accepted it a bit reluctantly. The police had already inspected the office and so I thought it was better to leave the place. Thinking myself as a senior student (others were from schools/general colleges) the police might have a point to harass or even arrest me.
    One of my cousins was to be married at Riga (Sitamarhi). I went there to pass time and later when I returned to Darbhanga, I was informed that the RSS had been banned and our rooms had been sealed.
    I stayed for some days with my friends in the Old Hostel. Later I could get a seat in the West Hostel. Darbhanga was flooded with rainwater in those days. I shifted to the West Hostel on 3.8.1975. The other students of my allotted room probably knew that I had worked for the JP agitation and they were unwilling to accept me and so they suggested to me to go to room no.19 where other senior student activists like Prabhash Singh and another Sangh worker Prem Shankar Sharma were residing. My friends of room no. 20 were thinking probably to the tune of the time. Their planning to put us all in one cage was not bad. But lions do not remain in a herd.
    At last the hostel superintendent, Prof. S. S. Shrivastava had to come and sit in front of the room no. 20, till I could arrange some bed-sheets, etc. from my friends of the Old Hostel to occupy my seat. When the Janata Party Government came to power and my room at the RSS office was unlocked my beds, etc. lying there in the room were badly spoiled by then.
    The same roommates later became very cordial to me. Others, viz. Amrendra, Ramlal Mehta and Md. Halim were two years senior to me. One could wonder at my cordial relations with a Muslim because people did not know how a RSS worker behaved with a non-Hindu. It could only be experienced. I had only one quarrel with him and that was not for any religious or political issue. He had cut the small grape shrub, in front of our room, which I had been protecting, from cattle by fences. Though he was senior to me, I chided him.
    He was of course, very helpful to me and I remember that he had great regards for my mother whenever she happened to visit me. He also used to take prasad of Saraswati Puja, which I used to celebrate on a mini-scale in the room. I was not a professional pandit, yet students were respecting me as such as I used to offer puja in dhoti everyday morning with Arhul’s (Hibiscus rosa-sinesis) red flowers to my family deity Kali. I was attracted to that tree in front of the room so much that I did not change the room even when I was allotted a single-seated room in the East Hostel.
    I recall, only twice I had been a pandit – before the age of 10, once in the house of a blacksmith at Forbesganj (I cannot imagine what I would have recited) and the next, partly in my marriage.
    Later, I had also gone to the home of Halim Saheb at Giridih. This was the room no. 20 of the West Hostel, which became the contact point of the medicos from all over the country after the formation of the NMO in 1977.
    Since my examination was approaching, I devoted myself to the studies and apart from attending a few meetings(distributed some books of Dr.Subramaniyam Swami). ; I did not participate in any underground activity. It may be so, because I was not so well known to the Darbhanga workers, as I was to theRanchi workers where I had participated in the Students’ agitation. After my admission to the medical college at Darbhanga, I had gone to Ranchi where I had worked for the Nav Nirman Samiti.
    The trains, which had become punctual, were again running late after some months of the clamping of the Emergency. Bribery continued to be rampant, of course, under the table and even outside the office. I had to give Rs. 80 for the continuation of my Loan Scholarship but it was futile. But even then you could not argue, if your work had not been done.
    I knew that giving bribe was as great a crime as taking it. But I had seen in the courts, peshkars taking peshagi below the nose-tip of the judge and there under the Gandhiji’s portrait it was written boldly, “Receiving or offering bribe are both punishable crimes.” I had also heard that Shriprakash as the Governor had received this notification from the President. He wrote back to the President that he could not comply with it. On further queries he replied that one could comply with the former part of the statement but how could one live if he complied with the latter?
    The above statement might have been hypothetical but was a simple student for whom going and coming to Patna was very expensive. The centralization of power and authority in geographically bigger states are important denominators of corruption. In Bihar, one has to make compromises with it and it was the same when I joined the Bihar State Health Services much later.
    Even during the Emergency the P. M. Secretariat was not effective. Once, I had sent a registered letter complaining against the college authorities that they were charging for electricity at a high rate of Rs. 22 per student per month. As such for our room having four bulbs of 60 Watts, three fans for summer, a heater for making tea — which was occasionally used — we had to pay Rs. 88 per month. It may be added here that I neither used to take tea nor did I have a fan — till my mother-in-law insisted for it and brought one for me at Ranchi.
    So, the exploitation of students or of the public had no mitigation with the imposition of the Emergency; I would have been the happiest person to appreciate it, had it done well to the people.
    And as the Emergency was relaxed, we were the first to take out a procession in the town, long before the candidature for elections were announced. Prabhash and I were interrogated severely near Darbhanga railway station for wall writing at midnight, and that too, when the electoral process had begun.
    It took time to acclimatise the officials as you need a changing room before coming out from the AC and it was not the AC— for Mrs. Gandhi, it was like a political self-immolation, in the fire which she herself ignited and one could not expect other than the ashes which were but the results of the election.
    It took time to acclimatise the officials as you need a changing room before coming out from the AC and it was not the AC— for Mrs. Gandhi, it was like a political self-immolation, in the fire which she herself ignited and one could not expect other than the ashes which were but the results of the election.

    Fig. 6 — Loknayak Jay Prakash (11.10.1902 – 8.10.1979).

    Fig. 7 — Assam’s Students’ agitation
    — People defying the curfew imposed to suppress the agitation as a reflection of the courage developed by success in removing the National Emergency of 1975-77. On 18th April 1979, more than 5 lakh of people defied curfew and marched towards Narengi, about 10 km from Guwahati.

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  5. आर. सिंह

    आर.सिंह

    श्री विपिन किशोर सिन्हा के कलम द्वारा प्रारंभ आपात काल की यह कहानी एक भुक्त भोगी का संस्मरण होने के कारण उस समय का अच्छा खाका खींचती है. मैं उस समय नौकरी में था और नौकरी करते हुएभी ११ वर्ष बीत चुके थे.अर्ध सरकारी विभाग यानि सरकारी क्षेत्र के एक कारखाने में कार्य रत था.बी.एच.यु. से शिक्षा ग्रहण किये हुए एक अभियंता जिन्होंने १९६६ में मेकैनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली थी और जो वहाँ आर.एस.एस. के एक कर्मठ कार्यकर्ता थे,वे मेरे सहयोगियों में से थे. श्री विजय गुप्त उस जमाने में एक तरह से मेरे मार्ग दर्शक थे.आपातकाल में इंडियन एक्सप्रेस और हिंदी पत्रिका सरिता ने भी अपना सम्पादकीय बंद कर दिया था.खबरें छन कर आती थी.विजय जी ने एक दिन मुझसे पूछा,”कुछ काम करेंगे?”
    मैंने कहा,”अच्छा लगेगा तो अवश्य करूंगा.”
    उन्होंने पूर्ण साइज का कागज़ एक पन्ना निकाला और मुझे पढ़ने को दिया.उसपर दोनों तरफ बारीक अक्षरों में वह सबकुछ प्रकाशित था ,जो जनता उस समय जानना चाहती थी.मुझे बड़ा अच्छा लगा उन्होंने बताया कि अगर इसे पढ़ते हुए भी कोई पकड़ा जाए तो उसे मीसा के अनतर्गत गिरफ्तार करके जेल भेजा जा सकता है.मैंने पूछा,”मुझे क्या करना है?”
    “क्या आप इसे अपने दफ्तर में बाँट सकते हैं.?”
    उस दफ्तर में तीन फ्लोर थे और करीब पांच सौ लोग काम करते थे.मैं उस समय तथा कथित क्लास वन आफिसर और एक तरह से गुप्ता जी का वरिष्ठ अधिकारी था.गुप्ता जी स्वयं यह काम नहीं कर सकते थे,क्योंकि ऐसे भी उस पर्चे को बांटने का पहला शक तो उन्हीं पर जाना था.मैंने वह काम लिया और बिना पहचान में आये उसे कुछ दिनों तक बांटता रहा.फिर पहचान में आने के खतरे को भांपते हुए वह काम किसी और को सौंप दिया गया.मैंने यह जानने का कभी प्रयत्नं नही किया कि बाद में उस काम को किसने किया.
    ऐसे मैं यहाँ यह भी बता दूं कि व्यक्तिगत अधिकारों पर वन्दिश होने के बावजूद मैंने पहले कुछ दिनों तक का अनुशासन देख का एक तरह से आपातकाल को इतना बुरा नहीं समझा था,पर वह अनुशासन भी कुछ दिनों में मृग मरीचिका सिद्ध हुआ और लोगों को काम करवाने के लिए अधिक रिश्वत देना पड़ा,क्योंकि खतरा ज्यादा बढ़ गया था.गुप्त जी ने सेवा निवृति के पहले ही नौकरी छोड़ दी थी और व्यापार में लग गए थे.हो सकता है कि वाराणसी में आज भी वे व्यापार में लगे हुए देश सेवा के कार्यक्रमों में भी हिस्सा बंटा रहे हों.

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