बेनकाब हों देश विरोधी लीग चेहरे

संदर्भः-दलित छात्र रोहित बेमुला और जेएनयू से जुड़ी देश विरोधी तकतें
प्रमोद भार्गव
केंद्रीय केंद्रीय विश्व विद्यालय,हैदराबाद के शोधार्थी रहे दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या, मामले में नया मोड़ आने के साथ राजनीति फिर से गरमा गई है। कथित तौर पर जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या करने वाले रोहित की मां राधिका वेमुला ने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग पर संगीन आरोप लगाए हैं। राधिका का कहना है कि रोहित की मौत के बाद लीग के नेताओं ने उन्हें घर और 20 लाख रुपए देने का वायदा किया था। जिससे इस मामले को जातिगत भेद का बड़ा मुद्दा बनाकर न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि खराब की जाए, बल्कि हिंदुओं की एक जाति को भी हिंदुओं से जुदा कर दिया जाए। धन और घर के लालच में आई राधिका ने यह खुलासा अब इसलिए किया है, क्योंकि उन्हें तीन साल बीत जाने के बावजूद न घर मिला और न ही रुपए। 2 लाख रुपए का जो चेक दिया, वह भी बाउंस हो गया। मुस्लिम लीग की यह साजिश बेहद गंभीर है। लिहाजा इस साजिश से जुड़े चेहरों को बेनकाब कर, उन्हें कठघरे में खड़ा करने की जरूरत है। अन्यथा इस साजिश का विस्तार आगे भी देखने को मिल सकता है। जेएनयू में जिन छात्रों ने देष के हजार टुकड़े कर देने के नारे लगाए थे, वह भी लीग के षड्यंत्र का हिस्सा हो सकते हैं। यहां के प्राध्यापक डाॅ प्रवेश कुमार ने अंग्रेजी अखबार को दिए एक साक्षात्कार में कहा भी है कि इस विवि में छात्रों के भविष्य के साथ राष्ट्र विरोधी ताकतें भी पनपती हैं। ये लोग सेना और मोदी को एक साथ गाली देते हैं।
जातिगत भेदभाव और वैचारिक मत भिन्नता से जोड़कर परिभाषित किया जा रहे इस मामले में आए इस नए मोड़ से साफ होता है कि मुस्लिम लीग देश के कई अनुसूचित जाति और जनजाति नेताओं को धन देकर राष्ट्र विरोधी माहौल रचने का कमोबेश, वैसा ही काम कर रही है, जैसा जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी पाकिस्तान से धन लेकर कर रहे हैं। अब राधिका का कहना है कि लीग ने उन्हें भाजपा और मोदी सरकार के खिलाफ सभाओं में बोलने के लिए 20 लाख रुपए देने का वायदा किया था। इसीलिए वे देश में घूम-घूम कर चिल्लाए थे कि इस आत्महत्या के लिए मोदी सरकार और विवि प्रशासन  सीधे तौर से जुम्मे बार है। लीग के साथ अंबेडकर स्टूडेंट फेडरेशन के कार्यकर्ता भी जुड़े थे। यह भी राधिका को उसकी गरीबी का हवाला देकर रुपए देने का वादा करते थे। यह बेहद हृदयहीन बात है कि लीग औ रफेडरेशन के युवाओं ने युवा पुत्र की असामायिक मौत की पीड़ा झेल रही मां का राजनीतिक दुरुपयोग कर न केवल उनकी भावनाओं से खिलवाड़ किया, बल्कि राष्ट्रविरोधी कृत्य को भी अंजाम दिया। राधिका ने कहा है कि बेटे की मौत के बाद वह टूट चुकी थीं, लिहाजा लीगियों ने जब उन्हें घर और धन का आॅफर किया तो वे लालच में आ गईं। नतीजतन भाजपा और उनकी सरकार के खिलाफ इनके द्वारा पढ़ाए गए बयान मंचों से देने लगीं। ये लोग राधिका को केरल में भी एक राजनीतिक सभा को संबोधित करने के लिए 15 लाख रुपए का चेक देने का वादा करके ले गए थे। लेकिन राधिका का भाषण खत्म होते ही चेक देने का वादा करने वाले लीगी नेता मंच से गायब हो गए। अब नई जांचों में यह भी आशंका जाहिर की जा रही है कि 2 अप्रैल को दलितों के नाम पर जो हिंसा हुई उसमें और कोरेगांव में हुई हिंसा में भी मुस्लिम लीग का हाथ हो सकता है।
इस मामले ने तब इतना तूल पकड़ लिया था कि केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, कुलपति पी अप्पा राव, विधान परिषद के सदस्य रामचंद्र राव और छात्र सुशील कुमार एवं रामकृष्ण  के विरूद्ध भी धारा 306 के तहत एफआईआर में दर्ज कर ली गई थी। जबकि ये लोग रोहित की आत्महत्या के लिए प्रत्यक्ष दोषी नहीं थे। यह धारा आत्महत्या के लिए किसी व्यक्ति को प्रेरित या मजबूर करने की भूमिका रचने पर लगाई जाती है। आरोप था कि दलित छात्रों के साथ दत्तात्रेय के कहने पर भेदभाव बरता गया। नतीजतन रोहित आत्मघाती कदम उठाने को विवश हुआ। इस घटनाक्रम के बाद पूरे मामले ने राजनीतिक मोड़ ले लिया। दरअसल 17 अगस्त 2015 को सिकंदराबाद से सांसद दत्तात्रेय ने तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि ‘विवि जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी राजनीति का अखाड़ा बन गया है।‘ दलित भाजपा सांसद दत्तात्रेय द्वारा लिखे गए पत्र की अब पुष्टि हो रही है कि मुस्लिम लीग का दखल न केवल इस विवि में बल्कि जेनएयू में भी माहौल खराब कर रहा है।
दरअसल इस पत्र को लिखने की स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई थी, क्योंकि रोहित और उनका ‘अंबेडकर छात्र संगठन‘ विवि परिसर में नकुलसिंह साहनी की फिल्म ‘मुजफ्फरनगर बाकी है‘ को दिखाए जाने के पक्ष में थे। जबकि विद्यार्थी परिषद का नेतृत्व कर रहे सुशील कुमार फिल्म दिखाने का विरोध कर रहे थे। 1993 के मुंबई विस्फोटों के दोशी याकूब मेनन को फांसी दिए जाने का भी रोहित ने विरोध किया था। इस कारण इन दोनों विपरीत विचारधाराओं के संगठनों में विरोध किसी सार्थक बहस में बदलने की बजाय,हिंसा,मारपीट और सबक सिखाने के अवसरों में परिवार्तित होता गया। जाहिर है, सबक सिखाना उस पक्ष के लिए आसान होता है, जो लीगी जैसे संगठन से जुड़े हों।
यदि इस मामले की पृष्ठभूमि में जाएं तो पता चलता है कि इस प्रकरण का वास्ता दलितों के उत्पीड़न से जुड़ा नहीं था। छात्र राजनीति करें, अच्छा है, लेकिन मुजफ्फरनगर और याकूब मेमन जैसे विवादित मुद्दों से बचने की जरूरत है। मुजफ्फरनगर तो फिर भी ठीक है, लेकिन मेमन की फांसी का विरोध विवि परिसर में कतई तार्किक नहीं कहा जा सकता ? क्योंकि उसने मुंबई हमले की पृष्ठभूमि तैयार करने में अहम् भूमिका निभाई थी। इस हादसे में हजारों लोग प्रभावित हुए थे और करोड़ो की संपत्ति नष्ट हुई थी। मेमन को फांसी भी कानूनी प्रक्रिया को हरेक स्तर पर पूर्ण करने के बाद दी गई। उसका कृत्य राष्ट्रविरोधी गतिविधि की श्रेणी में था। इसलिए निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय और फिर राष्ट्रपति तक ने सजा की यथास्थिति बनाए रखी। बावजूद हमारे यहां कुछ लोग मानवाधिकारों के बहाने राष्ट्रविरोधी ताकतों की भी प्रबल पैरवी करने लग जाते हैं।
इस घटना के बाद जरूरत तो यह थी कि राजनीतिक दल इस समस्या का बातचीत से हल ढूंढते ? जिससे रोहित को आत्महत्या जैसी असामान्य स्थिति का शिकार होने की जरूरत नहीं पड़ती ? किंतु मौत के बाद गर्म तवे पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का काम आंध्र प्रदेश में तेलंगाना राष्ट्र समिति ने तो किया, जिससे मुद्दे को उछालकर भाजपा की हवा निकाल दी जाए। साफ है रोहित की आत्महत्या अपना-अपना राजनीतिक जनाधार बढ़ाने के सियासी समीकरणों में बदल गई थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे सीधे हत्या ठहरा दिया था। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी कहने लगे थे कि रोहित कृत्रिम परिस्थितयों का शिकार हुआ है। प्रसिद्ध आईएएस अधिकारी और कवि अशोक वाजपेयी ने इसी विवि से दी गई डी लिट् की मानद् उपाधि लौटाने की घोषणा कर दी थी। इन प्रतिक्रियाओं से विवि परिसर का माहौल बिगड़ता चला गया और इसमें मुस्लिम लीग ने आग में घी डालने का काम किया। गोया, जो लोग जब चाहे तब मोदी सरकार पर असहिष्णु होने का आरोप लगाते हैं, वे स्वयं असहिष्णुता को गाढ़ा करने में लग गए थे । अब रोहित की मां द्वारा ही मुस्लिम लीग और अंबेडकर स्टूडेंट के षड्यंत्र का खुलासा कर देने के बाद क्या राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और अशोक वाजपेयी ने गर्म तवे पर जो रोटी सेंकने का काम किया था, उसके लिए क्षमा-याचना करते हुए मुस्लिम लीग की निंदा करने का साहस दिखाएंगें ?

 

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