चीन की बदनीयती का शिकार होता गिलगित-बाल्टिस्तान

प्रमोद भार्गव
चीन की सह और सहायता से पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान को हथियाने का वैधानिक दांव चल दिया हैं। पाकिस्तान की कैबिनेट ने 21 मई 2018 को गिलगित-बाल्टिस्तान के संबंध में चैथा प्रांत बनाए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। क्षेत्रीय विधानसभा ने भी इसका समर्थन किया है। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान का यह आदेश गिलगित-बाल्टिस्तान के विवादित क्षेत्र को चैथे प्रांत के रूप में पाकिस्तान का नया राज्य बनाने का हथकंडा है। पाकिस्तान की इस पहल से गिलगित-बाल्टिस्तान में तो आक्रोश , आक्रमकता के रूप में दिखाई देने ही लगा है, भारत ने भी अपना तीखा विरोध जताया है। भारत ने पाकिस्तान के उच्चायुक्त सैयद हैदर शाह  को बुलाकर कठोर शब्दों में कहा है कि ‘जम्मू-कश्मीर की तरह गिलगित-बाल्टिस्तान भारत का अभिन्न हिस्सा है और यह जम्मू-कश्मीर का ही एक प्रांत है। लिहाजा पाकिस्तान इसे स्वतंत्र राज्य का दर्जा दे ही नहीं सकता है।‘ इधर दोहरी चाल चलते हुए चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनियंग ने कहा है कि ‘ कश्मीर मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक समस्या है, इसलिए इसका दोनों देशों द्वारा ही बातचीत के जरिए निराकरण करना मुनासिब होगा। साथ ही अड़ियल रुख अपनाते हुए यह भी कहा कि गिलगित-बाल्टिस्तान से गुजरने वाले पचास अरब डाॅलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीईपीसी) से उसका रुख प्रभावित नहीं होगा, क्योंकि इस गलियारे का उद्देश्य आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने की पहल हैं।‘ चुनियंग का यह बयान चीन की दोहरी मानसिकता व विस्तारवादी नीति को पुष्ट करता है।
पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में सरकार भले ही लोकतांत्रिक हो, लेकिन उसपर नियंत्रण आखिरकार सेना और आईएसआई का ही रहता है। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के ताजा बयानों ने इस तथ्य की पुष्टि भी कर दी है। बावजूद पाकिस्तान के कामचलाऊ प्रधानमंत्री शाहिद खकन अब्बासी ने अपनी कार्यप्रणाली को अहमियत देने के नजरिए से 2009 के उस आदेश  को पलटकर एक ऐसा विवादित व जोखिम भरा कदम उठाया है, जिसके तहत गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र के निवासियों को स्वशासन के अधिकार प्राप्त थे। अब्बासी ने 20 मई 2018 को गिलगित-बाल्टिस्तान विधानसभा से एक ऐसा आदेश  पारित करा दिया, जिसके तहत अब खनिज, सीईपीसी और जल विद्युत परियोजनाओं के बारे में फैसले लेने का अधिकार परिषद की बजाए विधानसभा को मिल गया है। अब गिलगित-बाल्टिस्तान स्वायत्त परिषद के पास केवल सलाहकार की भूमिका रह गई है। नतीजतन अवामी एक्षन कमेटी के नेता सुल्तान रईस के नेतृत्व में सभी क्षेत्रीय दल इस फैसले के विरोध में हुंकार भरने लग गए है। सुरक्षाबल इन प्रदर्शनों का क्रूरतापूर्वक दमन करने में लगे हैं।
यहां सेना और आईएसआई के जुल्मों से आजिज आ चुके विद्रोही ‘कश्मीर का कसाई, पाकिस्तान आर्मी‘ और ‘आईएसआई सेना का वफादार कुत्ता‘ जैसे नारे लगा रहे हैं। भारत का मुखर समर्थन मिलने के बाद पाक अधिकृत कश्मीर का हिस्सा माने जाने वाले गिलगिट-बल्टिस्तान में न केवल पाकिस्तान के विरुद्ध आंदोलन तेज हुए हैं, बल्कि आजादी की बात भी उठ रही है। यह पूरा क्षेत्र पाक अधिकृत कश्मीर की ही तरह स्वयत्त क्षेत्र की मान्यता रखता है। हालांकि यह क्षेत्र भारत के जम्मू-कश्मीर का ही विस्तार क्षेत्र है। अंग्रेंजों ने आजादी के समय इसे भारत का हिस्सा माना था, लेकिन 1947 में हुए कबाईली हमले के बाद भारत के कब्जे से यह क्षेत्र निकल गया था और तबसे संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में इसे विवादित क्षेत्र माना जाता है। अपनी ऊंची पहाड़ियों और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण यह क्षेत्र पयर्टन और पर्वतारोहन के लिए भी दुनिया के लिए मशहूर है। चीन और पाकिस्तान का आर्थिक गलियारा भी इसी क्षेत्र से गुजर रहा है। चीन की विस्तारवादी नीति के तहत वह इस क्षेत्र की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति को बदलने की कवायद में भी लगा है। इसलिए इस गलियारे का विरोध भी स्थानीय लोग कर रहे हैं। दूसरी तरफ वैश्विक मानवा अधिकारवादी सरंक्षण संस्थाओं का कहना है कि इन क्षेत्रों में मानवाधिकारों का हनन इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि उनको रेखांकित किया जाना मुश्किल है। यदि यह क्षेत्र पाकिस्तान के नए राज्य के रूप में आकार ले लेता है तो यहां विद्रोहियों का दमन और बढ़ जाएगा।
अंग्रेजों ने भारत व पाकिस्तान के साथ ब्लूचिस्तान को भी एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया था साढ़े सात महीने तक यहां स्वतंत्र शासन रहा। किंतु, इस पर मोहम्मद अली जिन्ना ने 17 मार्च 1947 को सेना के बूते अवैध कब्जा कर लिया था। तभी से यहां राजनीतिक अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक आवाज उठाने वाले लोगों पर दमन और अत्याचार आज तक जारी हैं। बलूचों की मात्र भाषा ब्राहुई का विकास उर्दु भाषा थोप कर ठप कर दिया गया है। जबकि यह बेहद प्राचीन भाषा मानी जाती है। बलूच अपनी भाषा को लेकर बेहद संजीदा हैं। पाक के विरुद्ध ब्लूचिस्तान के संघर्ष में भाषा अहम् मुद्दा है। पाक से बांग्लादेश  के अलग होने का प्रमुख कारण बांग्ला भाषा रही है। इस नाते पाक बलूच में ब्राहुई भाशा के दमन में कब्जा करने के समय से ही लगा है। पाक की कुल भूमि का 40 फीसदी हिस्सा यहीं है। लेकिन इसका विकास नहीं हुआ है। करीब 1 करोड़ 30 लाख की आबादी वाले इस हिस्से में सर्वाधिक बलूच हैं। पाक और ब्लूचिस्तान के बीच संघर्ष 1945, 1958, 1962-63, 1973-77 में होता रहा है। 77 में पाक द्वारा दमन के बाद करीब 2 दषक तक षांति रही। लेकिन 1999 में परवेज मुशर्रफ सत्ता में आए तो उन्होंने बलूच भूमि पर सैनिक अड्डे खोल दिए। इसे बलूचों ने अपने क्षेत्र पर कब्जे की नाजायज कोशिश माना और फिर से संघर्ष तेज हो गया। इसके बाद यहां कई अलगाववादी आंदोलन वजूद में आ गए। इनमें सबसे प्रमुख बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी प्रमुख है।
पीओके, गिलगित-बाल्टिस्तान और ब्लूचिस्तान पाक के लिए बहिष्कृत क्षेत्र हैं। पीओके की जमीन का इस्तेमाल वह, जहां भारत के खिलाफ शिविर लगाकर गरीब व लाचार मुस्लिम किशोरों को आतंकवादी बनाने का प्रशिक्षण दे रहा है, वहीं ब्लूचिस्तान की भूमि से खनिज व तेल का दोहन कर अपनी आर्थिक स्थिति बहाल किए हुए है। यहां महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं है। गरीब महिलाओं को जबरन वेश्यावृत्ति के धंधों में धकेल दिया जाता है। 50 फीसदी नौजवानों के पास रोजगार नहीं हैं। 40 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। 88 प्रतिशत क्षेत्र में पहुंच मार्ग नहीं हैं। बावजूद पाकिस्तान पिछले 70 साल से यहां के लोगों का बेरहमी से खून चूसने में लगा है। जो व्यक्ति अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है, उसे सेना, पुलिस या फिर आइएसआई उठा ले जाती है। पूरे पाक में शिया मस्जिदों पर हो रहे हमलों के कारण पीओके के लोग मानसिक रूप से आतंकित हैं। दूसरी तरफ पीओके के निकट खैबूर पख्तूनख्वा प्रांत और कबाइली इलाकों में पाक फौज और तालिबानियों के बीच अकसर संघर्ष जारी रहता है, इसका असर गुलाम कश्मीर को भोगना पड़ता है। नतीजतन यहां खेती-किसानी, उद्योग-धंधे, शिक्षा-रोजगार और स्वास्थ्य-सुविधाएं तथा पर्यटन सब चैपट हैें।
ब्लूचिस्तान ने 70 साल पहले हुए पाक में विलय को कभी स्वीकार नहीं किया। लिहाजा वहां अलगाव की आग निरंतर बनी हुई है। नतीजतन 2001 में यहां 50 हजार लोगों की हत्या पाक सेना ने कर दी थी। इसके बाद 2006 में अत्याचार के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाले 20 हजार सामाजिक कार्यकर्ताओं को अगवा कर लिया गया था, जिनका आज तक पता नहीं है। 2015 में 157 लोगों के अंग-भंग किए गए। फिलहाल पुलिस ने जाने-माने एक्टिविस्ट बाबा जान को भी हिरासत में लिया हुआ है। पिछले 16 साल से जारी दमन की इस सूची का खुलासा अमेरिका के वॉशिंगटन में कार्यरत संस्था गिलगिट-ब्लूचिस्तान नेशनल कांग्रेस ने किया है।
हालांकि अब संघर्षरत गिलगित-बाल्टिस्तान और बलूच नागरिकों को इतनी ताकत मिल गई है कि उन्होंने चीनी दूतावास के समक्ष प्रदर्शन करने की हिमाकत भी कर चुके हैं। इन जनविद्रोहियों ने इस मौके पर कहा था कि वे चीन और पाकिस्तान के बीच बन रहे आर्थिक गलियारे के पक्ष में नहीं हैं। बीजिंग और इस्लामाबाद के बीच हुई इस संधि का एक मात्र मकसद गिलगित-बाल्टिस्तान और ब्लूचिस्तान को लूटना है। नतीजतन वे समझौते को नहीं मानते। गोया, यहां के लोग भारत की ओर ताक रहे हैं। लिहाजा भारत को चाहिए कि वह पाकिस्तान द्वारा संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किए गए प्रस्ताव के उल्लंघन का पुरजोर विरोध करे और स्थानीय जनता की आवाज को वैश्विक मंच दे।

 

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