2019 के चुनाव की दस्तक सुनें

 ललित गर्ग 
नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष की ओर से चार साल में पहली बार पेश अविश्वास प्रस्ताव बड़े अंतर से गिर जाना हो या विपक्षी एकता में रह-रह कर दरार के संकेत मिलना, मोदी -शाह की जोड़ी के प्रति आमजनता में बढ़ रहा असंतोष एवं अविश्वास हो या राजनीतिक दलों की नीति एवं नियत पर शंकाएं होना-ये स्थितियां  वर्ष 2019 के आम चुनाव की तस्वीर को जहां अनिश्चिय के धरातल पर खड़ा कर रही है, वहीं चुनावी सरगर्मियों एवं तैयारियां में भी हर तरह के हथियार अपनाने के संकेत दे रही है। आगामी चुनाव के लिये राजनीतिक जोड़-तोड़ एवं रणनीतियां व्यापक स्तर पर बन रही है, जिसका उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता पर काबिज होना है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन चुनावी सरगर्मियों में आम-जनता एवं उसकी समस्याओं के समाधान का स्वर कहीं से भी सुनाई नहीं दे रहा है। 
वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बेरोजगारी और किसानों की समस्याएं को अगले चुनाव में भाजपा के लिए खतरनाक बता दिया है। खतरनाक तो व्यापारियों की समस्याएं एवं बढ़ती महंगाई भी है। आरएसएस की आर्थिक शाखा स्वदेशी जागरण मंच के एक नेता ने कहा कि गलत आर्थिक नीतियां किसानों और युवाओं की मुश्किलों का सबब बनती जा रही है। कर्नाटक चुनाव ने 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर बहुदलीय चुनावी राजनीति के कई सारे पहलुओं को स्पष्ट किया है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं का अविश्वास इन्हीं पहलुओं में से एक है। इससे निश्चित तौर पर विपक्षी एकता की संभावनाओं को बल मिलेगा जो कि उत्तर प्रदेश के उपचुनावों और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में देखने को मिला था। जैसे-जैसे विपक्षी एकता बढ़ती जाएगी और विपक्षी वोट एकजुट होते जाएंगे वैसे-वैसे मोदी और शाह की चुनाव जीतने की रणनीति पर खतरा बढ़ता जायेगा। उनके लिये यह सोचनीय है। चुनावी राजनीति एक तरह का विज्ञान तो है ही, साथ ही एक कला भी है। आप दूसरे नेताओं के साथ कैसे ताल्लुकात रखते हैं और कैसे उनके साथ संवाद कायम करते हैं, चुनावी राजनीति की कला हमें यही बताती है। वहीं चुनावी राजनीति का विज्ञान यह सिखाता है कि कैसे छोटे-छोटे मतदाता समूहों को अपने पक्ष में करके एक प्रभावी रंग दिया जा सके। इस तरह लुभाने में मतदाता को ठगने की मानसिकता को त्यागना होगा।
मोदी-शाह के लिये यह समय चुनौती का समय है। उनकी आगामी रणनीति एवं अतीत के चार साल राजनीतिक पुरुषार्थ की खूंटी पर जीवन से जुड़े अनेक प्रश्न टांग रहा है। इन चार सालों में नरेन्द्र मोदी सरकार ने क्या खोया, क्या पाया? गणित सही-सही लगाना है। कहीं भी विवशता, व्यस्तता, व्यवस्था बहाना बनाकर बचाव नहीं दे सकती, स्वयं स्वयं को खोजने का प्रयत्न ही कोई निर्णायक परिणाम दे सकती है।
इन बिते चार सालों में आम आदमी के जीवन से जुड़ी अंतहीन समस्याओं ने मोदी सरकार के निर्णयों को कटघरे में खड़ा किया है। कहा नहीं जा सकता कि इस अदालत में कहां, कौन दोषी? पर यह चिंतनीय प्रश्न अवश्य है। हमारे देश का राजनीतिक धरातल और राजनेताओं का दिल इतना संकीर्ण कैसे हो गया कि यहां अपनों को भी अपना-सा अहसास नहीं मिलता और दिमागी सोच इतनी बौनी पड़ गई कि समान धरातल पर खड़ा आदमी भी हमें अपने से छोटा दीखने लगा? हम क्यों सीमित दायरों में बंध गए? क्यों धर्म, जाति, संप्रदाय, भाषा और प्रांत के नाम पर बंट गए? क्यों अच्छाइयों और बुराइयों के मानक बदल गए और क्यों चरित्र से भी ज्यादा चेहरों को भी मान्यता मिलने लगी?
जरूरी है समय के साथ-साथ राजनीतिक चिंतन शैली बदले। कुछ नए सृजनशील रास्ते खुलें। हम 2019 के चुनावों की तैयारी कर रहे हैं। यही क्षण है बुराइयों के विरुद्ध नैतिक संघर्ष का। इस तैयारी में से ही आम-जनता की समस्याओं के समाधान के लिये लिये कोई रोशनी प्रकट होनी ही चाहिए। भारत के समग्र विकास के रास्ते खुलने चाहिए।
यही क्षण है राष्ट्रीय चरित्र की सुरक्षा में व्यक्तिवादी मनोवृ़ित्त को बदलने का। यही क्षण है ईमानदार प्रयत्नों की शुरुआत का। यही क्षण है इस चिंतन को निर्णायकता देने का कि मंदिर, मस्जिद की दीवारों को ऊंचाइयां देते-देते- हम कहीं इंसानियत की नींव ही खोखली न कर बैठें। सफल अभियान के लिए समय विशेष की ही प्रतीक्षा क्यों? हर पल निर्माण का हस्ताक्षर बन सकता है।
बदलती भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के मंच पर बिखरते मानवीय मूल्यों के बीच अपने आदर्शों को, उद्देश्यों को, सिद्धांतों को, परम्पराओं को और जीवनशैली को हम कोई ऐसा रंग न दें कि उससे उभरने वाली आकृतियां हमारी भावी पीढ़ी को सही रास्ता न दिखा सकें। हम सिर्फ दर्शक, श्रोता और पाठक बनकर न रह जाएं। सक्रिय, समर्पित कार्यकर्ता बनकर स्वस्थ परम्परा को सचेतन बनाएं। लोकतंत्र को जीवंत करें, ईमानदार एवं पवित्र शासन व्यवस्था को स्थापित करें।
आज सत्ता से भी ज्यादा अहमियत सिद्धांत की है। सुविधवाद से भी ज्यादा जरूरत उपयोगिता और आवश्यकता के बीच संयम की है। नयी-नयी योजनाओं से भी ज्यादा जरूरत लिए गए सही निर्णयों को क्रियान्विति देने की है। सिर्फ सरकार बदल देने से समस्याएं नहीं सिमटती। अराजकता एवं अस्थिरता मिटाने के लिए सक्षम नेतृत्व चाहिए। उसकी नीति और निर्णय में निजता से ज्यादा निष्ठा चाहिए। बहुत जरूरी है मन और मस्तिष्क की क्षमताएं सही दिशा में नियोजित हों। जिस अमानवीय हिंसक दौर को कानून, व्यवस्था, दण्ड, सत्ता, शक्ति और नेतृत्व नहीं रोक सका, उसे कैसे रोका जा सकता है, इसकी रूपरेखा सामने आनी चाहिए।
राजनीतिक दलों की एकजुटता अच्छी बात है, लेकिन यह समय उन लोगों के लिए चुनौती है जिन्होंने अब तक औरों की वैशाखियों पर लड़खड़ाते हुए चलने की आदत डाल रखी है। जिनकी अपनी कोई मौलिक सोच नहीं, कोई संकल्प नहीं, कोई सपना नहीं, कोई सार्थक प्रयत्न नहीं। कोरा गठबंधन जनजीवन को शुद्ध सांसें नहीं दे पायेगा। बहुत सावधान एवं सर्तक होने की जरूरत है। चुनाव जीतना ही लक्ष्य न हो और ऐसी गलत शुरुआत भी न हो, क्योंकि गणित के सवाल की गलत शुरुआत सही उत्तर नहीं दे पाती। गलत दिशा का चयन सही मंजिल तक नहीं पहुंचाता। दीए की रोशनी साथ हो तो क्या, उसे देखने के लिए भी तो दृष्टि सही चाहिए।
आइए, अतीत को भी हम सीख बनायें। उन भूलों को न दोहरायें जिनसे हमारी राजनीतिक रचनाधर्मिता जख्मी हुई है। जो सबूत बनी हैं हमारे असफल प्रयत्नों की, अधकचरी योजनाओं की, जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों की, सही सोच और सही कर्म के अभाव में मिलने वाले अर्थहीन परिणामांे की। कहीं हम स्वयं ही स्वयं की नजरों से न गिर जाएं।
विकास के लिए समय पर लमहा स्वयं में एक स्वर्णिम अवसर है। जरूरत सिर्फ इसे पहचानने की है। पर अफसोस है कि जब यह आता है तब हमारी आंखें इसे पहचान नहीं पाती, क्योंकि इसका चेहरा बालों से ढका रहता है। जब जाने लगता है तो रफ्तार इतनी तेज होती है कि भागते अवसर को पकड़ भी नहीं पाते, क्योंकि पीछे से यह गंजा होता है। अवसर कहीं, कभी एक क्षण के लिए भी नहीं ठहरता। पंख लगाए पलक झपकते कब, कहां उड़ जाता है, पता ही नहीं चलता। बहुत कठिन है समय के साथ चलना। भाजपा हो या कांग्रेस, सपा हो या बसपा या अन्य राजनीतिक दल- एक कोशिश करें इसे पहचानने की, पकड़ने की और पूर्णता से जी लेने की। ऐसा करके ही बेवजह अविश्वास प्रस्ताव लाने के अहंकार से बचा जा सकता है। क्योंकि यह नकारात्मक राजनीति है। जब तैयारी ही नहीं थी तो प्रस्ताव क्यों लेकर आए? प्रेषक

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