लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉhindi. मधुसूदन

***हिन्दी मध्यम से उच्च शिक्षा का ऐतिहासिक उदाहर
***जनभाषा ही आर्थिक उन्नति का रहस्य।
***देश के १३१ अर ब  रुपए (प्रति वर्ष) बच सकते हैं।

(एक)  ऐतिहासिक घटा हुआ उदाहरण:
एक  घटा हुआ ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ।  चौधरी मुख्तार सिंह एक देशभक्त हिन्दीसेवी शिक्षाविद थे।१९४६ में वायसराय कौंसिल के सदस्य चौधरी मुख्तार सिंह ने जापान और जर्मनी की यात्रा  की थी;  और यह अनुभव किया था, कि यदि भारत को कम (न्यूनतम) समय में आर्थिक दृष्टि से उन्नत होना है तो उसे, जन भाषा में, जन वैज्ञानिक शिक्षित करने  होंगे ।
उन्हों ने मेरठ के पास एक छोटे से देहात में ”विज्ञान कला भवन” नामक संस्था की स्थापना की। हिन्दी मिड़िल पास छात्रों को उसमें प्रवेश दिया। और हिन्दी के माध्यम से मात्र पांच वर्षों में उन्हें एम एस सी के कोर्स पूरे कराकर ”विज्ञान विशारद” की उपाधि से विभूषित किया। इस प्रकार के, प्रयोग से वे देश के शासन को दिखा देना चाहते थे, कि जापान की भाँति भारत का हर घर ”लघु उद्योग केन्द्र” हो सकता है।
दुर्भाग्यवश दो स्नातक टोलियों के निकलने के बाद  (१९५३-१९५४) ही चौधरी जी की मृत्यु हो गई, और प्रदेश सरकार ने ”विज्ञान कलाभवन” को इंटर कॉलेज में परिवर्तित कर  दिया। वहां तैयार किए गए ग्रन्थों के प्रति भी शासन को कोई मोह  नहीं था।

(दो) जनभाषा ही, उन्नति का रहस्य:
पर इस प्रयोग ने यह भी सिद्ध तो किया ही , कि जनभाषा ही आर्थिक उन्नति का रहस्य है। जनविज्ञान, विकास की आत्मा है।

(तीन) मिडिल उत्तीर्ण छात्र मात्र ५ वर्ष में  M Sc:
हिंदी मिडिल उत्तीर्ण छात्रों को प्रवेश देकर मात्र ५ वर्ष की शिक्षा के बाद M Sc की उपाधि प्राप्त कराई गई.
अब अंग्रेज़ी द्वारा उस समय, ११ वर्ष के बाद S S C + ४ वर्ष पर  B Sc +२ वर्ष M Sc= १७ वर्ष की कुल पढाई होती थी। तो, हिंदी माध्यम से ५ वर्ष का लाभ हुआ।

(चार) चिन्तन क्षमता वृद्धि:
साथ साथ  माध्यम हिन्दी होने के कारण, वैचारिक क्षमता का बढना, स्वतंत्र विचार की शक्ति बढना, चिंतन करने का अभ्यास इत्यादि लाभ भी हुए ही होंगे। अंग्रेज़ी की  रट्टामार प्रणाली से पैदा होते, गुलाम या तोताराम तो नहीं बने।

(पाँच) अंग्रेज़ी माध्यम की  भ्रान्तियाँ:
सबसे हानिकारक भ्रान्ति छात्र को गलत दिशामें भटकाना है।
(१) छात्र अंग्रेज़ी को ही बुद्धिमानीं का लक्षण मानता है।
(२) जिस आयु में उसका चिन्तन या विचार का विकास होना होता है; वह गलत दिशामें ,
अंग्रेज़ी को ही सीखने में लगा देता है।
(३) बहुतेरे छात्र यही भ्रम जीवन भर पालते हैं। फलस्वरूप  हम स्वतंत्र चिन्तक या संशोधक के बदले अंग्रेज़ी के गुलाम अफसर पैदा करते हैं।

(छः) राष्ट्र की हानि:
जिस  प्रजा को  हम १२ वर्षों में M Sc करवाकर सुशिक्षित करवा लेते, उसे अंग्रेज़ी माध्यम से १७ वर्ष लगते हैं। प्रति छात्र हम ५ वर्ष व्यर्थ करते हैं। उतने ही वर्ष वह छात्र उत्पादन की प्रक्रिया में सम्मिलित होकर
स्वयं की और राष्ट्र की प्रगति में सहयोग कर सकता था, उससे हम वंचित रहते हैं।पाँच वर्ष अधिक धनार्जन और उत्पादन चक्र में सम्मिलित हो सकता था।

(सात) अंग्रेज़ी या अन्य विशेष भाषा चाहो तो?
अब जिन्हें अंग्रेज़ी की ही पढायी करनी है, उन्हें आगे और २ वर्ष मात्र अंग्रेज़ी ही पढाइए। जैसे पी. एच. डी. के लिए (१२ क्रेडिट) ४ पाठ्य पुस्तकों के तुल्य जर्मन, फ़्रांसीसी, रूसी इत्यादि, किसी भी एक भाषा का अध्ययन करना पडता है। इसी के समान केवल अंग्रेज़ी ५ विषयों जितना, प्रति वर्ष अंग्रेज़ी पढाकर शिक्षित करें। दो वर्षों में इच्छित भाषा  का स्वामित्व प्राप्त कर लेंगे।

(आठ) अन्य भाषाएँ:
ध्यान रहे विविध भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है।
कभी रूसी आगे थी, कभी जर्मन थी, कभी अंग्रेज़ी आगे होती है।
हमें पर्याप्त मात्रा में चीनी, अरबी, रूसी, फ्रान्सीसी, जर्मन, हिब्रु, जापानी, इत्यादि भाषाओं के  भी जानकार चाहिए।
आज अंग्रेज़ी के कुछ अधिक चाहिए, पर सारा सट्टा अंग्रेज़ी पर ही लगाना मूर्खता होगी।
हमारी अपनी संस्कृत, पालि, तमिल, अर्धमागधी इत्यादि भाषाओं के भी विद्वान चाहिए।
सीमापर चीनी गति विधियों को जानने के लिए चीनी के जानकार काफी मात्रामें चाहिए।


(नौ)आर्थिक आँकडों का गणित:

अभी आर्थिक आँकडों का गणित सामने रखता हूँ।
जन भाषा के माध्यम से वही ज्ञान पाने में,  जो छात्र अंग्रेज़ी द्वारा पाता है, छात्र के कमसे कम ४ वर्ष बचते हैं।
देशके  I N Rupees  287.5 billion (US$5.23 billion)बचते है।  —२०११ के आँकडों के अनुसार।
देश के २८७.५ अबज रुपए बचते हैं। एक अबज =१०० करोड होते हैं।
{ये आँकडे कपिल सिब्बल जी के एक विवरण से लिए गए हैं।}

(दस) समर्पित और आदर्श शिक्षक:
शिक्षक समर्पित और आदर्श  होने चाहिए। भ्रष्ट शिक्षक नहीं चलेंगे।क्यों कि, शिक्षक राष्ट्र के प्रगति चक्र में प्रबलातिप्रबल कडी है। आरक्षित या अरक्षित जो भी हो, पर ज्ञानी और प्रतिबद्ध शिक्षक चाहिए।

जैसे शिक्षा का “भाषा-माध्यम” मौलिक घटक है। उसी प्रकार शिक्षक भी संस्कार देता है, ज्ञान देता है, अनुकरण के लिए आदर्श उपलब्ध करता है।

शिक्षक को गुरू ब्रह्मा, विष्णु, महेश इत्यादि माना है…… आप जानते हैं। गुरू संस्कार का पुंज है। छात्र गुरूका बहुतेरा अंधानुकरण करता है।


(ग्यारह)आर्थिक लाभ- हानि
:
जो ज्ञान अंग्रेज़ी द्वारा, M Sc तक पढकर, उपाधि(पदवी) अंग्रेज़ी के कारण, १७ वर्षों में मिलती है, वही हिन्दी द्वारा, १२ वर्ष में प्राप्त होती है। तो हमारा शिक्षापर किया गया ५/१७ व्यय बच जाता है.
{टाईम्स ऑफ़ इंडिया मई १३ -२०११ का समाचार}
As a part of the tenth Five year Plan (2002–2007), the central government of India outlined an expenditure of 65.6% of its total education budget of I N Rupees  438.25 billion (US$7.98 billion) i.e. I N R  287.5 billion (US$5.23 billion)

I (Reporter) was sharing the dais with minister Kapil Sibal in Hyderabad sometime back, where he mentioned that the number of students in India under the age of 14 is 134 million — a remarkable number. {टाईम्स ऑफ़ इंडिया मई १३ -२०११ का समाचार} इन आँकडो का आधार पर निम्न गणित प्रस्तुत है।

(बारह)छात्र वर्षों की बचत:
१३४ मिल्लियन छात्र १४ वर्ष से कम आयु के हैं। प्रत्येक छात्र के ५ वर्ष भी लगभग लगाएं, तो १३४x५=६७०,०००,०००  छात्र वर्ष बच जाते हैं।
अब आप का राष्ट्रीय व्यय कम होता है।
६७० मिलियन वर्ष का अधिक काम कुल छात्र  कर पाते।
ऐसा गुणाकारवाला गणित हमारे नेताओं ने करना चाहिए था।
ऐसे अनुमानित गणित से प्रायः ३० प्रति शत  बचत होती है. अर्थात ०.३x४३८ =१३१ बिलियन रुपए= १३१०००००००००००० रुपए बच जाते हैं|
पाठकों कुछ स्थूल हिसाब और विचार आपके समक्ष रखे हैं।

सूचना:

ये अनुमानित गणित स्थूल ही है। पर आँख खोलनेवाला है। अफ्रिका के ४६ देश परदेशी माध्यम के कारण पिछडे हैं।क्या हम अफ्रिका के उदाहरण से कुछ सीख सकते थे? या हम मूर्ख थे ?
क्रमशः आप की टिप्पणियों की दिशा जानकर अगला आलेख बन सकेगा। मुक्त विचार रखिए।

15 Responses to “हिन्दी शिक्षा माध्यम का आर्थिक लाभ (एक)”

  1. मनोज ज्वाला

    मनोज ज्वाला

    अपने देश के नीति-मियन्ताओं की आंखों में ऊंगली डाल कर उनके कान उमेठ कर यह तथ्य और सत्य समझाना होगा । मगर यह बहुत मुश्किल है । क्योंकि चालू शिक्षा-पद्धति के कारण जनता के दिमाग में ठीक उल्टी बातें भरी हुई हैं, हमारे आपके जैसे लोग जो इस तथ्य व सत्य को जान रहे हैं , बहुत कम हैं । बवजूद इसके , समस्या का कारगर निदान यही है , इसे लागू करना ही होगा ।

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr.Madhusudan

      Dhanyavad. Manoj ji. “Madhyam ke Balav ka Prabandhan”– Bhi Padhane ki krupa karen. Kuchh aur Bindu Dalen hain. Pravas par hun. Atah Roman ka prayog.

      Reply
  2. Rekha Singh

    अपनी भाषा मे शिक्षा प्राप्त करने से जीवन जीने के तरीके भी बच्चों मे स्वतः विकसित होते है । हां अन्य भाषाओं का ज्ञान भी बहुत आवश्यक है , बच्चो के बहुमुखी विकास के लिए , जैसा की लेख मे समाहित है । मेरा अपना अनुभव है की जब बालक – बालिका अपनी भाषा मे पाठशाला मे नही पढ़ते तब उनमे अव्यवहारिक संस्कार जन्म लेते है और कभी कभी अपने माता -पिता , सगे सम्बन्धी , दादा दादी , नाना -नानी , अपना खान -पान , अपनी वेश -भूषा , अपने देश और संस्कृति को नीचा समझने लगते है । आगे चलकर यही लोग बड़े होकर स्वयं , अपने परिवार , समाज , देश के लिए उचित कार्य नही करते । प्रत्येक भाषा अपने संस्कार और संस्कृति को लिए हुए होती है अतः प्रथम हमे अपनी भाषा मे शिक्षा प्राप्त करना चाहिए । बाद मे एक विषय के रूप मे अन्य भाषाओ का ज्ञान प्राप्त करना उचित होगा । शिक्षा का माध्यम अपनी भाषा ही होनी चाहिए ।

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के पूर्वाध्यक्ष का निम्न संदेश एक प्रमाण पत्र है। पाठकों के सामने रखने में गौरव अनुभव कर रहा हूँ। साथ तिवारी जी का आभार भी व्यक्त करता हूँ।—-मधुसूदन
    ———————————————-

    Subject: Re: हिन्दी माध्यम से शिक्षा का आर्थिक लाभ—मधुसूदन

    आ; मधु भाई, नमन
    मैं प्रायः आपके सारे आलेख पढता हूँ, पर आपको लिख नहीं पाता| इसका दुःख है|

    हिंदी के रास्ते में कठिनाईयां पैदा करने के लिए कई बहाने अपनाये जाते हैं, जैसे हिंदी पढ़ने से रोजगार नहीं मिलेगा, वैज्ञानिक विषय हिंदी में नहीं पढ़ाये जा सकते; आदि | आपने इन कई अवरोधों को निशाना बनाकर लिखा है, ताकि इन कठिन सवालों का जबाब आलोचकों को मिल सके| यह अपने में बहुत बड़ी बात है|

    आज के युग में जहां हिंदी के तथा:कथित समर्थक हिंदी के तवे पर अपनी रोटियां सेंकें में लगे हैं, फोटो खिचाने से लेकर सरकारी नौकरियां हड़पने में; आपने इन कठिन विषयों पर तर्कपरक लेख लिख हिंदी की बड़ी सेवा की है| इसके लिए आपको नमन|

    लिखते रहें….रवि बाबू के शब्दों में…….’तुमि एकला चलो रे “.. .. इस एकांत यात्रा में समर्थन की कमी खटकती तो है, पर एक गर्व, एक तोष का भी अनुभव होता है…..

    पल्ल्वी जी को सादर नमन…

    सादर प्रणाम सहित

    सुरेन्द्र नाथ तिवारी

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  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    इ मैल से आया संदेश।समय लेकर टिप्पणी देने के लिए, लेखिका का आभार।—मधुसूदन।
    ========================>

    आदरणीय मधुसूदन जी ,
    आपके द्वारा उल्लिखित आँकड़े अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं । समय और धन सम्बन्धी बचत का गणित वस्तुत: अत्यधिक
    समयसाध्य और परिश्रमसाध्य है । शिक्षाविदों और शासन के उच्च पदाधिकारियों का ध्यान इस आलेख की ओर आकृष्ट हो और वे इस पर गम्भीरता से विचार करके शिक्षणप्रणाली की योजनाएँ बनाएँ , तभी आपका परिश्रम सफल होगा और देश का कल्याण हो सकेगा । इस अत्यन्त उपयोगी एवं व्यवहारिक आलेख के लिए अनेकानेक साधुवाद!!
    सादर,
    शकुन्तला बहादुर

    Reply
  5. Mohan Gupta

    ड्र. मदुसूदन जी ने अपने इस लेख द्वारा हिंदी विरोधी लोगो के तर्कों को प्रभावहीन कर दिया और एक सत्यता को अधिक वल दिया हैं। एक विदेशी भाषा के माधयम से शिक्षा में , विद्यार्थी का अधिक समय विदेशी भाषा सिखने में खर्च होता हैं और विषय के ज्ञान पर बहुत कम समय खर्च करता हैं। अंग्रेजी भाषा से कौन कितना बुद्धिमान बन जाता हैं , यह कहना कठिन हैं वल्कि व्यक्ति अंग्रेजी वस्तुऐ , खान पीन , पहनाबा इत्यादि अपना लेता हैं। यह एक आश्चर्य का विषय हैं भारत में अंग्रेजी को इतना अधिक महत्व प्राप्त हैं जबकि भारत में संस्कृत , तमिल , तेलगु , बंगाली जैसी समृद्ध भाषाएँ है। और अन्य विदेशी भाषाए जैसे जर्मन , फ्रांसीसी , रूसी , चीनी , जापानी जैसी भाषा की अबहेलना की जाती हैं।
    कुछ वैज्ञानिको ने कई प्राचीन प्रचलित भाषाओं जैसे संस्कृत , लैटिन पर अनुसन्धान किया हैं। उन्होंने पाया कोई एक भाषा लगभग २५० वर्षो तक चोटी पर रहती हैं , फिर पतन होना चालू हो जाता हैं। यदि भारत आज अंग्रेजी को महत्व देना बंद करदे , भारत पढ़ाई और कामकाज के लिए हिंदी / संस्कृत को अपना ले तो विश्व में अंग्रेजी का महत्व बहुत कम हो जायगा , हिंदी या संस्कृत भाषा में शिक्षा प्रदान करने से छात्र वर्षो की बचत और आर्थिक बचत का भी ड्र. मधुसूदन जी ने बहुत अच्छा विश्लेषण किया हैं। हिन्दी , संस्कृत या अन्या किसी भारतीया भाषा द्धारा शिक्षा प्रदान करने से समाज और राष्ट्रहित का भला होता हैं। छात्र भी भारतीया इतिहास के बारे में अधिक जानेगा। नेहरू ने अपनी गलत नीतियों द्धारा भारत की कई पीढ़ियों को सांस्कृतिक गुलामी की बैडिओ में जडक दिया हैं।

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  6. डॉ. राजेश कपूर

    राजेश कपूर

    * डा. साहेब आपका कहना मूल्यवान सत्य है. पर यह सत्य आजतक नेहरू परंंपरा के मूढोंको समझ नहीं आया. समझे की उनकी नीयत ही नहीं थी.

    * स्व भाषा के माध्यम से जापान के विकास का प्रमाण आपने दिया था. चीन, फ्रांस, जर्मन जैसे देशों के उदहारण हमारे सामने हैं.

    ** एक और भयावह समस़्या हम भारतीयों के लिये मुसीबत बन चुकी है पर इस पर अभीतक किसी का ध्यान ही नहीं ग़ा है.इस समस्या का निराकरण क्ये बिना भारत की प्रतिभाओं को बचपन में ही मार देने का काम जारी रहेगा.
    – भारत के विद्यालयों के लाखों बच्चों से मैं गत १५ वर्ष में मिला हूं. उनमें से ९५-९८% की सीखने-समझने की क्षमता लगभग नष्ट हो चुकी है. सच तो यह है कि नष्ट तर दी गई है. न्स्तेज चेहरे, बुझी आंखें,पीले व कमजोर दांत, अवसाद व तनाव से ग्रस्त. सूखा दुर्बल या गुब्बारे की तरह फूला बेजान शरीर.
    यह दृश्य अधिकांश विद्यालयों का है. ऐसी युवा पीढी देश व स्वयं के लिये बोझ नहीं बनेगी ?
    क्यों है ऐसा ?
    – विश्व के अनेक वैज्ञानिकों के अनुसार अजीनोमोटो या ‘मोनोसोडियम ग्लूटामेट’ हमारी सीखने-समझने की क्षमता को नष्ट कर देता है. तरोडों स्नायूकोष अत्यधिक उत्तेजित होकर नष्ट होजाते हैं.
    अफीम या स्मैक की तरह नशेड़ी बना देता है और इसके बिना रहना कठिन हो जाता है. बार-बार इसे खाने के लिये हम बाध्य हो जाते हैं. लीवर सहित पाचन तंत्र भी नष्ट होता जाता है. शरीर फूलने लगता है या क्षीण हो जाता है.
    टॉफी से लेकर पीजा, न्यूडल, बर्गर, हर डिब्बा बन्द आहार में यह विष तथा अन्य अनेक रसायन डले रहते हैं हमारी पूरी पीढी की मानसिक, शारीरीक व प्रजनन क्षमता को नष्ट कर रहे हैं. इतनी विकराल राष्ट्रीय आपदा पर किसी का भी ध्यान नहीं ?
    – इसी प्रकार ऐल्यूमीनि़म है. इसके प्रयोग से भी स्नायुकोष, लाल रक्तकण नष्ट होने के साथ और अनेक हानियां होने के प्रमाण वैज्ञानिक दे चुके हैं.
    हर घर. होटल में इन्ही बर्तनों का प्रयोग निरंतर बढ रहा हैं. भारत के कुछ करोड़पति व अरबपति परिवार इसका अपवाद हैं.
    – सोडि़म लॉरिल सल्फेट जैसे अनेक कैंसरकारक रासायनों से युक्त शैम्पू व सौंदर्य प्रसाधनों के घातक प्रभावों को भी करोंडों बच्चे और युवा भुगत रहे हैं.

    # मानसिक व शारीरिक क्षमताओं को नष्ट करने वाले इन भयावह “प्रयासों” ता समाधान किये बिना अगली पीढी को सक्षम, सशक्त बनाना कैसे सम्भव होगा ?

    कार्पोरेटों के इन इन घातक प्रयासों के प्रति जागृत करने का काम अमेरीका में तो डा. जोसेफ मैरकोला जैसे लोग कर रहे हैं. पर भरत तो इन सब से अनजान अपनी बरबादी की इबारत अपने ही हथों लिख रहा है. कौन रोकेगा, कैसो रूकेगा यह गुपचुप बरबादी का अभियान ???

    Reply
  7. मुकुल शुक्ल

    निज भाषा उन्नति अहे अहे सब उन्नति को मूल ।
    बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिए को शूल ।।

    चचा नेहरू द्वारा घोंपा शूल हम आज तक नहीं निकाल पाये | तीन पीढ़ियाँ काले अंग्रेज़ पैदा किए जिनके कारण आज भी हम सिर्फ पिछलग्गू और अनुसरणकर्ता ही बने हुए है | काश की ये हिसाब हमारे नीति निर्माता भी समझें और अपनी पिछली गलतियों को सुधारें| आज भी अंग्रेज़ी हमारे पिछड़ेपन के मूल मे है बस इतनी बात ये काले अंग्रेज़ समझे और इस शूल को हटाएँ तो देश की संस्कृति, सभ्यता और अर्थव्यवस्था की धारा बह निकलेगी और हम दुनिया के सबसे विकसित ही नहीं बल्कि उन्नत राष्ट्र भी होंगे| ऐसा राष्ट्र जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठा कर चलेगा और दुनिया को शांति की नयी क्रांति देगा |

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  8. मानव गर्ग

    माननीय मधु जी,

    आपने सरल गणित के माध्यम से नेत्रोन्मीलन वाले (आँखें खोलने वाले) तथ्य प्रस्तुत किए हैं । जो भाव और प्रतीति हमारे पहले से ही थे, उन्हें सङ्ख्या प्रदान करके आपने सशक्त बना दिया है । हृदयहर्षितोऽहम् । ते धन्यवादाः ।

    १३१ बिलियन रूपये प्रति पञ्च वर्ष अतः १३१/५ = २६.२ बिलियन रूपये प्रति वर्ष की बचत, ऐसा मेरा अनुमान क्या सही है ? कृपया स्पष्ट करें ।

    रेखाङ्कित करना चाहूँगा कि यहाँ दिया गया गणित इस प्रहण (assumption) पर आधारित है कि प्रत्येक छात्र एम. एस. सी. तक की पढ़ाई १२ वर्ष में करने में सक्षम है (यदि यह पढ़ाई ५ वर्ष की आयु में आरम्भ हो, तो १७ वर्ष के छात्र के पास एम. एस. सी. का प्रशस्तिपत्र हो सकता है) । इस प्रहण के प्रति आपने चौधरी मुख्तार सिंह जी का एक उदाहरण भी दिया है । परन्तु प्रहण पर विश्वास दृण करने के लिए अतिरिक्त उदाहरणों की आवश्यकता होगी । जापान में एम. एस. सी का प्रशस्तिपत्र सामान्यतया छात्र किस आयु में प्राप्त करता है? यदि हम यह दर्शा सकें कि जापान में मातृभाषा माध्यम से पढ़ाई करके छात्र २२ वर्ष से कम आयु में ही एम. एस. सी. प्रशस्तिपत्र प्राप्त कर लेेता है, तो यह हमारे प्रहण को सिद्ध करने वाला ठोस प्रमाण होगा ।

    केवल आङ्ग्लभाषा पर ही सारा दाँव लगाना उचित नहीं, ये तर्क भी बहुत अच्छा लगा !

    भवदीय मानव ।

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  9. प्रतिभा सक्सेना

    अपनी मातृभाषा में शिक्षा व्यवस्था हर प्रकार से समाज,राष्ट्र तथा व्यक्ति के हित में है .समय साधन और ऊर्जा का अपव्यय न हो ,मानसिक बोझ न बन कर शिक्षा आसानी से आत्मस्थ एवं जीवन में समरस हो सके इसके लिए मातृभाषा का माध्यम ही सर्वथा उपयुक्त है – झवेरी जी के कथन में निहित सत्यों से कौन इन्कार कर सकता है -उनके प्रयास स्तुत्य हैं !

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  10. sureshchandra.karmarkar

    आदरणीय मधुसूदनजी ,आप ने एक वास्तविक बात को सामने रखा हैं/मैं स्वयं एक ग्रामीण व्यक्ति हुँ. और १९६२ मैं मेरे देहात मैं महाविधालय नहीं होने से जिला मुख्यालय मन्दसौर (म.प्र। )पढने गया था। शुद्ध रूप से हिंदी माध्यम होने से दिसम्बर तक तो हम ग्रामीण परिवेश के लोगों को नींद आती थी. किन्तु आपको आशचर्य होगा उस ज़माने मैं कहावत थी की ”फर्स्ट ईयर इज ए रेस्ट ईयर” और हम लोग ही उत्तीर्ण हुए जो देहातों से आये थे। हम लोगों के पास साइकिलें नहीं थी/हमारा भोजन हम बनाते थे /१९६२/६५ मैं दो युद्ध हुए तो एनसी सी अनिवार्य थी /पैदल परेड पर जाते थे. इसी प्रकार रतलाम आने के बाद मैंने एम एस सी भौतिकी मैं किया। तो वही निष्कर्ष। हिंदी माध्यम से आये छात्र उत्तीर्ण। आपने अकाट्य प्रमाण दिए हैं.उनको कोई नकार नहीं सकता उच्च अधयन संस्थानों मे हैं. यदि आप सरीखे ४-५ व्यक्ति मिलकर भारत शासन को यह समझा सकें तो इस देश की जनता पर यहाँ उपकार होगाआप भारतीय नेताओं और मीडिया की और आस लगाएंगे तो कठिनाई होगी.behatar हो आप सरीखे जो लोग बहार है वे एक फोरम बनाये /और अन्ना हजारे/कैलाश सत्यार्थी ऐसे समाज सेवकों को साथ मैं ले तो इस देश के लाखों अभागो की सेवा होगी.

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आप का अनुमान सही ही है। पारदर्शक (obvious)गलती है।
      आलेख सुधार कर के ऊपर भेजा जाएगा।–धन्यवाद
      =========>
      जापानी भाषा से तुलना अनुचित है।
      जापानी कठिनातिकठिन भाषा है। २-३ आलेख प्रवक्ता में ही मिलेंगे।

      जापानी छात्र, शालांत शिक्षा तक मात्र २००० शब्द सीखता है।
      भूत-वर्तमान-भविष्यत इत्यादि काल नहीं होते।

      काल, संदर्भ से अनुमानित होते हैं।
      भाषा ही जापानियों को कठोर परिश्रम का अभ्यास करवा देती है।
      साथ साथ अभिव्यक्ति भी अनुमानतः मर्यादित होती होगी। चीनी की भी यही स्थिति है। इस लिए चीनी-जापानी विचार और अभिव्यक्ति भी सीमित होती ही होगी। कठोर परिश्रम ही पुष्ट होता होगा।
      ——————————————
      देवनागरी वाले हम जापानी के समान परिश्रम कर, बडी सरलता से, चार भारतीय लिपियाँ (भाषाएँ)सीख सकते हैं।—-
      (—संक्षेप में उत्तर दिया -विस्तार आलेख बन जाएगा)
      ———————————————————————-
      —सारा मैं ने प्रायः ५०-५५ आलेखों में आवरित किया है।
      –कृपया–सारी टिप्पणियों के भी उत्तर देख लो–पुस्तक में जाने से पहले–तो एक समीक्षा का लाभ होगा।
      ——————————————————————–
      कभी देख लेना। —-आप के प्रायः समस्त प्रश्नों के उत्तर दिए जा चुके हैं।
      प्रश्न भी अनेक विद्वान, प्राध्यापक, लेखक पाठकों ने उठाए हैं।
      हिन्दी अंग्रेज़ी टक्कर १ पर ४२ टिप्पणियों में प्रश्नोत्तर है। कभी ठीक पढने का समय निकालना।

      ———————-
      मराठी में कहा है, स्वामी रामदास नें—
      केल्याने होत आहे रे। आधि केलेच पाहिजे।
      करने से होता है।–पहले करना ही चाहिए।
      तर्क की अपनी मर्यादा होती है।
      ———————————-
      यह समाज शास्त्र जैसे विषय को स्थूल रूपसे देखता हूँ। बहुत बाल की खाल नहीं निकालता–कुछ तारतम्य पूर्वक सोचता हूँ।
      ———————-
      शुभेच्छाएं।
      डॉ. मधुसूदन

      Reply
      • मानव गर्ग

        माननीय मधु जी,

        समय मिलने पर हिन्दी अंग्रेजी टक्कर अवश्य पढ़ूँगा । उसके पश्चात ही इस विषय में अपने अन्य प्रश्न रखूँगा ।

        धन्यवाद,
        भवदीय मानव ।

        Reply
  11. Durgashanker

    क्या आपने माननीय मोदी जी को माननीय ओबामा जी के साथ कई कार्यक्रमो में बोलते हुए नही सुना? कुछ जरूर देखा होगा । जब वो हिंदी में बोलते हैं तो उनकी बोलने की क्षमता, गति तथा हाथ व चेहरे के हावभाव सभी स्वाभाविक व पराकृतिक होते लगता था । जब वो अंगरेजी मे बोलते थे तब वो मानो एक रोबोट की तरह लगते थे ।

    अपनी मात्रभाषा में न सिर्फ़ हम अच्छे बल्कि अचूक तथा नया, हृदय से inventive भी बोलते हैं ।

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आप के कथन से सहमति है। शायद कुछ अपवाद होंगे।कुछ ऐसे अपवाद भी हैं, वे “हीनता ग्रंथि” से पीडित के कारण मानेंगे नहीं।वे गुरू ग्रंथि ओढकर घूमते हैं।
      एक हमारे ऐसे ही मित्र जब सोए थे, तो उनपर हमारे एक नटखट मित्र ने शीतल जल, छिडका तो मातृभाषा में चीखते-जाग गये। अब, बोलिए।

      ९० % ऐसे लोग हैं, जो अंग्रेज़ी की प्रशंसा करते हैं, वे संस्कृत जाने बिना हिन्दी का विरोध करनेवाले हैं।
      कुछ ढोंगी है, कुछ आलसी भी है; और कुछ तो विचार करने में असमर्थ है–अपने आप को उन्नत कहाने के लिए, नकल करनेवाले हैं।
      कुछ शायद इसके अपवाद होंगे। पर मुझे उनका अनुभव नहीं हुआ है।ऐसा प्रमाणिक मत रखता हूँ।

      बहुत धन्यवाद।

      Reply

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