मुझे तुमसे नफरत है अरुंधती

-आवेश तिवारी

उसका बस चले तो वो हिंदुस्तान के सिर्फ इसलिए टुकड़े-टुकड़े कर दे क्यूंकि ऐसा करने से वो भीड़ से अलग नजर आएगी, उसके पास हत्याओं को वाजिब ठहराने के तमाम तर्क हमेशा मौजूद रहते हैं, क्यूंकि इसे वो खुद को महान साबित करने का औजार समझती है, संभव है इसके बहाने वो नोबेल पुरस्कार पाने की कोशिश कर रही हो। वो वामपंथ का वो क्रूर चेहरा है जिसका इस्तेमाल मीडिया कभी अपनी टीआरपी बढाने में तो कभी व्यवस्था के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करती है। संभव है बहुतों को उससे मोहब्बत हो लेकिन मैं उससे नफरत करता हूँ, क्यूंकि उसे राष्ट्र के अस्तित्व से ही नफरत है। हम बात अरुंधती राय की कर रहे हैं, वो अरुंधती जिसे हिन्दुस्तान भूखे नंगों का हिंदुस्तान नजर आता है वो अरुंधती जिसे सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहे देश में खड़ी समस्याओं में देश की बेचारगी नजर नहीं आती, क्यूंकि इसका जिम्मेदार वो लोकतंत्र को मानती है। क्यूंकि ये वही लोकतंत्र है जहाँ वो खुलेआम माओवादी हत्याओं को जायज ठहरा सकती है क्यूंकि ये वही लोकतंत्र है जहाँ पर वो संसद भवन पर हमला करने वालों की खुलेआम तरफदारी कर सकती है क्यूंकि ये वही लोकतंत्र है जहाँ वो राजधानी में हजारों की भीड़ के बीच कश्मीर को भारत से आजाद करने का आवाहन करते हुए और युवाओं को आजादी की इस लड़ाई में शामिल होने का भाषण देने के बावजूद ठहाके लगा सकती है।

कश्मीर पर वहां की जनता का मत महत्वपूर्ण है इससे बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन ये भी उतना ही बड़ा सच है कि किसी को भी वहां की जनता पर जबरिया या फिर वैचारिक तौर पर गुलाम बनाकर या उनका माइंडवाश करके उन पर शासन करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता |अरुंधती जब कश्मीरियों को आजादी देने के लिए हिंदुस्तान में हिन्दू और आर्थिक अधिनायक वाद का उदाहरण देती हैं, तो ये साफ़ नजर आता है कि वो श्रीनगर में रहने वाले उन २० हजार हिन्दू परिवारों या फिर ६० हजार सिखों के साथ- साथ उन मुसलमानों के बारे में बात नहीं कर होती हैं जिन्हें आतंकवाद ने अपनी धरती ,अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। ये सच है कि बंदूकों और बूटों के बल पर देशभक्त नहीं पैदा किये जा सकते, और कश्मीर ही नहीं समूचे देश में मानवाधिकारों की स्थिति बेहद चिंताजनक है, लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए, ये हमारे समय की समस्या है इसका समाधान राजनैतिक और गैर राजनैतिक तौर से किये जाने की जरुरत है, कभी अरुंधती ने देश की जनता या फिर अपने चाहने वालों से कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति पर आन्दोलन चलाने की बात तो नहीं की, हाँ पुरस्कारों के लिए कुछ निबंध या किताबें लिख डाली हो तो मैं नहीं जानता, लेकिन अरुंधती जैसे लोगों के द्वारा मानवाधिकारों की आड़ में राष्ट्र के अस्तित्व को चुनौती दिया जाना कभी कबूल नहीं किया जा सकता। मुझे याद है अभी एक साल पहले मेरे एक मित्र ने अरुंधती से जब ये सवाल किया कि आप कश्मीर फ्रीडम मूवमेंट के समर्थन में हैं तो उन्होंने कहा कि नहीं… “मैं कश्मीर के फ्रीडम मूवमेंट के समर्थन में हूं ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि वहां एक मिलिटरी ऑकुपेशन (सैन्य कब्जा) हैं। कश्मीर में आजादी का आंदोलन बहुत पेचीदा है। अगर मैं कहूं कि मैं उसके समर्थन में हूं तो मुझसे पूछा जाएगा कि किस मूवमेंट के। ये उन पर निर्भर करता है। एज ए पर्सन हू लिव्स इन दिस कंट्री आई कैन नॉट सपोर्ट द सेपेरेशन ऑफ पीपुल इन दिस मिलिट्री ऑकुपेशन”। और अब वही अरुंधती कहती हैं कि भारत को कश्मीर से और कश्मीर से भारत को अलग किये जाने की जरुरत है, एक ही सवाल पर बयानों में ये चरित्र का संकट ,जो अरुंधती पर निरंतर हावी होता जा रहा है।

अरुधती जैसे लोगों के अस्तित्व के लिए पूरी तौर पर समकालीन राजनीति जिम्मेदार है, वो राजनीति जिसने भ्रष्टाचार के दलदल में पैदा हुई आर्थिक विषमता और संस्कृति को ख़त्म करने के कभी इमानदार प्रयास नहीं किये, कभी ऐसे प्रयोग नहीं किये जिससे कश्मीर की जनता देश की मिटटी, देश के पानी, देश के लोगों से प्रेम कर सके, कांग्रेस और फिर भाजपा (वामपंथ को देश नकार चुका है, ये इस वक्त का सबसे बड़ा सच है) ने सत्तासीन होने के बावजूद कभी भी कश्मीर और कश्मीर की अवाम की आत्मा को टटोलने और फिर उसे ठेंठ हिन्दुस्तानी बनाने के लिए किस्म भी किस्म के प्रयोग नहीं किये, अगर कोई प्रयोग हुआ तो सिर्फ सेना का या पाकिस्तान से जुड़े प्रोपोगंडा का। जिसने हमें बार-बार बदनाम किया, और अब अरुंधती और गिलानी जैसे लोगों के हाँथ में हिंदुस्तान को कोस कर अपना खेल खेलने का अवसर दे दिया। अरुंधती और उनकी टीम हरे या फिर भगवा रंग में आतंक की खेती करने वालों के समानांतर खड़ी है। ये उतना ही नाकाबिले बर्दाश्त है जितना बाबरी पर हमला या फिर गोधरा एवं बाद में पूरे गुजरात में हुई हत्याएं। कहते हैं कि व्यक्ति को तो माफ़ किया जा सकता है राजनीति में माफ़ी नहीं होती, हिंदुस्तान की राजनीति में जो गलतियाँ हुई उनका खामियाजा न सिर्फ कश्मीर बल्कि पूरा देश भुगत रहा है, व्यवस्था के पास बहाने हैं और झूठे अफ़साने हैं। अगर गांधी जीवित होते तो शायद कश्मीर में जाकर वहीँ अपना आश्रम बनाकर रहने लगते और कश्मीरियों से कहते हमें एक और मौका दो, फिर से देश को न बांटने को कहो, अगर हम दुश्मन के सर पर भी प्यार से हाँथ फेरेंगे तो ये बात कभी नहीं भूलेगा, कश्मीर और कश्मीर की अवाम हमारी अपनी है ये बात दीगर है कि पिछले बार गोडसे ने मारा इस बार अरुंधती जैसे कोई आगे आता और उनके सीने में खंजर भोंक जाता।

12 thoughts on “मुझे तुमसे नफरत है अरुंधती

  1. जब उसे बुकर पुरस्कार मिला और समाज के अन्त्यज जन मानस के लिए संघर्षों में उसकी अगुवाई रही तब हम भी ओमप्रकाश शुक्ल जी के हमसोच हुआ करते थे .,किन्तु जब ऐसे संवेदनशील मामले मैं जिसमें भारत को न केवल आतंकवाद अपितु अमेरिका -पाकिस्तान और चीन की त्रयी से निपटना हो तो ऐसे में कश्मीर पर अलगाव परस्त टिप्पणी को समर्थन दे पाना असम्भव है , अरुंधती ने पचमढ़ी में जो बंगला बनाया था वो भी अवेध पाया गया और जमीन दोज किया जा रहा है ..जो लोग व्यक्तिगत स्कोर के लिए खेलते हैं वे छिप नहीं पाते ,विना विराट संगठनात्मक संघर्ष के कोई आर्थिक ,सामाजिक या राजनेतिक परिवरतन की कोई गुंजाईश नहीं .कुछ लोग वन मेन आर्मी जैसा होना दिखाकर सर्व हरा क्रांती के सिलसिले को कुचलने में जाने -अनजाने पूंजीवादी साम्राज्यवाद की मदद कर रहे हैं उनमें -महाश्वेता देवी ,स्वामी अग्निवेश ,श्री श्री रविशंकर और अरुंधती जैसी स्वनाम धन्य शख्सियतें शामिल हैं .

  2. तिवारी जी अपने अरुंधती के मूल्याङ्कन में बहुत सख्त टिप्पड़ी की है,एक बात बताए जब वह का संविधान अलग है ,झंडा अलग है,पुरे दवश का कोई नागरिक वह जायजाद नहीं खरीद सकता तो कश्मीर की संवैधानिकता पैर सवाल उठान कही से गलत नहीं है.वह भी तब जब कश्मीर के मुख्य मंत्री जो कांग्रेस की मिलीजुली सरकार चल रहे है,वह भी तो यही बात बार-बार दुहरा रहे है की कश्मीर का भारत में विलय पूरीतरह नहीं हुआ है तो आपलोग खामोश हो जाते है और मओवादियो और साथ में निरीह आदिवासियो के हक के लिए आवाज उठाने से इसका कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए.संसद हमले के आरोपी जिसे सवोच्च न्यायलय ने सालो पहले फासी की सजा सुने उसे सम्मान के साथ बिरियानी खिलाना देश द्रोह नहीं है जिसकी मग करते उनके मृत्यु उपरांत मिले शौर्य चक्रों को भी लौटा दिया लेकिन सरकार कोई कर्यवाही नहीं केर रही है.और आपलोग एक सुनी सुने बयां पैर बगैर अरुंधती का स्पष्टीकर्ण के आरोप लगाना और पहले तो महिला फिर मानवाधिकारों की लड़ाई में पूरी दुनिया माँ सरशी गयी हमेशा हेर जगह अन्याय के विरुध्ध सीना तन केर कड़ी होने वाली महिला पैर जो की एक विश्व स्टर की साहित्यकार भी आरोप छुद्र मानसिकता का प्रतिक है.जो लोग यह कहते है की अर्न्धुती प्रचार और चर्चा के लिए यह सब करती है टोवे भूल केर रहे है अगेर वह चाहती तो सलमान रुश्दी की तरह ऐश केर सकती थ यहाँ का मीडिया उनका समर्थन करेगा उनके कर्यो का विदेशी मीडिया गंभीरता से लेता है.

  3. मानवाधिकार का झण्डा उठाकर अपना चेहरा चमकाने और घर भरने वाले ये लोग किसी गाँव के किसी मजबूर आदमी को उसके अधिकार क्योँ नहीँ दिलाते जो व्यवस्थाओँ के कारण आज भी मर मरकर जी रहा हैँ। ये लोग आखिर ऐसा क्योँ करेँगे इससे इन्हेँ क्या मिलने वाला इन्हेँ तो जो नाम और पुरस्कार चाहिये वो कश्मीर जैसे विवादास्पद मामले मेँ टाँग अड़ाने से ही मिलना है लेकिन ये लोग अगर पाकिस्तान जैसे देश मेँ होते तो इस तरह अपनी चोँच नहीँ खोल पाते । ऐसे लोगोँ को तो देश निकाला दे देना चाहिये तब ही मानव के अधिकारोँ की खोखली बाते करने वाले ऐसे गद्दारोँ को सबक मिलेगा।

  4. मेरी समझ से यह परे है की अरुंधती राय क्या है . उस के कहने पर इतना ध्यान क्यों दिया जा रहा है . उसे देश का पता नहीं, अपने पड़ोस का पता नहीं, राजनीति से उसे कोई लेना देना नहीं, एक उपन्यास पर उसे एक पुरस्कार मिल गया तो क्या हो गया. इतने बड़े देश में एक अदनी सी महिला पर इतना बवाल. अगर इन से कहा जाये की कुछ दिनों के लिए पाकिस्तान रह कर आओ तो इन्हें असलियत मालूम पड़ेगी. इस देश का दुर्भाग्य यह है की आज इस में भी नेतृत्व का अभाव हो गया है. पडोसी देश इसी बात से प्रसन्न है की हमारे अपने नेता भी कभी कभी उन की भाषा में बात करने लगते हैं. हम सिर्फ इतना ही कह सकते हैं ईश्वर इस सब को सदबुधि दे….इन्हें रास्ता दिखा जिस से यह अपने कर्त्तव्य को समझ सके. वर्तमान स्थिति को देखते हुए कभी कभी डर लगने लगता है की क्या हम फिर से टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे ………….

  5. arundhati ko jyada hi prachar mil raha hai .wh yhi chahti hai ki jan -maans ke bahane vishw patal par chha jaaye or noble prize mil jaaye …uske liye desh ya vichardara ke koi maayene nahin .

  6. चाइना इसराएल में एसे लोगो को चुन चुन के मर दिया जाता है , पर इंडिया में ऐसे लोगो को कोई बी क्यों नहीं मरता ( अरुंधती )????? क्या हमारा देश नपुंसक हो चूका है या हम लोग ???

  7. सस्ती लोकप्रियता पाने की चाहत है. Kuch log desh ko gali dekar videsh mei puraskar patey hain vahi ye bhi karti hai. Aisey ghatiya logo ke barey mei article likhna apradh hai. Kyonki aisa karney se arundhati safal ho gai kyonki yahi to vah chahti hai ki kisi na kisi prakar sey surkhioyon mei rahey.

  8. अरुंधती रॉय का आर्थिक एवं सामाजिक बहिष्कार करना एक असरदार उपाय होगा . राष्ट्रवादी संगठनों को यह अहवाह्न करना चाहिए . ऐसे लोग धन एवं नाम की आकांक्षा में किसी भी हद तक देशद्रोह करते हैं. इसलिए उनकी जड़ों पर प्रहार करने से उनकी गतिविधियाँ स्वतः रुकती हैं .

  9. आवेश जी आप अकेले नहीं है, लाखों की संख्या में हैं ऐसे लोग जो इन महोदया को हिकारत भरी नजरों से देखते हैं। माआवादी और नक्सलवादियों द्वारा की गई हत्याओं को जायज ठहराने के लिए इनके पर तर्क नहीं कुतर्क होते हैं। ये उनका पक्ष इसलिए ले पाती हैं क्योंकि कभी किसी माओवादी या नक्सली ने इनकी बेटी, पति, बाप या मां को गोली नहीं मारी। आपने सही कहा महोदया जिस लोकतंत्र से घृणा करती हैं उसी के रहमोकरम पर ये भारत विरोधी बातें कर पाती हैं। किसी कम्यूनिष्ट देश में होतीं तो कम्यूनिज्म का विरोध कैसे भी न कर पाती।

  10. आवेश जी वास्तव में आप आवेश में आ गए हैं. मैं अरुंधती को सही तो नहीं ठहराऊंगा लेकिन कहना चाहता हूँ कि वही आवाज सुनी जाती है जो हिंसक या तोड़ने वाला हो. उस मायने में अरुंधती सही है. राजनीती का खेल हर लेवल में खेला जा रहा है. इसको रोकने के लिए बाकी लोग असहाय हैं. बताइए आरक्षण ख़त्म करने के लिए हम क्या करें? गरीबी दूर करने के लिए किसी भी सरकार ने इमानदार प्रयास नहीं किया. रिश्वत खुले आम ली जा रही है. evm मशीन पर शक के बादल मंडरा रहे हैं. देश का माहौल इतना ख़राब हो चला है कि एक ईमानदार व्यक्ति घुटन महसूस करता है. चाइना भारत के जमीन हड़प रहा है और मीडिया मौन है? कश्मीर में जम्मू का प्रतिनिधित्व काफी कम है प्रशाशन में और विधानसभा में. कोई ठीक कर रहा है क्या? धारा की दिशा में बहना कितना आसन होता है. आज अरुन्धानी जिस धारा में बह रही है वह अनुकूल दिशा है. शायद वो सही है! देश सोनिया की गुलामी कर रही है? कहाँ तक उचित है? सरकार के मंत्री देश तोड़ने वाला बयां दे रहे हैं, किसी ने आपत्ति की क्या? बंगाल में कट्टर मुस्लिम हावी हो गए हैं, कोई रोकता है? बाबर के बनाये गए मस्जिद के समर्थन में स्वर ऊँचा कर रहे हैं, क्या सही है? क्या कश्मीर की जनता को अपना भाग्य तय करने का अधिकार लोकतंत्र नहीं देता? क्या कश्मीर के लोग भारत में बने रहने को मजबूर हैं?यदि एक आम कश्मीरी अपने आप को भारत के करीब नहीं पता तो किसका दोष है? मेरी जहाँ तक समझ है कश्मीर की जनता को हक है वो अपने भाग्य का निर्णय स्वयं ले सकता है. भारत सरकार की अनेक गलतियाँ भी कम दोषी नहीं है. दोषपूर्ण चुनाव ने भारत की विश्विस्नीयता को कश्मीर के अन्दर काफी ठेस पहुंचाई है. अलगाववादियों को सह किसने दिया? किसने उनको मौत का तांडव मचने की छूट दी? क्या बगैर सेना के कश्मीर भारत के पास एक दिन भी रह सकता है? क्या देश के बाकी हिस्से में भी सरकार के लिए असंतोष नहीं है? सरकारें न सुधरे तो ऐसे ही परिणाम भुगतने पड़ते हैं.

  11. “मुझे तुमसे नफरत है अरुंधती” – by – आवेश तिवारी

    आवेश तिवारी जी नफरत करना अच्छा नहीं है.

    आप क्या लिख रहें हैं – “पिछले बार गोडसे ने मारा इस बार अरुंधती ….. ” यह गाँधी का देश है.

    QUERY : यदि अरुंधती कश्मीर में जाकर, वहीँ ज़मीन खरीद कर, अपना डेरा डालने का मन बनाये तो गिलानी के चमचे उसे वहां बसने देंगे ?

    – अनिल सहगल –

  12. श्री आवेश तिवारी जी तथ्यपूर्ण लेख के साथ आपने अरुंधती राय का सच हमारे सामने रखा, बहुत ही अच्छा और प्रेरणा दायक लेख| तिवारी जी अरुंधती राय को यह देश पसंद नहीं, शायद वे स्वयं को यहाँ कुछ ज्यादा ही आज़ाद महसूस करती है|
    मीडिया के द्वारा इसके जैसी देश द्रोही हस्तियों को महान बनाने का कार्य किया जा रहा है| देश की जनता (खासकर युवा) का ऐसा मानना हो जाता है कि जो सफल है वह महान है और इसी के चलते वह अंधे होकर अरुंधती जैसों का अनुसरण करने लगते हैं| ऐसा बहुत बार मैंने देखा है, फिर चाहे वह अरुंधती राय हो, राहुल गांधी हो, या शाहरुख खान|
    बहुत बहुत धन्यवाद|

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