ईद-उल-अजहा: मानवता की सेवा : कुर्बानी का वास्तविक सार

वर्षा शर्मा

ईद-उल-अज़हा इस्लाम धर्म का खास त्यौहार है जो बकरीद अथवा ईद-उल-कबीर के नाम से भी जाना जाता है। ईद उल फ़ित्र के 70 दिनों बाद इस्लामी कैलेंडर का आखिरी महीना 10 ‘जुल हज्जा’ को ईद-उल-अज़हा का त्यौहार मनाया जाता है। यह त्यौहार बलिदान अथवा कुरबानी का प्रतीक है।

इस्लाम धर्म में  बकरे की कुर्बानी देकर मनाया जाने वाला ईद उल अज़हा का यह त्यौहार हमेशा दूसरे धर्मों के लोगों के लिए चर्चा का विषय बना रहा है जिन लोगों को इस धर्म का पूर्ण ज्ञान नहीं है, वे नहीं जानते कि आख़िरकार कुर्बानी का वास्तविक सार और उसका महत्व क्या है।

प्यार का दूसरा नाम बलिदान है। ईश्वर, इस्लाम धर्म के पैगंबर हज़रत इब्राहिम के विश्वास, उनकी निष्काम भक्ति, प्रेम और समर्पण का परिक्षण करना चाहते थे। मान्यता है कि इब्राहिम ने एक स्वपन देखा जिसमें उन्हें ईश्वर की और से हुक्म आया कि वह अपनी सबसे बहुमूल्य सम्पत्ति का बलिदान दें।

इब्राहीम के लिए सबसे अनमोल चीज़ उनके एकलौते पुत्र इस्माइल थे। इब्राहीम ने कई रातें ईश्वर की उपासना में गुजारी। जब क़ुरबानी का समय करीब आया तो उन्होंने इस्माइल को ईश्वर के आदेश के विषय में बताया, तो वे तत्काल हॅसते-हॅसते कुर्बान होने के लिए तैयार हो गए। लेकिन ईश्वर भी दयालू व कृपालु है और वह अपने बंदे के दिल के हाल को बखूबी जानता है। इब्राहिम ने जैसे ही छुरी उठाई आकाश में एक रौशनी दिखाई पड़ी और उस दिव्य प्रकाश ने इब्राहिम से बात की और कहा कि तुम्हारा बलिदान पूरा हो चुका। ईश्वर तुमसे प्रसन्न हुए है और तुम्हारे प्रिय पुत्र को जीवनदान दिया है। जब उन्होंने आंखें खोलीं तो पुत्र को खड़ा देखा और पुत्र के स्थान पर दुंबा यानी एक भेड़ की गर्दन कटी हुई थी। इस प्रकार वह ईश्वर के इम्तिहान में सफल हुए। लिहाज़ा तब से लेकर आज तक इब्राहिम के त्याग और बलिदान को याद कर यह त्यौहार मनाया जाता है।

यहां ये समझना बहुत ज़रूरी है कि जानवरों की क़ुरबानी के रूप में दिया गया बलिदान न तो हमारे पिछले गुनाहों को खत्म कर सकता है और न ही हमारे प्राश्चित का ज़रिया बन सकता है। कुरआन ने सपष्ट शब्दों में कहता है कि: “न ही उनका मांस और न ही उनका खून है जो रब तक पहुँचता है यह तुम्हारी भक्ति और तक़वा है जो उस तक पहुँचती है”। (कुरान 22:37)

जानवरों की क़ुरबानी देना सिर्फ एक अनुष्ठान और पवित्र धार्मिक परम्परा है। जबकि इस प्रथा का सार और इसकी भावना साधारण मनुष्य की समझ से परे है।

क़ुरबानी का वास्तविक अर्थ यहां ऐसे बलिदान से है जो दूसरों के लिए किया गया हो। इस दिन किसी बकरे या जानवर की क़ुरबानी तो महज़ एक उदाहरण है। असल में क़ुरबानी तो हर व्यक्ति और औरत को जीवन भर करनी होती है।

ज़रा खुद सोचिये कि ईश्वर को हमारे बलिदान और त्याग की क्या ज़रुरत? वह हमसे सिर्फ सच्चाई और ईमानदारी की अपेक्षा करता है। यह त्यौहार इस लिए मनाया जाता है ताकि हम अपने दोस्तों के साथ अपने संबंधों को मज़बूत कर सकें, जो लोग ज़रूरत में हैं उनकी मदद कर सकें, परोपकार व अच्छे कर्म कर सकें। यह त्यौहार हमें बताता है की कैसे मानवता की सेवा और ईश्वर की इच्छा के प्रति सवयं को समर्पित करें।

हजरत मुहम्मद साहब ने स्वयं फ़रमाया कि “कोई व्यक्ति जिस भी परिवार, समाज, शहर या मुल्क में रहने वाला है, उस व्यक्ति का फर्ज है कि वह उस देश, समाज, परिवार की रक्षा के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार रहे”।

कुर्बानी का अर्थ है कि देश रक्षा के लिए सदा तत्पर रहना। क्या आपने कभी गौर किया है कि हर दिन हमारे पुलिस अधिकारी हमारी रक्षा करने के लिए अपना जीवन जोखिम में डालते हैं।  लाखों सैनिकों ने  हमारे देश को अंग्रेज़ों के ज़ुल्म व सितम से आज़ादी दिलाने के लिए कई लड़ाइयां लड़ी और अपने जीवन का बलिदान दिया है। हमारे भारतीय व मुस्लिम स्वतन्त्रता सैनानी यदि अपनी जान की बाज़ी न देते तो गुलामी की बेडिय़ों में जकड़ा भारत को कभी खुली हवा में सांस लेने का मौका नहीं मिलता।

मैं सभी मुस्लिम बहन- भाइयों से आग्रह करती हूँ कि ईद उल अज़हा के इस मौके पर हमें आजादी के इन मतवालों को याद करना चाहिए, जिनके बलिदान से भारतीयों को अंग्रेज़ों से मुक्ति मिली थी।

 

बेहतर ये होगा कि इस मौके पर हम सभी पुलिसकर्मियों, गरीबों, ज़रूरतमंदों, अनाथों को अपने घर पर बुलाएँ और उनके कार्यों तथा बलिदानों की सराहना करें जिन्होंने मानवता के लिए कई बलिदान दिए। यही इस त्यौहार का भाव है। सवयं विचार कीजिये।

 

2 thoughts on “ईद-उल-अजहा: मानवता की सेवा : कुर्बानी का वास्तविक सार

  1. ऐसे कुछ एक लेख दीपा शर्मा ने लिखे हैं| लेकिन भारत में प्राचीन काल से मानव सेवा भारतीयता का प्रतीक रहा है| या यूं कहिये कि बाहर से जो भी यहाँ आया अंत में भारतीयता के रंग में रंगा गया| आज इक्कीसवीं सदी में पशु-बलि को कुर्बानी से जोड़ यहाँ उसका महत्त्व समाज सेवा से बताना—शीर्षक को छोड़ सारे लेख में सेवा शब्द केवल एक बार दोहराया गया है—पशु-अधिकार प्रचारकों और कई देशों में कानून का उल्लंघन करता है| किसी भी धर्म से क्यों न हों प्राचीन विचारों का वर्तमान स्थितियों अथवा सामाजिक व राजनैतिक वातावरण में निरंतर पुनर्विलोकन करते रहना चाहिए ताकि भारतीयता स्वरूप परोपकार व मानव सेवा को मानवीयता-पूर्ण ढंग से किया जा सके|

Leave a Reply

%d bloggers like this: